भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई फिल्में आईं और गईं। लेकिन कुछ फिल्में ऐसी रहीं, जिन्होंने लोगों के दिलों में अपनी अमिट छाप छोड़ी। कुछ मूवीज के हीरो प्रसिद्ध हुए, तो कुछ के खलनायक ने अपना नाम बनाया। चलिए आज हम आपको अपने अमर किरदार की इस कड़ी में ‘शोले’ के उस विलेन के बारे में बताते हैं, जिसने खलनायकी को एक नया चेहरा दिया और हमेशा के लिए सिनेमा के इतिहास में खुद को अमर कर लिया।
अभी तक तो बहुत से लोग समझ गए होंगे कि हम ‘गब्बर’ की बात कर रहे हैं। ‘गब्बर’ के कालजयी किरदार को पर्दे पर अभिनेता अमजद खान ने जीवंत किया था। चलिए आपको बताते हैं अब उनके बारे में।
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पहली पसंद नहीं थे अमजद खान
बता दें कि ‘गब्बर’ के किरदार के लिए अमजद खान पहली पसंद नहीं थे। सलीम-जावेद और रमेश सिप्पी इस रोल के लिए डैनी डेंगज़ोंग्पा को लेना चाहते थे। लेकिन डैनी उस समय ‘धर्मात्मा’ की शूटिंग के लिए अफगानिस्तान जा रहे थे और तारीखें उपलब्ध नहीं थीं। जब अमजद खान का नाम सामने आया, तो शुरुआत में पटकथा लेखकों को लगा कि उनकी आवाज बहुत पतली है और गब्बर के खौफ के लिए सही नहीं है। लेकिन अमजद ने अपनी मेहनत से इस धारणा को गलत साबित कर दिया।
‘शोले’ के डायलॉग हो गए फेमस
हिंदी सिनेमा में शायद ही कोई और फिल्म होगी जिसके विलेन के डायलॉग हीरो से ज्यादा लोकप्रिय हुए हों। उनके बोले गए जुमले आज भी भारतीय पॉप-कल्चर का हिस्सा हैं। जैसे कितने आदमी थे, जो डर गया, समझो मर गया, ये हाथ हमको दे दे ठाकुर।
‘गब्बर’ की रहस्यमयी एंट्री और डर
गब्बर की एंट्री फिल्म शुरू होने के काफी देर बाद होती है, लेकिन उसका डर पहली ही सीन से स्थापित कर दिया जाता है। जब वह अपनी भारी आवाज और जूतों की खनक के साथ चट्टानों पर चलता है, तो दर्शक समझ जाते हैं कि यह कोई मामूली अपराधी नहीं है। उसका वह सवाल- कितने आदमी थे? यह सिर्फ एक सवाल नहीं, बल्कि अपने ही साथियों के मन में मौत का डर पैदा करने का एक जरिया था।
गब्बर का किरदार अमजद खान के लिए एक बेहतरीन साबित हुआ। इसने उन्हें रातों-रात सुपरस्टार बना दिया, लेकिन वह इस इमेज में ऐसे कैद हुए कि लोग उन्हें असल जिंदगी में भी गब्बर ही समझने लगे। हालांकि, बाद में उन्होंने ‘शतरंज के खिलाड़ी’ में वाजिद अली शाह और ‘याराना’ में एक सच्चे दोस्त की भूमिका निभाकर अपनी बहुमुखी प्रतिभा साबित की।
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