भारतीय सिनेमा के इतिहास में हजारों फिल्में आईं और गईं, लेकिन कुछ मूवीज और उनके किरदार ऐसे रहे जो लोगों के दिलों में अपनी अमिट छाप छोड़ गए। सालों बाद भी अब उन अलग-अलग किरदारों को अलग-अलग तरीके से याद किया जाता है। इन्हीं में से एक है साल 1957 में आई फिल्म ‘मदर इंडिया’ की ‘राधा’ का, जिसे नरगिस दत्त ने निभाया था। महबूब खान के निर्देशन में बनी इस मूवी में सुनील दत्त, राजेंद्र कुमार और राज कुमार समेत कई सितारे नजर आए थे।
‘मदर इंडिया’ की ‘राधा’ सिर्फ एक किरदार नहीं, बल्कि भारतीय नारी की ताकत और त्याग का सबसे बड़ा प्रतीक बन गई। नागिस ने इस किरदार को इतने जीवंत तरीके से निभाया कि आज भी राधा का नाम सुनते ही एक गरीब, लेकिन मजबूत मां की तस्वीर सामने आ जाती है- फटी साड़ी, कंधे पर हल और हर मुश्किलों से लड़ती हुई। चलिए आज आपको अमर किरदार में हम ‘राधा’ के बारे में बताते हैं कि आखिर वह क्यों भारतीय सिनेमा का सबसे यादगार किरदार है।
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संघर्ष की शुरुआत: सुहाग और सम्मान की रक्षा
राधा की कहानी एक नवविवाहित वधू के रूप में शुरू होती है, जो बड़े अरमानों के साथ एक किसान परिवार में आती है, लेकिन खुशियां वह कुछ समय के लिए ही होती हैं। कर्ज के बोझ तले दबे परिवार की दुर्दशा तब शुरू होती है, जब राधा के पति शामू के हाथ एक दुर्घटना में कट जाते हैं।
यहां से राधा के अमर किरदार की पहली परत खुलती है। लाचारी और अपमान से टूटकर जब शामू घर छोड़कर भाग जाता है, तो राधा टूटती नहीं है। वह चाहती तो हार मान सकती थी, लेकिन वह चुनती है ‘संघर्ष’। एक ऐसी समाज व्यवस्था में जहाँ विधवा या त्यागी हुई महिला को बोझ समझा जाता था, राधा ने अपने बच्चों को पालने के लिए धरती मां की गोद को अपनी कर्मभूमि बनाया।
प्रकृति का प्रकोप और अडिग ममता
फिल्म का वह दृश्य जिसमें भीषण बाढ़ आती है और राधा का छोटा बच्चा उसकी बाहों में दम तोड़ देता है, रोंगटे खड़े कर देने वाला है। भूख, गरीबी और प्रकृति के कहर के बीच राधा अपने बच्चों को घास-फूस खिलाकर पालती है। इसके बाद जब भूख से तड़पते बच्चों के लिए राधा, लाला के पास जाती है, तो वह उसके सम्मान का सौदा करना चाहता है।
एक तरफ बच्चों की जान थी और दूसरी तरफ राधा का चरित्र। यहां राधा कहती है कि तन बेचकर पेट भरना उसे मंजूर नहीं। वह कीचड़ में सने पत्थर उठाकर अपना घर बनाती है, लेकिन अपने आत्मसम्मान को आंच नहीं आने देती। यही वह ‘अटूट शक्ति’ है जो उसे यादगार बनाती है।
‘मदर’ और ‘इंडिया’ का संगम
राधा केवल अपने बच्चों की मां नहीं है, वह पूरे गांव की ‘मां’ और भारत की मिट्टी का प्रतिनिधित्व करती है। फिल्म के एक दृश्य में जब पूरा गांव बाढ़ और तबाही से डरकर पलायन करने लगता है, तब राधा ही वह शक्ति है जो उन्हें रोकती है। वह कहती है कि यह धरती हमारी मां है, और मां को छोड़कर नहीं जाया जाता।
यहीं से राधा का किरदार एक व्यक्तिगत संघर्ष से उठकर ‘राष्ट्र निर्माण’ का प्रतीक बन जाता है। वह हल जोतती है, पत्थर तोड़ती है और बंजर ज़मीन से अनाज उगाती है। वह आत्मनिर्भर भारत की वह पहली तस्वीर थी, जो आज़ादी के ठीक बाद के भारत को प्रेरित कर रही थी।
ममता और न्याय का महायुद्ध
जैसे-जैसे बिरजू बड़ा होता है, वह बागी बन जाता है। वह डाकू बन जाता है ताकि वह सुखीलाला से अपनी मां के कंगन वापस ला सके और गांव के साथ हुए अन्याय का बदला ले सके। राधा अपने बेटे बिरजू से बहुत प्यार करती है, क्योंकि वह उसकी जिंदगी का खास हिस्सा यानी लाडला बेटा है। राधा के किरदार का सबसे महान और अमर पक्ष फिल्म के क्लाइमेक्स में आता है।
बिरजू अपनी नफरत में इतना अंधा हो जाता है कि वह सुखीलाला की बेटी को उठाकर ले जाने लगता है। राधा उसे रोकती है। वह उसे अपनी कसम देती है, उसे ममता का वास्ता देती है, लेकिन बिरजू नहीं रुकता। तब राधा के अंदर की ‘मां’ और ‘न्याय की देवी’ के बीच युद्ध होता है। वह जानती है कि अगर आज बिरजू उस लड़की को ले गया, तो गांव की मर्यादा खत्म हो जाएगी और एक औरत का सम्मान मिट्टी में मिल जाएगा। वह बंदूक उठाती है और अपने ही कलेजे के टुकड़े, अपने बेटे बिरजू को गोली मार देती है।
गोली चलने के बाद जब बिरजू उसकी बाहों में दम तोड़ता है, तो राधा की चीख दर्शकों के कलेजे को चीर देती है। उसने अपने बेटे को मारकर यह साबित कर दिया कि एक मां के लिए उसके संस्कार, उसकी धरती और एक औरत की इज्जत, उसकी अपनी ममता से भी बड़ी होती है।
राधा आज भी क्यों है अमर?
राधा के ‘अमर’ होने के पीछे कई मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण हैं। जैसे- राधा ने सिर्फ अपने सुखों का त्याग नहीं किया, बल्कि अपने अस्तित्व की सबसे प्रिय वस्तु- अपने बेटे की बलि दे दी ताकि समाज में नैतिकता बनी रहे। इसके अलावा भारतीय समाज में ‘सहना’ नारी का गुण माना जाता रहा है, लेकिन राधा ने ‘सहने’ को अपनी कमजोरी नहीं बल्कि अपनी ताकत बनाया। उसने नियति को चुनौती दी। हर युग की मां राधा है। चाहे वो 1957 की ग्रामीण महिला हो या आज की कामकाजी महिला, संघर्ष और परिवार के प्रति समर्पण का दोनों का वही जज्बा रहा है।
