साल 1957 में रिलीज हुई गुरु दत्त के निर्देशन में बनी फिल्म ‘प्यासा’ एक रोमांटिक म्यूजिकल मूवी थी। डायरेक्टर होने के साथ-साथ गुरु दत्त ने अपनी इस फिल्म में अभिनय भी किया था। उन्होंने ‘प्यासा’ में विजय का किरदार निभाया। इसके अलावा फिल्म में वहीदा रहमान, माला सिन्हा, महमूद और जॉनी वॉकर समेत कई सितारे नजर आए थे।
‘प्यासा’ भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुई। जहां यह फिल्म विजय (गुरु दत्त) के माध्यम से एक कवि के संघर्ष, दुनिया की बेरुखी पर कड़ा प्रहार करती है। वहीं, इस डार्क और गंभीर कहानी में ‘अब्दुल सत्तार’ का किरदार फिल्म में हास्य जोड़ता है, जो लोगों को काफी पसंद आया था।
जॉनी वॉकर द्वारा निभाया गया यह किरदार सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं था, बल्कि फिल्म का एक जरुरी हिस्सा था। चलिए आज आपको अपने अमर किरदार के कॉलम में जॉनी वॉकर द्वारा निभाए गए ‘अब्दुल सत्तार’ के रोल के बारे में बताते हैं, जो अमर हो गया।
किरदार की सादगी और गहरा प्रभाव
‘अब्दुल सत्तार’ एक आम ‘तेल-मालिश’ करने वाला व्यक्ति है, जो गलियों में घूम-घूम कर लोगों की थकान मिटाता है। ‘प्यासा’ जैसी फिल्म में, जहां हर किरदार किसी न किसी लालच या स्वार्थ से बंधा है, वहीं ‘सत्तार’ का किरदार निस्वार्थ प्रेम और दोस्ती का प्रतीक है। वह विजय का वो दोस्त है, जिसके पास उसे देने के लिए पैसे या शोहरत तो नहीं है, लेकिन एक अटूट सहानुभूति और साथ है।
जॉनी वॉकर ने इस भूमिका को इतनी सहजता से निभाया कि वह पर्दे पर अभिनय करते नहीं, बल्कि जीते हुए दिखाई देते हैं। उनका लहजा, उनके चलने का अंदाज और उनकी मुस्कान- यह सब मिलकर एक ऐसे किरदार की रचना करते हैं जो ‘अमर’ होने की कैटेगरी में आता है।
‘सर जो तेरा चकराए’: एक गीत, कई भावनाएं
साहिर लुधियानवी के बोल और एसडी बर्मन के संगीत से सजा यह गीत भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित कॉमेडी गीतों में से एक है। लेकिन गहराई से देखें तो यह गीत सिर्फ एक मालिश करने वाले की मार्केटिंग पिच नहीं है, बल्कि जीवन की समस्याओं की एक फिलॉसफी है।
जॉनी वॉकर का कॉमेडी से ऊपर का प्रदर्शन
अक्सर जॉनी वॉकर को सिर्फ एक कॉमेडियन के रूप में देखा जाता है, लेकिन ‘प्यासा’ में उनकी भूमिका में एक ट्रैजिक-कॉमेडी का पुट है। जब पूरी दुनिया विजय को मृत मान लेती है या उसे पागलखाने भेज देती है, तब भी सत्तार की आंखों में उसके लिए वही सम्मान रहता है। जॉनी वॉकर की कॉमिक टाइमिंग बेमिसाल थी।
जिस तरह से वे अपने हाथों को चलाते हैं और मालिश करते हुए लय पैदा करते हैं, वह उनके तकनीकी कौशल को दर्शाता है। उन्होंने इस रोल के लिए वास्तविक मालिश करने वालों के हाव-भाव सीखे थे, जिससे किरदार में सच्चाई आ गई।
तकनीकी और सिनेमाई पहलू
गुरु दत्त एक ऐसे निर्देशक थे, जो हर फ्रेम में अर्थ ढूंढते थे। ‘प्यासा’ के गंभीर और भारी सिनेमैटोग्राफी के बीच सत्तार के सीन में रोशनी थोड़ी ज्यादा खुली और ब्राइट रखी गई थी। यह इस बात का संकेत था कि सत्तार का किरदार विजय के जीवन के अंधेरे में एक ‘कॉमिक रिलीफ’ से बढ़कर एक ‘मोरल सपोर्ट’ है।
क्यों अमर है ‘अब्दुल सत्तार’ का किरदार?
किसी किरदार को अमर तब कहा जाता है, जब वह फिल्म की मुख्य कहानी के बिना भी अपनी अलग पहचान रखे। आज ‘प्यासा’ को रिलीज हुए दशकों बीत चुके हैं, लेकिन जब भी भारतीय सिनेमा में ‘दोस्ती’ या ‘निस्वार्थ सेवा’ की बात होती है, अब्दुल सत्तार का नाम जेहन में आता है।
जॉनी वॉकर ने इस छोटे से रोल से यह साबित कर दिया कि पर्दे पर बिताया गया समय मायने नहीं रखता, बल्कि छोड़ी गई छाप मायने रखती है। आज भी अगर कहीं तेल-मालिश की बात होती है, तो ‘सर जो तेरा चकराए’ गुनगुनाया जाता है। यह एक किरदार की जीत है कि वह लोक-संस्कृति का हिस्सा बन गया।
