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हमारी याद आएगी: जब ऊंघती तबस्सुम को देख रुकवा दी शूटिंग

बुलंद आवाज और धारदार संवाद अदायगी के लिए सराहे जाने वाले फिल्मकार और अभिनेता सोहराब मोदी नाटकों की दुनिया से फिल्मों में आए। 1931 में फिल्मों के बोलने से थियेटर की दुनिया में मंदी आई, तो मोदी ने नाटकों की दुनिया छोड़ 1931 में ‘खून का खून’ से फिल्म निर्देशन में शुरुआत की। उन्होंने ‘जेलर’, ‘पुकार’, ‘सिकंदर’, ‘पृथ्वीवल्लभ’, ‘झांसी की रानी’, ‘मिर्जा गालिब’ जैसी फिल्में बनाई। सोहराब मोदी ने नसीम बानो, मेहताब, मीना शौरी के साथ ही ‘महल’, ‘पाकीजा’, ‘रजिया सुल्तान’ जैसी फिल्में बनाने वाले लेखक, निर्माता, निर्देशक कमाल अमरोही को फिल्मों में मौका दिया। 1984 में अस्थि मज्जा के कैंसर से इस प्रखर राष्ट्रप्रेमी फिल्मकार का निधन हो गया। आज मोदी की 121वीं जयंती है।

फिल्मकार और अभिनेता सोहराब मोदी

किस्सा मशहूर है कि ‘मुगले आजम’ जैसी फिल्म के लेखकों में से एक कमाल अमरोही जब लाहौर में पढ़ रहे थे, तो उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर मशहूर गायक कुंदन लाल सहगल उन्हें अपने साथ मुंबई लेकर आए। मुंबई में सहगल ने अमरोही को सोहराब मोदी के हवाले कर दिया। मोदी पारसी थे, मगर उन्हें हिंदी-उर्दू का अच्छा ज्ञान था, लिहाजा कमाल अमरोही और मोदी की खूब जमी। अमरोही ने मोदी की कंपनी मिनर्वा मूवीटोन के लिए ‘जेलर’, ‘पुकार’ और ‘भरोसा’ जैसी फिल्में लिखीं। फिर एक ऐसा वक्त भी आया जब अमरोही को काम देने वाले मोदी को अमरोही की फिल्म ‘रजिया सुल्तान’ में उनके निर्देशन में अभिनय करना पड़ा। मोदी ने कई फिल्मों में अभिनय किया और बतौर निर्देशक 1969 में अपनी आखिरी फिल्म ‘समय बड़ा बलवान’ बनाई। इसके बाद मिनर्वा मूवीटोन का ‘डबल एम’ अक्षरों पर ऊपर की ओर मुंह करके खड़े शेर का प्रतीक चिह्न परदे से गायब हो गया।

मोदी सहृदय, परदुखकातर, उसूलों के पाबंद फिल्मकार थे। सिनेमा में उनकी अटूट श्रद्धा थी। फिल्में बनाना उनकी कमजोरी थी। इसका कई लोगों ने फायदा उठाया, जिससे मोदी को काफी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। उनकी सहृदयता का फायदा उनके करीबियों ने भी उठाया, जिसके कारण उनकी काफी अचल संपत्ति हाथ से चली गई। मुंबई में उनके कई घरों के साथ सिनेमा थियेटर भी था। यहां तक उनकी अभिनेत्री पत्नी मेहताब (गुजरात की रिसायत सचिन के नवाब की बेटी और ‘झांसी की रानी’ की हीरोइन) को पिता से मिली एक इमारत भी हाथ से चली गई, जो मुंबई के चर्च गेट इलाके में स्थित थी।

उन्होंने जिस लारा-लप्पा गर्ल मीना शौरी (खुर्शीद जहां) को ‘सिकंदर’ में मौका दिया था, वह सफलता मिलते ही उन्हें अंगूठा दिखाने लगी थीं। 1941 में शूटिंग देखने आर्इं मीना को सोहराब ने अपनी फिल्म ‘सिकंदर’ में तक्षशिला नरेश की बहन आंबी की भूमिका से परदे पर उतारा था। मीना ने निर्माता-निर्देशक रूप के शौरी से इश्क लड़ाना शुरू कर दिया (शौरी समेत उन्होंने पांच लोगों से निकाह किए) और मोदी के अनुबंध का खुलेआम उल्लंघन कर बाहर की फिल्में साइन कर लीं। तब मोदी ने उन्हें अदालत में खींच लिया था। अंत में पत्नी मेहताब के कहने से उन्होंने शौरी से लिए हर्जाने की राशि कम कर दी थी।

मोदी कितने परदुखकातर और दयालु थे, इसका किस्सा अभिनेत्री तबस्सुम अक्सर सुनाती थीं। मोदी की फिल्म ‘मझधार’ (1947) की शूटिंग के दौरान का किस्सा है, एक दिन जब बाल कलाकार तबस्सुम काम से थकी सेट पर ऊंघती दिखीं। मोदी ने तुरंत चिल्ला कर पैकअप कराया। शूटिंग रुकी तो फिल्म की हीरोइन खुर्शीद आईं। उन्होंने कहा कि वह कल लाहौर जा रही हैं और एक-दो महीने बाद लौटेंगी। उन्होंने कहा कि अगर आज शूटिंग पूरी नहीं की तो मोदी को दो महीने तक इंतजार करना पड़ेगा। सोहराब ने उनसे कहा कि कोई बात नहीं, वह दो नहीं छह महीने तक इंतजार कर लेंगे। लेकिन उनका जमीर गंवारा नहीं करता कि एक छोटी-सी बच्ची पर अत्याचार किया जाए। इस बच्ची को नींद की जरूरत है। पहले वह जरूरत पूरी होगी, बाद में काम किया जाएगा। तो ऐसे थे सोहराब मोदी जिन्हें सिनेमा प्रेमियों की एक पीढ़ी आज भी शिद्दत से याद करती है।

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