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‘पेश’ किए गए मुख्यमंत्री को पंसद नहीं करती उत्तराखंड की जनता, भुवन चंद्र खंडूड़ी और हरीश रावत हैं उदाहरण

उत्तरकाशी जिले की गंगोत्री विधानसभा सीट के बारे में 1952 से बना यह मिथक इस चुनाव में भी कायम रहा। इस सीट पर जिस राजनीतिक दल का उम्मीदवार जीतता है, राज्य में उसी दल की सरकार बनती है।

Author देहरादून | March 15, 2017 03:25 am
उत्तराखंड उपचुनाव: कांग्रेस सरकार तीन साल बाद पूर्ण बहुमत में आई

उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव को लेकर जो सियासी मिथक पहले विधानसभा चुनाव से चले आ रहे थे, वे मिथक इस विधानसभा चुनाव में भी नहीं टूटे। उत्तराखंड के पहले विधानसभा चुनाव 2002 में हुए थे। तब गढ़वाल मंडल की गंगोत्री और कुमाऊं मंडल की रानीखेत विधानसभा सीट को लेकर जो मिथक बने थे। वे इस विधानसभा चुनाव में भी नहीं टूटे हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट और उनकी रानीखेत विधानसभा सीट से जो दिलचस्प मिथक 2002 के पहले विधानसभा चुनाव में बना था वह मिथक 2017 के विधानसभा चुनाव में भी कायम रहा। उधर मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट किए गए उम्मीदवार को यहां की जनता नकार देती है। भुवन चंद्र खंडूड़ी और हरीश रावत इसके उदाहरण हैं। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष से यह मिथक जुड़ा हुआ है कि वे रानीखेत विधानसभा सीट से जब-जब चुनाव हारते हैं तब-तब उत्तराखंड में भाजपा की सरकार बनती है और जब-जब वे चुनाव जीतते हैं तब-तब उत्तराखंड में भाजपा की सरकार नहीं बनती है। 2002 में जब अजय भट्ट रानीखेत विधानसभा सीट से चुनाव हारे तो उत्तराखंड में भाजपा सत्ता से दूर हो गई और सूबे में नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बन गई। 2007 में भट्ट रानीखेत विधानसभा सीट से चुनाव हारे तो सूबे में भुवन चंद्र खंडूड़ी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बन गई। 2012 के विधानसभा चुनाव में भट्ट रानीखेत विधानसभा सीट पर चुनाव जीते तो भाजपा को सूबे में सत्ता से हाथ धोना पड़ा और विजय बहुगुणा के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बन गई। इस बार के विधानसभा चुनाव में अजय भट्ट रानीखेत विधानसभा सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार करन माहरा से करीब पांच हजार वोटों से हारे तो सूबे में भाजपा की प्रचंड बहुमत से सरकार बन गई। इस तरह अजय भट्ट की रानीखेत विधानसभा सीट से जीत और हार सूबे की सत्ता के समीकरणों को तय करती है। भट्ट की हार भाजपा के लिए सूबे में सत्ता पाने के लिए शुभ होती है और भट्ट की जीत भाजपा को सत्ता से बेदखल कर देती है।

इसी तरह गढ़वाल मंडल के उत्तरकाशी जिले की गंगोत्री विधानसभा सीट के बारे में 1952 से बना यह मिथक इस चुनाव में भी कायम रहा। इस सीट पर जिस राजनीतिक दल का उम्मीदवार जीतता है, राज्य में उसी दल की सरकार बनती है। उत्तराखंड में 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में गंगोत्री विधानसभा सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार विजयपाल सिंह सजवाण चुनाव जीते तो राज्य में कांगे्रस की सरकार बनी । 2007 में भाजपा के उम्मीदवार गोपाल सिंह रावत जीते तो सूबे में भाजपा की सरकार बनी और 2012 में फिर सजवाण इस सीट पर जीते तो कांगे्रस की सरकार बनी। इस बार विधानसभा चुनाव में फिर से भाजपा के गोपाल सिंह रावत चुनाव जीते और सूबे में भाजपा की सरकार बन गई। इस तरह उत्तराखंड के विधानसभा चुनाव को लेकर और कई मिथक भी सूबे के गठन के साथ ही बने हुए हैं। जो अब तक चले आ रहे हैं। उत्तराखंड में एक मिथक यह भी है कि जो मुख्यमंत्री एक बार बन गया वह दोबारा चुनाव जीतकर भी मुख्यमंत्री नहीं बन पाया। 2012 में भाजपा ने खंडूड़ी को मुख्यमंत्री के रूप में चुनाव लड़वाया। उन्हें चुनाव मैदान में उतारकर मुख्यमंत्री के रूप में फिर से पेश किया। परंतु खंडूड़ी मुख्यमंत्री रहते हुए कोटद्वार विधानसभा चुनाव से कांगे्रस के उम्मीदवार सुरेन्द्र सिंह नेगी से चुनाव हार गए।
इसी तरह इस बार विधानसभा चुनाव में कांगे्रस ने हरीश रावत को एक नहीं बल्कि दो-दो विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव मैदान में उतारा। और नारा दिया-उत्तराखंड रहे खुशहाल-हरीश रावत पूरे पांच साल। इस तरह कांग्रेस ने रावत को मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में चुनाव मैदान में पेश किया। रावत दोनों विधानसभा क्षेत्रों से चुनाव हार गए। इस तरह उत्तराखंड की जनता मुख्यमंत्री के रूप में चुनाव में पेश किए गए किसी भी मुख्यमंत्री को पसंद नहीं करती है।

उत्तराखंड के बारे में एक मिथक यह भी है कि जो राजनेता शिक्षा और पेयजल मंत्री होगा। वह दोबारा से चुनाव जीतकर विधानसभा नहीं पहुंच पाता है। हरीश रावत सरकार ने पेयजल और शिक्षा मंत्री रहे मंत्री प्रसाद नैथानी देवप्रयाग विधानसभा सीट से चुनाव हार गए। 2002 में उत्तराखंड की पहली निर्वाचित सरकार में शिक्षा मंत्री रहे नरेंद्र सिंह भंडारी और पेयजल मंत्री रहे शूरवीर सिंह सजवाण 2007 में दोनों ही विधानसभा चुनाव हार गए। इसी तरह भाजपा सरकार में शिक्षा मंत्री रहे गोविन्द सिंह बिष्ट खजानदास और पेयजल मंत्री रहे प्रकाश पंत 2012 में विधानसभा चुनाव हार गए थे। इसी तरह हरक सिंह रावत के बारे में यह मिथक है कि वे राजगठन से लेकर अब तक हर बार सीट बदलकर चुनाव जीत जाते हैं। यह मिथक रावत के बारे में इस बार भी सही साबित हुआ। 2002 और 2007 में वे कांग्रेस के टिकट पर लैंसडॉन से विधानसभा चुनाव जीते थे। 2012 में सीट बदलकर रूद्रप्रयाग से कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल की। इस बार भाजपा के टिकट पर उन्होंने सीट बदलकर कोटद्वार से चुनाव लड़ा और कांग्रेस सरकार के स्वास्थ्य मंत्री सुरेन्द्र सिंह नेगी को चुनाव हराकर जीत हासिल की। इस तरह उत्तराखंड के बारे में 2002 के चुनाव में जो चुनावी मिथक बने थे वे अब तक कायम है।

 

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