एक्ट्रेस और सांसद कंगना रनौत की फिल्म ‘भारत भाग्य विधाता’ सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। फिल्म 26/11 मुंबई आतंकी हमलों के दौरान सामने आई उन सच्ची कहानियों से प्रेरित है, जिनमें साहस, कर्तव्यनिष्ठा और मानवता की मिसाल देखने को मिली थी। फिल्म में विशेष रूप से मुंबई के कामा अस्पताल के डॉक्टरों, नर्सों और कर्मचारियों की बहादुरी को दिखाया गया है, जिन्होंने आतंक और अफरा-तफरी के बीच मरीजों की सुरक्षा को अपनी पहली जिम्मेदारी माना।
इन असली हीरोज में एक नाम नर्स अंजलि कुलथे का भी शामिल है। 26/11 की उस डरावनी रात, जब मुंबई में हर तरफ अफरा-तफरी और दहशत का माहौल था, तब अंजलि ने हिम्मत नहीं हारी। अस्पताल के आसपास गोलियां चल रही थीं, लेकिन उन्होंने अपनी जान की चिंता करने के बजाय मरीजों की सुरक्षा को सबसे पहले रखा।
अपनी समझदारी और सूझबूझ से उन्होंने कई लोगों को सुरक्षित रखने में मदद की। मुश्किल हालात में भी उनका शांत रहना और अपना फर्ज निभाना आज भी लोगों के लिए प्रेरणा की मिसाल है। उनकी यह कहानी आज भी इस बात की याद दिलाती है कि असली हीरो हमेशा वर्दी या हथियारों के साथ नहीं आते, बल्कि कई बार वे अस्पतालों के गलियारों में मरीजों की सेवा करते हुए मिलते हैं।
‘भारत भाग्य विधाता’ ऐसी ही सच्ची और कम चर्चित कहानियों को दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश है। फिल्म उन लोगों की बहादुरी को सामने लाती है, जिन्होंने मुश्किल वक्त में अपनी जान जोखिम में डालकर दूसरों की मदद की। यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि उन गुमनाम नायकों को श्रद्धांजलि है, जिनके साहस और सेवा को देश हमेशा याद रखेगा।
क्या है अंजलि कुलथे की कहानी?
26 नवंबर 2008 की रात अंजलि कुलथे मुंबई के कामा एंड अल्ब्लेस अस्पताल में अपनी नाइट ड्यूटी के लिए पहुंची थीं। उनकी देखरेख में 20 गर्भवती महिलाएं थीं। शुरुआत में सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन तभी खिड़की से बाहर झांकते हुए उन्होंने ऐसा नजारा देखा जिसने उन्हें हिला दिया। दो हथियारबंद आतंकवादी अस्पताल परिसर में घुस चुके थे और उन्होंने वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों पर गोली चला दी थी।
कुछ ही पलों में अस्पताल का माहौल पूरी तरह बदल गया। चारों तरफ डर और अफरा-तफरी फैल गई। ऐसे मुश्किल समय में अंजलि ने हिम्मत दिखाई और तुरंत वार्ड के दरवाजे बंद कर दिए। इसके बाद उन्होंने घबराई हुई मरीजों को अस्पताल के सुरक्षित हिस्सों में पहुंचाना शुरू किया। बाहर लगातार गोलियों की आवाजें आ रही थीं, धमाके हो रहे थे और ऐसा लग रहा था जैसे आतंक अस्पताल के दरवाजे तक पहुंच चुका हो।
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प्रसव में तड़प रही महिला के लिए उठाया जोखिम
हमले तेज होते जा रहे थे और इसी बीच अंजलि के सामने एक और बड़ी चुनौती आ खड़ी हुई। उनकी देखरेख में भर्ती एक गर्भवती महिला को अचानक प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। ऐसे समय में डिलीवरी टालना मां और बच्चे, दोनों के लिए खतरा बन सकता था। लेकिन लेबर रूम तक पहुंचना भी आसान नहीं था। पूरा अस्पताल आतंकियों के हमले की चपेट में था। लिफ्ट का इस्तेमाल करना सुरक्षित नहीं था, गलियारों में गोलियों की आवाजें गूंज रही थीं और धमाकों से इमारत कांप रही थी।
इन सबके बावजूद अंजलि ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने डरी हुई महिला का हाथ थामा और उसे सीढ़ियों के रास्ते धीरे-धीरे लेबर रूम तक पहुंचाया। हर कदम पर खतरा था, लेकिन उनकी पहली चिंता सिर्फ मां और उसके होने वाले बच्चे की सुरक्षा थी। बाद में अंजलि ने भी कहा था कि उस वक्त उनके मन में बस यही था कि मां और बच्चा दोनों सुरक्षित रहें।
आतंकी हमलों के बीच कराई डिलीवरी
आखिरकार वे लेबर रूम तक पहुंचने में कामयाब रहीं। वहां डॉक्टरों ने महिला की डिलीवरी करवाई और एक स्वस्थ बच्चे का जन्म हुआ। सबसे खास बात यह रही कि इतना बड़ा जोखिम उठाने के बाद भी अंजलि रुकी नहीं। वह तुरंत वापस अपने बाकी मरीजों के पास लौट गईं और उनकी देखभाल में जुट गईं। सुबह होने तक उनकी निगरानी में मौजूद सभी 20 गर्भवती महिलाएं सुरक्षित थीं।
