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हमारी याद आएगीः एक कलम, जिसने नायक और खलनायक को एक कर दिया दिखाया

गाजानी कश्मीरी ‘किस्मत’ (1943) के लेखक थे, जो तीन साल तक कोलकाता के रॉक्सी सिनेमाघर में चली थी। वे ऐसे लेखक थे जिन्होंने हिंदी सिनेमा के नायक में जेबकतरा, बलात्कारी और हत्यारा तक ढूंढ़ निकाला और नायक-खलनायक का फर्क मिटा कर उन्हें अपनी कलम से एक कर दिया था। उन्होंने अशोक कुमार, दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन जैसे तीन सुपर स्टारों को पहली बार नकारात्मक किरदार में पेश किया। नरगिस (तकदीर) सायरा बानो (जंगली), साधना (लव इन शिमला) की पहली फिल्मों का लेखन किया। कश्मीरी की कलम ने और भी कई कमाल किए। आज इस मशहूर लेखक की 112वीं जयंती है।

गाजानी कश्मीरी ‘किस्मत’ (1943) के लेखक थे, जो तीन साल तक कोलकाता के रॉक्सी सिनेमाघर में चली थी।

आगाजानी कश्मीरी (16 अक्तूबर 1908-27 मार्च, 1998)

सन 1943 के जाड़ों की नौ जनवरी को कई लोगों की किस्मत एक साथ बदल गई थीं। यह काम किया था एक फिल्म ने। संयोग से फिल्म का नाम भी ‘किस्मत’ था। इस फिल्म ने बॉम्बे टॉकीज, निर्देशक ज्ञान मुखर्जी, अशोक कुमार, मुमताज शांति, लेखक आगाजानी कश्मीरी (सैयद वाजिद हुसैन रिजवी) और संगीतकार अनिल बिस्वास सभी की किस्मत एक झटके में बदल दी थी। सिनेमा के परदे पर भी पहली बार एक ऐसा हीरो उतरा था, जो जेबकतरा था और जिसके होठों में सारे समय सिगरेट फंसी होती थी।

नैतिकता और शुद्धतावादियों ने इस हीरो को देखकर हायतौबा मचानी शुरू कर दी थी। आगाजानी कश्मीरी की खूब आलोचना हो रही थी और फिल्म के निर्माता हिमांशु राय को भी बख्शा नहीं जा रहा था। कहा जा रहा था कि चोर और गिरहकट दर्शकों के आदर्श बनाए जा रहे हैं और बिना शादी किए लड़की को मां बनते दिखाया जा रहा है। यह सिनेमाई नैतिक पतन है।

मगर इन आलोचनाओं से दूर दर्शकों की भीड़ ‘किस्मत’ देखने के लिए टूट पड़ी थी। खासकर इसका गाना ‘दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है…’ लोगों की जुबान पर चढ़ गया था। दर्शकों की भीड़ के कारण फिल्म की टिकटें मिलनी मुश्किल हो गर्इं थी। कोलकाता के रॉक्सी थियेटर में एक हफ्ता, दो हफ्ता, तीन हफ्ता करते-करते 187 हफ्तों तक ‘किस्मत’ चली और भारतीय सिनेमा के इतिहास में सबसे लंबी चलने वाली पहली फिल्म बन गई। आगाजानी कश्मीरी के सुनहरी कलम की स्याही 32 सालों तक सूखी नहीं, जब तक कि ‘शोले’ रिलीज नहीं हो गई। इस फिल्म ने बिखरती जा रही बॉम्बे टॉकीज को मजबूती दी। अशोक कुमार को पहला सुपर स्टार बना दिया और फिल्मों की कहानियों की धारा ही मोड़ दी। और यह काम हुआ था आगाजानी कश्मीरी की कलम के दम पर।

लखनऊ से हीरो बनने के लिए भाग कर मुंबई आए कश्मीरी ने 1933 से 1938 तक तीन फिल्मों में अभिनय किया और फिर बॉम्बे टॉकीज से जुड़ गए। बॉम्बे टॉकीज के मालिक हिमांशु राय ने उन्हें पटकथा और संवाद लिखने की प्रेरणा दी और आगाजानी अभिनय भूल कर लेखन की ओर मुड़ गए। आगाजानी की कलम ने खूब गुल खिलाए। 1954 में ‘अमर’ में ट्रेजिडी किंग दिलीप कुमार को ऐसा बलात्कारी बना दिया, जिसकी पत्नी (मधुबाला) उसकी शादी उसी लड़की (निम्मी) से करवाती है, जिसके साथ बलात्कार किया गया था। 1961 में ‘जंगली’ में शम्मी कपूर को एक नई इमेज दी और उनके ‘याहू…’ से हंगामा मच गया।

1963 में सुनील दत्त पहली बार निर्माता बनने जा रहे थे और मशहूर नानावाटी कांड पर ‘ये रास्ते हैं प्यार के’ बना रहे थे तो आगाजानी से उसका लेखन करवाया। यह एक नौसेना कमांडर की सच्ची कहानी थी, जो अपनी पत्नी के प्रेमी को गोली मार देता है। आगाजानी ने पहली बार सुनील दत्त की फिल्म ‘मुझे जीने दो’ में डाकुओं को मानवतावादी दृष्टिकोण से परदे पर पेश किया। अशोक कुमार को जेबकतरा, दिलीप कुमार को बलात्कारी के बाद 1971 में आगाजानी ने पहली बार ‘परवाना’ में अमिताभ बच्चन को हत्यारे की भूमिकाओं में पेश किया था।

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