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चुनावी वैतरणी पार करने के लिए बड़े नेताओं पर टिकी आस

राजनीतिक दलों की भीतरी गुटबाजी और पार्टी पदाधिकारियों की प्रत्याशी से दूरी का असर इस बार गौतमबुद्धनगर की तीनों विधानसभा सीटों पर देखने को मिल रहा है।

Author नोएडा | January 25, 2017 1:38 AM

राजनीतिक दलों की भीतरी गुटबाजी और पार्टी पदाधिकारियों की प्रत्याशी से दूरी का असर इस बार गौतमबुद्धनगर की तीनों विधानसभा सीटों पर देखने को मिल रहा है। 25 जनवरी तक नामांकन प्रक्रिया पूरी होने के बाद सभी राजनीतिक दलों के कितने विरोधी प्रत्याशियों ने पर्चे दाखिल किए हैं, इसका पता चलेगा। हालांकि 27 जनवरी को नामांकन वापस लेने के बाद चुनावी समर की स्पष्ट स्थिति सामने होगी। हालांकि बसपा को छोड़कर भाजपा और सपा-कांग्रेस गठबंधन, दोनों को अपनों के बीच की खींचतान का खतरा महसूस हो रहा है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव प्रचार के लिए कम समय मिलने के कारण प्रमुख राजनीतिक दल बड़े नेताओं को बुलाकर मतदाताओं पर पकड़ बनाना चाह रहे हैं। हालांकि प्रदेश में कई चरणों में चुनाव होने की वजह से बड़े नेताओं की जनसभा को संबोधित करने की संभावना भी है, लेकिन माना जा रहा है कि प्रत्याशी नजदीकी मुकाबले वाली सीटों पर ही बड़े नेताओं को बुलाने में कामयाब होंगे। इस कड़ी में दो बार नोएडा आ चुके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाजपा में सबसे ज्यादा मांग है। वहीं बसपा मुखिया मायावती और मुख्यमंत्री रहते हुए नोएडा आने से परहेज करने वाले सपा चेहरे अखिलेश यादव को बुलाने को लेकर प्रत्याशियों ने संपर्क साधना शुरू कर दिया है।

यह भी माना जा रहा है कि एक राजनीतिक दल के बड़े नेता की जनसभा की काट के रूप में दूसरी पार्टियां अपने बड़े नेताओं का कार्यक्रम तय करेंगी। शहर में 11 फरवरी को होने वाले मतदान से 4-5 दिन पहले बड़े नेताओं के कार्यक्रम होने की उम्मीद है।टिकट कटने से नाराज पदाधिकारियों और बाहरी व्यक्ति को प्रत्याशी बनाने के विरोध के अलावा मतदाताओं की संख्या बढ़ने या घटने से पड़ने वाले असर का आकलन भी प्रत्याशियों की नींद उड़ा रहा है। नोएडा समेत पूरे जिले में 55-58 फीसद मतदान होता रहा है, जिसको 75 फीसद तक ले जाने की कोशिश है। ऐसे में 15-20 फीसद मतदान बढ़ने पर किस को फायदा और नुकसान हो सकता है, इसको लेकर संगठनों के भीतर माथापच्ची शुरू हो गई है। माना जा रहा है कि आरएसएस, बामसेफ, लोहिया वाहिनी समेत अन्य घटक दल इसका आकलन कर रणनीति तैयार करने में लग गए हैं। नोएडा में प्रत्याशी के बाहरी या स्थानीय होने का ज्यादा बड़ा असर नहीं है। चूंकि शहर की ज्यादातर आबादी बाहर से आने वालों की ही है, ऐसे में बाहरी के मुकाबले स्थानीय मतदाताओं की संख्या काफी कम है। इसके विपरीत दादरी और जेवर में स्थानीय और बाहरी एक बड़ा मुद्दा है। इसको ध्यान में रखकर राजनीतिक दलों ने स्थानीय नेताओं को ही चुनावी मैदान में उतारा है।

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