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उत्तर प्रदेश चुनाव: मिर्जापुर में सिर्फ जातीय दांवपेच, रोजी-रोटी मुद्दा नहीं

गलीचों का शहर मिर्जापुर चुनावी समर में है। जिले में बुनकरों का अपने दस्तकारी के हुनर से विमुख होना कोई मुद्दा नहीं है।

Author मिर्जापुर | Updated: March 6, 2017 4:45 AM
UP elections 2017, uttar pradesh elections, BJP, samajwadi party, congress, RLD, BSP, amit shah, UP first phase voting, western UP voting, UP first phase winner, election newsउत्‍तर प्रदेश में पहले चरण के तहत 73 सीटों पर मतदान हो चुका है।

राजेन्द्र तिवारी 

गलीचों का शहर मिर्जापुर चुनावी समर में है। जिले में बुनकरों का अपने दस्तकारी के हुनर से विमुख होना कोई मुद्दा नहीं है। न ही पत्थर उद्योग पर छाया संकट और पीतल उद्योग पर पड़ रही मार। ये सभी मुद्दे काफी पीछे छुट चुके हैं। पूरा चुनाव जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूम रहा है। अर्द पहाड़ी आदिवासी बहुल पाषाणकालीन मिर्जापुर जिले में पांच विधानसभा सीट क्रमश: नगर, छानबे, मझवां, चुनार और मड़िहान है। पिछले चुनाव में तीन सीट नगर, छानबे और चुनार पर सपा, मझवां पर बसपा और मड़िहान पर कांग्रेस का कब्जा रहा है। पिछले चुनाव में यहां भाजपा आश्चर्यजनक रूप से तीसरे पायदान पर रही थी। यही स्थिति कमोवेश 2002, 2007 में भी थी। हालांकि 2002, 2007 के चुनाव में चुनार की सीट भाजपा के कद्दावर नेता ओमप्रकाश सिंह ने जीतकर आंसू पोछे थे। पर पिछले चुनाव में सिंह तीसरे स्थान पर रहे थे। इस बार हालात बदले हैं। भ्यहां सभी सीटों पर तिकोना मुकाबला दिख रहा है।

यहां नगर सीट पर राज्यमंत्री कैलाश चौरसिया चौका लगाने के लिए मैदान में हैं। पिछले तीन चुनाव से वे जीत रहे हैं। कभी भाजपा की गढ़ रही इस सीट का गृहमंत्री राजनाथ सिंह प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। यहां भाजपा ने विन्ध्यधाम के तीर्थ पुरोहित रत्नाकर मिश्र को टिकट दिया है तो बसपा ने कारपेट व्यवसायी परवेज खां को मैदान में उतारा है। यहां तीनों प्रत्याशी अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे है। मतदाता शांत है। लिहाजा वही पुराना जातीय समीकरण ही प्रभाव में है। कुल मिलाकर जिले के सभी सीटों पर न कोई उत्तेजना है न ही कोई लहर।

सब कुछ जातीय समीकरणों पर जोड़ा घटाया जा रहा है। इसमें पढ़े-लिखे से लेकर निरक्षर तक शामिल हैं। पूरे मण्डल में समाजवादी पार्टी ने एक भी यादव को नहीं लड़ाया है। इसे एक जुआ भी माना जा रहा है। यादवों में नाराजगी स्पष्ट दिख रही है। वहीं भाजपा ने सोशल इंजीनियरिंग के तहत टिकट का बंटवारा किया है। मतदाताओं की खामोशी और जातियों की लामबंदी क्या गुल खिलाएगी इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है।

 

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