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यूपी: दो साल की स्टडी के बाद नरेंद्र मोदी की छवि बदल रही बीजेपी, 6 बातें मानकर लड़ रही चुनाव, पर है एक बड़ी चुनौती

उत्तर प्रदेश की छह बड़ी ओबीसी जातियों में से केवट और निषाद शायद आगामी विधान सभा चुनाव में बीजेपी में शायद ज्यादा तवज्जो पाएं।

Author January 12, 2017 10:33 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (बाएं) के साथ बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह। (फोटो-पीटीआई)

आज से ठीक एक महीने बाद उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के लिए मतदान शुरू होगा। प्रदेश में 11 फरवरी से आठ मार्च के बीच सात चरणों में मतदान होगा। चुनाव के नतीजे 11 मार्च को आएंगे। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का मानना है कि यूपी के चुनाव से 2019 के लोक सभा चुनाव का रुझान मिल जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने पहले माना था कि प्रदेश में मुख्य मुकाबला बीजेपी और समाजवादी पार्टी (सपा) के बीच होगा। बीजेपी ने साल 2014 को लोक सभा चुनाव में 71 सीटों पर जीत हासिल की थी। इन लोक सभा सीटों में 337 विधान सभा सीटें आती हैं। पार्टी को लग रहा है कि हर विधान सभा सीट पर उसके पास एक दर्जन से ज्यादा विकल्प हैं।

पार्टी को दूसरे दलों से आए नेताओं से भी काफी उम्मीद है। बहुजन समाज पार्टी(बसपा) के कद्दावर नेता स्वामी प्रसाद मौर्य अब बीजेपी में हैं। अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के विधान दल के नेता दलबीर सिहं भी बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। पिछले साल अक्टूबर में जब यूपी कांग्रेस की अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी बीजेपी में शामिल हो गयीं।वहीं कांग्रेस के छह विधायक, सपा के तीन और अब तक बसपा के 13 विधायक बीजेपी में आ चुके हैं।

भारतीय जनता पार्टी  पिछले दो सालों से यूपी की सामाजिक-राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक स्थितियों का मूल्यांकन कर रही है। पार्टी अपने अध्ययन से छह नतीजों पर पहुंची है। विधान सभा चुनावों में पार्टी के फैसलों में इन बातों का विशेष ध्यान रखा जा सकता है।

1- पार्टी के अनुसार उत्तर प्रदेश का मतदाता तमाम दिक्कतों के बाद मान रहा है कि नोटबंदी से उसे फायदा होगा। बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार मतदाताओं को लग रहा है कि “मोदीजी ने जो किया उससे मेरा फायदा है।” बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार औसत मतदाता मोदीजी से खफा नहीं है और वो नोटबंदी लागू करने की मंशा और उसे लागू करने में आयी दिक्कतों के बीच फर्क कर सकता है।

2- बीजेपी का मानना है कि यूपी अविकसित भारत का “केंद्र” है। राज्य की 75 प्रतिशत आबादी की आमदनी पांच हजार रुपये महीने से कम है। पार्टी नेतृत्व दो साल से किसानों, खेती के पैटर्न और कृषि नीतियों का अध्ययन किया है। पार्टी इसी अध्ययन के अनुसार रणनीति बना रही है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह इस मसले पर प्रदेश पर पूरा जोर लगा रहे हैं।

3- बीजेपी को उम्मीद है कि आगामी विधान सभा चुनाव में प्रदेश के मुसलमान वोटों का बंटवारा होगा। पार्टी को लगता है कि मुसलमान मुलायम सिंह यादव पर भरोसा करते हैं। पार्टी के मुस्लिम नेता खुद को साबित करने के लिए अपना  पूरा जोर लगा देंगे। ऐसे में बसपा को मुसलमानों का पूरा वोट नहीं मिलेगा। इस तरह सपा और बसपा दोनों ही बीजेपी से आगे नहीं निकल पाएंगी।

4- बीजेपी का मानना है कि समाजवादी पार्टी की अंदरूनी लड़ाई का उसे फायदा मिलेगा। बीजेपी का मानना है कि बुजुर्ग मुलायम सिंह यादव को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाकर अखिलेश यादव ने “ऐतिहासिक भूल” की है। बीजेपी का मानना है कि सपा मतदाता अखिलेश की इस “गुस्ताखी” को “बर्दाश्त” नहीं करेंगे। बीजेपी अखिलेश और कांग्रेस के बीच होने वाले गठबंधन पर नजर बनाए हुए है लेकिन उसे उम्मीद है कि अखिलेश अपने पिता की बराबरी नहीं कर पाएंगे। पार्टी माफियाओं और गुंडों के मसले पर अखिलेश के “दोहरे” रवैये पर तीखा राजनीतिक हमला करेगी।

5- बीजेपी का मानना है कि यूपी के वोटर का मूल मंत्र होगा, “मोदी के साथ रहना है।” हालांकि पार्टी बिहार के उलट पार्टी चुनाव के दौरान होर्डिंगों और पोस्टरों पर मोदी और शाह के साथ स्थानीय नेताओं को भी जगह देगी।

6- बीजेपी का मानना है कि मायावती बसपा के संस्थापक कांशी राम के पाये की संगठनकर्ता नहीं हैं। मायावती प्रदेश के सभी मुसलमानों को अपने साथ लाने में सफर नहीं रहेंगी। और अगर बसपा कुछ या काफी मुसलमान वोटरों को अपने साथ लाने में कामयाब रहीं तो इससे बीजेपी को फायदा ही होगा।

बीजेपी की जातीय रणनीति- बीजेपी की जातीय रणनीति कमोबेश लोक सभा चुनाव वाली ही रहेगी। बीजेपी गैर-यादव ओबीसी वोटरों और गैर-जाटव दलित वोटरों को अपने साथ लाने के लिए पूरा जोर लगा रही है। पार्टी ब्राह्मण, बनिया और राजपूत वोटरों को अपने साथ मानती है। प्रदेश की छह बड़ी ओबीसी जातियों में से केवट और निषाद शायद इस बार बीजेपी में ज्यादा तवज्जो पाएं।

पीएम नरेंद्र मोदी की नई छवि- बीजेपी का मानना है कि नोटबंदी से हुई मुश्किलों और आर्थिक दिक्कतों का सामना करने के लिए यूपी मे ंपार्टी की जीत जरूरी है। पार्टी इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की “गरीबपरस्त” छवि निर्माण की कोशिश करेगी। अगर यूपी में पार्टी को सफलता मिली तो पीएम मोदी की इस छवि का आगे भी इस्तेमाल किया जाएगा। बीजेपी का मानना है कि यूपी के चुनाव में जातिगत समीकरण और पीएम मोदी की करिश्माई छवि की अहम भूमिका होगी। शायद यही वजह है कि बीजेपी ने यूपी के मुख्यमंत्री पद के लिए किसी उम्मीदवार के नाम की घोषणा नहीं की है।

बीजेपी की सबसे बड़ी मुश्किल- बीजेपी की सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि उसके पास प्रदेश की सभी 403 सीटों के लिए “उपयुक्त, साधनसम्पन्न और जिताऊ उम्मीदवार” नहीं हैं। बीजेपी के उलट सपा और बसपा के पास सभी सीटों पर ऐसे नेताओं की लम्बी लिस्ट है जो कई चुनाव लड़ चुके हैं। इसके साथ ही अमित शाह के उलट पार्टी के कई नेताओं को आशंका है कि नोटबंदी के बाद आए आर्थिक दिक्कतों का विपरीत असर भी पड़ सकता है।

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