बाद में अंजलि ने बताया कि उस रात उन्हें आगे बढ़ाने वाली चीज उनका जुनून और अपने काम के प्रति समर्पण था। उन्होंने बताया था, “मेरे अंदर एक जुनून था। मैं लोगों की मदद किए बिना मरना नहीं चाहती थी। अपनी नर्स की वर्दी ने मुझे यह सब करने की ताकत दी।”
अंजलि आज भी उस रात को याद करते हुए कहती हैं कि उन्होंने कभी अपनी सुरक्षा के बारे में नहीं सोचा। उनके मन में बस यही चिंता थी कि मरीजों को कुछ नहीं होना चाहिए। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था, “मुझे पता था कि गोली मुझे भी लग सकती है, लेकिन मैं यही सोच रही थी कि मरीज सुरक्षित रहें।”
अंजलि का मानना है कि उन्हें यह हिम्मत उनकी नर्स की वर्दी से मिली। उनके मुताबिक, उस वर्दी ने उन्हें अपने बारे में नहीं, बल्कि अपने मरीजों के बारे में सोचने की ताकत दी। उन्होंने कहा, “यह मेरी वर्दी की ताकत थी। उसी ने मुझे हर खतरे के बीच अपना फर्ज निभाने का हौसला दिया।”
पिता से मिला कर्तव्य के प्रति समर्पण
अंजलि के भीतर कर्तव्य के प्रति यह समर्पण कहीं न कहीं उनके पिता से आया था। वह अक्सर उन्हें अपनी सबसे बड़ी प्रेरणा बताती हैं। बताया जाता है कि 1979 में जब सांताक्रूज एयरपोर्ट पर भीषण आग लगी थी, तब उनके पिता कंट्रोल टॉवर में अपनी ड्यूटी पर तैनात थे। जहां बाकी लोग सुरक्षित जगहों पर जा रहे थे, वहीं उन्होंने तब तक अपनी पोस्ट नहीं छोड़ी, जब तक दो विमानों को सुरक्षित लैंडिंग के निर्देश नहीं दे दिए। अपने पिता की यही निष्ठा और साहस अंजलि के जीवन का हिस्सा बन गया।
जब लोगों ने अंजलि से पूछा कि क्या 26/11 की उस रात उन्हें डर लगा था, तो उनका जवाब कई लोगों को हैरान कर गया। उन्होंने कहा, “मुझे बिल्कुल डर नहीं लगा।” उस रात वह शाम 8 बजे अपनी 12 घंटे की ड्यूटी के लिए अस्पताल पहुंची थीं। कुछ देर बाद इमरजेंसी की तैयारी करने के निर्देश मिले और फिर गोलियों की आवाजें सुनाई देने लगीं। लेकिन उस वक्त उनके मन में अपनी जान बचाने का नहीं, बल्कि मरीजों को सुरक्षित रखने का ख्याल आया।
ऐसे बचाई मरीजों की जान
अंजलि ने सबसे पहले मरीजों से अपने मोबाइल फोन बंद करने को कहा और उन्हें भरोसा दिलाया कि जब तक वह उनके साथ हैं, उन्हें कुछ नहीं होगा। इसी बीच हाई ब्लड प्रेशर से जूझ रही एक गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई, जिससे हालात और गंभीर हो गए। अंजलि ने बाद में कहा था, “मुझे नहीं पता था कि मैं सब कुछ कैसे संभालूंगी, लेकिन इतना जरूर जानती थी कि उस महिला को सुरक्षित जगह पहुंचाना जरूरी है।”
अंजलि ने की थी अजमल कसाब की पहचान
हमलों के कुछ हफ्तों बाद अंजलि को देश के लिए एक और अहम जिम्मेदारी निभानी पड़ी। उन्हें जिंदा पकड़े गए आतंकी अजमल कसाब की पहचान के लिए बुलाया गया। परिवार वाले डरे हुए थे और उन्होंने अंजलि को जाने से मना भी किया, लेकिन अंजलि का मानना था कि किसी न किसी को आगे आना ही होगा। उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के कसाब की पहचान की। बाद में उन्होंने बताया कि कसाब ने मुस्कुराते हुए कहा था, “मैडम, आपने मुझे बिल्कुल सही पहचाना, मैं ही अजमल कसाब हूं।”
यह मुलाकात उन्हें इसलिए नहीं झकझोर गई क्योंकि वह डरी हुई थीं, बल्कि इसलिए क्योंकि उन्होंने एक ऐसे युवा चेहरे को देखा जिसमें अपने किए पर कोई पछतावा नजर नहीं आ रहा था। अंजलि ने कहा था, “मेरे माता-पिता रो रहे थे और मुझे रोक रहे थे, लेकिन मैंने उनसे कहा कि देश के लिए किसी न किसी को आगे बढ़कर अपना फर्ज निभाना होगा।”
उनकी बहादुरी और सेवा भावना के लिए बाद में उन्हें वीरता सम्मान से भी नवाजा गया। हालांकि इतने साल बीत जाने के बाद भी 26/11 की यादें उनका पीछा नहीं छोड़तीं। अंजलि कहती हैं, “आज भी जब पटाखों की आवाज सुनती हूं, तो एक पल के लिए मुझे 26/11 की वही रात याद आ जाती है।”
26/11 के हमलों में 166 लोगों की जान गई थी और 300 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। यह भारत के इतिहास के सबसे भयावह आतंकी हमलों में से एक था। लेकिन इस त्रासदी के बीच कुछ ऐसी कहानियां भी सामने आईं, जिन्होंने इंसानियत और साहस की नई मिसाल कायम की। अंजलि कुलथे की कहानी भी उन्हीं में से एक है। उन्होंने उस अंधेरी रात में दिखा दिया कि असली बहादुरी डर का न होना नहीं, बल्कि दूसरों की सुरक्षा के लिए खुद को दांव पर लगा देना है।
