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हमारी याद आएगी: मोहम्मद अजीज, दशक भर में ही धुंधला गईं मोहम्मद रफी की परछाइयां

मोहम्मद रफी का 1980 में निधन हुआ तो रफी जैसी आवाज में गाने वाले अनवर, शब्बीर कुमार और मोहम्मद अजीज बहुत तेजी से फिल्मजगत में उभरे। उन्हें रफी का वारिस कहा जाने लगा था। मगर 90 के दशक में उभरे सोनू निगम, कुमार सानू जैसे गायकों ने उन्हें हाशिए पर धकेल दिया। इन्हीं गायकों में से एक थे मोहम्मद अजीज। अमिताभ के लिए ‘मर्द तांगे वाला...’ गाकर चर्चा में आए अजीज ने रफी के बाद फिल्मों में उनकी आवाज में गाकर खूब नाम कमाया था। आज उनकी दूसरी पुण्यतिथि है।

Industriesदशक भर में ही धुंधला गई मोहम्‍मद रफी की परछाइयां। फाइल फोटो।

मोहम्मद रफी के 1980 में निधन के बाद करोड़ों आंखों में आंसू थे। मगर दो आंखों में कुछ ज्यादा ही थे। ये दो आंखें थीं फिल्मकार मनमोहन देसाई कीं, जो मोहम्मद रफी को भगवान की तरह मानते थे। देसाई की बनाई लगभग हर फिल्म में मोहम्मद रफी ने गाया था।

फिर चाहे एक गाना ही क्यों न हो। देसाई ने अमिताभ बच्चन को लेकर फिल्में बनार्इं, और अमिताभ बच्चन के लिए किशोर कुमार गाते थे, फिर रफी के साथ देसाई का प्रेम क्यों था?

जैसे मुकेश राज कपूर की आवाज बन गए थे वैसे ही किशोर कुमार अमिताभ बच्चन की आवाज बन चुके थे और अमिताभ बच्चन को लेकर देसाई ने एक दो नहीं आठ फिल्में बनाई थीं। 1983 में जब देसाई ‘कुली’ बना रहे थे, तो एक ऐसी आवाज की तलाश में थे, जो रफी जैसी हो या किशोर की कमी पूरी कर दे। रफी गुजर चुके थे, मगर किशोर कुमार तो थे, फिर अमिताभ बच्चन के लिए किशोर से गवाने के बजाय देसाई रफी जैसी आवाज की तलाश क्यों कर रहे थे?

दरअसल किशोर कुमार की बनाई एक फिल्म में अतिथि भूमिका निभाने से अमिताभ बच्चन ने इनकार कर दिया था। किशोर कुमार ने इस बात को दिल पर ले लिया और अमिताभ बच्चन की फिल्मों में गाने से इनकार कर दिया था। देसाई चाहते थे कि किशोर नहीं गा रहे हैं तो कम से कम उनकी फिल्म में किशोर या रफी जैसी आवाज ही रहे। उन दिनों रफी की आवाज में गाने वाले तीन गायक थे। अनवर, शब्बीर कुमार और मोहम्मद अजीज।

हालांकि रफी के रहते ही अनवर उनके उत्तराधिकारी माने जाने लगे थे जिनका गाना ‘कसमें हम अपनी जान की खाए चले गए…’ (मेरे गरीब नवाज, 1973) सुनकर रफी ने पूछा था कि यह गाना मैंने कब गाया। अनवर रफी की आवाज के सबसे करीब थे, लिहाजा देसाई उनसे अपनी फिल्म ‘सुहाग’ (1979) में गवा चुके थे।

रफी की हौसलाअफजाई के बाद अनवर से तारीफों का बोझ उठाए नहीं उठा। उन्होंने मनमोहन देसाई और राज कपूर जैसे निर्माताओं से मुंह खोलकर पैसे मांगने की कोशिश की और इन निर्माताओं ने उनकी जगह सुरेश वाडकर, शब्बीर कुमार और मोहम्मद अजीज जैसे गायकों को ले लिया। अनवर ने देसाई से एक गाने के पांच के बजाय छह हजार मांगे तो देसाई ने ‘कुली’ में सातों गाने शब्बीर कुमार से गवा लिए और अगली फिल्म ‘मर्द’ (1985) में एक और उभरते गायक मोहम्मद अजीज को भी मौका दिया।

इस तरह ‘मर्द’ में अमिताभ बच्चन के लिए दो गायक गा रहे थे। शब्बीर कुमार ‘बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला…’ गा रहे थे तो मोहम्मद अजीज ‘मर्द तांगेवाला मैं हूं मर्द तांगेवाला…’ और ‘हम तो तंबू में बंबू लगाए बैठे…’ रफी की ये परछाइयां 1990 के बाद धुंधला गर्इं। उदित नारायण, कुमार सानू, सोनू निगम जैसे गायक आगे आ गए। लिहाजा अनवर, शब्बीर, अजीज हाशिए पर चले गए। यही बाद किशोर कुमार की परछार्इं बने कुमार सानू के साथ हुआ।

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