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उत्तर प्रदेश चुनाव: सिर्फ 23 मुस्लिम विधायक ही पहुंच पाए सदन, राज्य के अब तक के इतिहास में सबसे कम

उत्तर प्रदेश की 147 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुसलमान मतदाता किसी भी दल के उम्मीदवार की हार-जीत का फैसला करने की हैसियत रखता है।

Author लखनऊ | March 13, 2017 4:48 AM
उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में जीत का जश्न मनाते भाजपा कार्यकर्ता। ( Photo Source: PTI)

उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के हक की बात करने वाली समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की इस बिरादरी के मतों को लेकर मची आपसी खींचतान, कौम की नुमाइंदगी पर भारी पड़ गई। जिसके चलते इस बार के विधानसभा चुनाव में अब तक के इतिहास के सबसे कम 23 विधायक ही जीत पाने में कामयाब हो सके। जबकि उत्तर प्रदेश की 147 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां मुसलमान मतदाता किसी भी दल के उम्मीदवार की हार-जीत का फैसला करने की हैसियत रखता है।  उत्तर प्रदेश की 403 विधान सभा सीटों में से 147 पर मुसलमान मतदाता सर्वाधिक है। इनमें रामपुर जिला सर्वप्रथम हैं जहां मुसलमान मतदाताओं का फीसद 42 है। मुरादाबाद में 40, बिजनौर में 38, अमरोहा में 37, सहारनपुर में 38, मेरठ में 30, कैराना में 29, बलरामपुर और बरेली में 28, संभल, पडरौना और मुजफ्फरनगर में 27, डुमरियागंज में 26 और लखनऊ, बहराइच व कैराना में मुसलमान मतदाता 23 फीसद हैं। इनके अलावा शाहजहांपुर, खुर्जा, बुलन्दशहर, खलीलाबाद, सीतापुर, अलीगढ़, आंवला, आगरा, गोंडा, अकबरपुर, बागपत और लखीमपुर में मुस्लिम मतदाता कम से कम 17 फीसद है। मुसलमान मतदाताओं की इतनी बड़ी संख्या के बावजूद सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में उत्तर प्रदेश से एक भी मुस्लिम सांसद जीत का स्वाद चख पाने में कामयाब नहीं हो सका। सोलहवीं लोकसभा के चुनाव सरीखा हाल उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी रहा। इस चुनाव में महज 23 मुसलमान उम्मीदवार जीत कर विधायक बन पाने में कामयाब हो सके।

उत्तर प्रदेश के सियासी इतिहास में मुस्लिम नुमाइंदगी की यह संख्या सबसे कम है। 1991 में भी 23 मुस्लिम विधायक जीत दर्ज कर पाये थे। यदि वर्ष 1951 में उत्तर प्रदेश में हुए पहले विधानसभा चुनावों की बात की जाय तो इस चुनाव में 44 मुस्लिम विधायक जीते थे। 1957 में यह संख्या घट कर 37 रह गई थी। उसके बाद 1962 के विधानसभा चुनाव में 29 उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। जबकि 1967 में यह संख्या घट कर 24 पर आ टिकी। इस चुनाव में मुसलमानों की कम नुमाइंदगी को देखते हुए अल्पसंख्यक मतदाताओं ने 1969 के चुनाव में 34, 1974 में 40, 1977 में 48, 1980 में 49 और 1985 में 50 उम्मीदवारों को जिताकर विधानसभा भेजा। उत्तर प्रदेश में वर्ष 1985 में हुए विधानसभा चुनावों के बाद मतदाताओं की इस बिरादरी में सेंधमारी शुरू हुई। जिसका नतीजा रहा कि 1989 में इनकी संख्या 50 से घटकर 41 पर आ ठहरी। जो 1991 में और घटी और 23 पर आकर सिमट गई। वर्ष 2002 में मुसलमानों ने अपनी घटती नुमाइंदगी को संदीजगी से लिया। जिसके चलते उनके 44 विधायकों ने जीत दर्ज की। 2007 में यह संख्या बढ़कर 57 तक पहुंच गई। इस चुनाव में बसपा को पूर्ण बहुमत मिला था। लेकिन वर्ष 2012 में हुए चुनाव में उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक 68 विधायक जीत कर विधानसभा पहुंचने में कामयाब रहे।

मुसलमानों की इस विधानसभा चुनाव में घटी नुमाइंदगी की बाबत वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक राजेंद्र कुमार कहते हैं, सपा और बसपा दोनों ने मुसलमान मतदाताओं की सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे। जिसकी वजह से अधिकांश स्थानों पर मुसलमान वोट दोनों दलों के बीच बंट गये। जबकि भारतीय जनता पार्टी ने एक भी मुसलमान को टिकट न देकर हिन्दू मतदाताओं को अपने पक्ष में करने में खासी कामयाबी हासिल की। जिसका नतीजा सामने है।

 

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