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उत्तराखंड में भाजपा की राजनीतिक मजबूरी

भाजपा हाईकमान और संघ के खांचे में सतपाल महाराज कांग्रेस पृष्ठभूमि की वजह से फिट नहीं बैठ पा रहे थे।

उत्तराखंड सीएम की शपथ लेते हुए त्रिवेंद्र सिंह रावत। (Photo Source: ANI)

उत्तराखंड में भाजपा के त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार की कमान संभाल ली है। मुख्यमंत्री के सरकारी आवास और दफ्तर पर हरीश रावत की जगह अब त्रिवेंद्र सिंह रावत की पट्टी टंग गई है।  त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाए जाने पर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने तंज कसते हुए कहा कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का नारा था ‘उत्तराखंड रहे खुशहाल, रावत पूरे पांच साल’। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ के रणनीतिकारों ने अमलीजामा पहनाया। हरीश रावत की जगह त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री बने। हरीश रावत ने इसके लिए भाजपा के नेताओं का शुक्रिया अदा किया। उन्होंने कहा कि वे नए मुख्यमंत्री को सकारात्मक सहयोग देंगे। त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाना भाजपा की राजनीतिक मजबूरी थी क्योंकि उत्तराखंड राजपूत बाहुल प्रदेश है। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों गढ़वाल और कुमाऊ में ठाकुर मतदाताओं का अच्छा खासा दबदबा है। उनमें भी खासतौर पर रावत समुदाय की ज्यादा पैठ है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की जगह भाजपा की किसी रावत या कोई और अन्य ठाकुर नेता को मुख्यमंत्री बनाना राजनीतिक विवशता थी।

सतपाल महाराज 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस छोड़कर भाजपा में मुख्यमंत्री बनने की तमन्ना लेकर शामिल हुए थे। इसके लिए उन्होंने अपनी पत्नी और पूर्व मंत्री अमृता रावत को विधानसभा का चुनाव नहीं लड़वाया। वह खुद चौबट्टाखाल विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़े ताकि वे विधायक बनने पर मुख्यमंत्री बनने के लिए खम ठोक सकें। मुख्यमंत्री की दौड़ में शुरूमें सतपाल महाराज सबसे आगे नजर आए। लेकिन भाजपा हाईकमान और संघ के खांचे में सतपाल महाराज कांग्रेस पृष्ठभूमि की वजह से फिट नहीं बैठ पा रहे थे। इसलिए संघ ने बड़ी चालाकी से अमित शाह के सामने त्रिवेंद्र रावत का नाम मुख्यमंत्री के लिए चुपके से रख दिया। शाह भी त्रिवेंद्र को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। उन्होंने तुरंत त्रिवेंद्र रावत के नाम पर मुहर लगा कर उन्हें उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनवा दिया।  संघ और भाजपा हाईकमान के सामने कुमाऊ के ब्राह्मण नेता प्रकाश पंत का नाम भी मुख्यमंत्री पद के लिए सामने आया। पंत को मुख्यमंत्री बनाने से भाजपा और संघ के रणनीतिकारों को यह खतरा था कि त्रिवेंद्र और सतपाल महाराज में से किसी एक के मुख्यमंत्री न बनने पर उत्तराखंड, खासकर गढ़वाल मंडल के ठाकुर मतदाता भाजपा से नाराज हो जाएंगे। इसका खमियाजा भाजपा को 2019 के लोकसभा चुनाव में भुगतना पड़ सकता था। इसलिए भाजपा के रणनीतिकारों की यह मजबूरी बन गई कि प्रकाश पंत और सतपाल महाराज की जगह मुख्यमंत्री के रूप में त्रिवेंद्र रावत को सामने लाया जाए।

त्रिवेंद्र रावत के मुख्यमंत्री बनने से गढ़वाल के ठाकुर मतदाताओं को साधा जा सकता है। भले ही त्रिवेंद्र के मुख्यमंत्री बनने से सतपाल महाराज खफा हो जाएं, तब भी भाजपा से ठाकुर मतदाता छिटकेगा नहीं। क्योंकि त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्री बनने से ठाकुर मतदाता भाजपा से बंधा रहेगा। यदि पंत मुख्यमंत्री बनते तो ठाकुर मतदाता सीधे कांग्रेस के दिग्गज नेता हरीश रावत की झोली में फिर से वापस चला जाता। इस बार विधानसभा चुनाव में गढ़वाल और कुमाऊ के पर्वतीय क्षेत्रों का ठाकुर मतदाता कांग्रेस से पूरी तरह छिटककर भाजपा की झोली में आ गया। भाजपा की इन्हीं राजनीतिक मजबूरियों के चलते त्रिवेंद्र रावत की लॉटरी खुल गई। उनके राजनीतिक नसीब ने उन्हें उत्तराखंड के मुख्यमंत्री की कुर्सी दिलवा दी। संघी अतीत और अमित शाह से नजदीकी भी उनके हिस्से में आई।

 

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