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सपा के युद्ध से दुविधा में उत्तर प्रदेश के यादव-मुसलमान, आखिर करें तो क्या करें?

उत्तर प्रदेश की 403 विधान सभा सीटों में से 147 ऐसी हैं जहां मुसलमान मतदाता हार जीत का फैसला करने की सियासी कुव्वत रखता है।

समाजवादी पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव। (PTI File Photo)

समाजवादी पार्टी में छिड़े घमासान ने उत्तर प्रदेश के मुसलमानों को दुविधा में ला खड़ा किया है। वे अब यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि आखिर करें तो क्या करें? समाजवादी पार्टी के पारम्परिक कहे जाने वाले इस वोट बैंक में फैली सियासी अनिश्चितता ने बहुजन समाज पार्टी की बांछें खिला दी हैं। यही वजह है कि समाजवादी पार्टी ने इस मर्तबा 97 मुसलमानों को अपना प्रत्याशी घोषित किया है। इस बात का इस्तकबाल खुद बसपा सुप्रीमों मायावती ने किया। वर्ष 2007 से बहनजी सपा के पारम्परिक वोट बैंक में सेंधमारी की जुगत में हैं। उत्तर प्रदेश की 403 विधान सभा सीटों में से 147 ऐसी हैं जहां मुसलमान मतदाता हार जीत का फैसला करने की सियासी कुव्वत रखता है। यह सीटें दरअसल हैं कहां? इस बात का इल्म भी जरूरी है। इनमें रामपुर सर्वप्रथम हैं जहां मुसलमान मतदाताओं का प्रतिशत 42 है। मुरादाबाद में 40, बिजनौर में 38, अमरोहा में 37, सहारनपुर में 38, मेरठ में 30, कैराना में 29, बलरामपुर और बरेली में 28, संभल, पडरौना और मुजफ्फरनगर में 27, डुमरियागंज में 26 और लखनऊ, बहराइच व कैराना में मुसलमान मतदाता 23 प्रतिशत हैं। इनके अलावा शाहजहांपुर, खुर्जा, बुलन्दशहर, खलीलाबाद, सीतापुर, अलीगढ़, आंवला, आगरा, गोंडा, अकबरपुर, बागपत और लखीमपुर में मुस्लिम मतदाता कम से कम 17 प्रतिशत है।

उत्तर प्रदेश की सियासत में इतनी निर्णायक भूमिका में होने के बावजूद वर्ष 2014 में हुए सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में एक भी मुसलमान सांसद यहां से जीत दर्ज कर पाने में कामयाब नहीं हो सका। इस बात का गहरा मलाल मतदाताओं की इस बिरादरी को है। इस बाबत वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक राजेन्द्र कुमार कहते हैं, उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को रोकने के लिए मुसलमान लामबन्द हो रहा था। लोकसभा चुनाव में प्रदेश की 80 में से 73 सीटें जीत कर पूर्ण बहुमत से केन्द्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद वह उत्तर प्रदेश में इसकी पुनरावृत्ति नहीं होने देना चाहता था। लेकिन समाजवादी पार्टी में मचे आपसी घमासान ने उसके सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। अब वह यह तय नहीं कर पा रहा है कि ऐन चुनाव के समय वह अपना नया सियासी मसीहा कहां से खोज के लाय?

मुसलमानों के बीच पनपी इस असुरक्षा को भांप कर मायावती ने बड़ा सियासी दांव चला है। मंगलवार को उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के कांग्रेस के साथ गठबन्धन की चाहत को अपने पक्ष में बेहद चतुराई से मोड़ने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि गठबन्धन की आवश्यकता उसी को होती है जो कमजोर होता है। ऐसा कह कर उन्होंने अनिश्चितता के भंवर में फंसले मुसलमानों को अपने पाले में करने का दांव चला है। साथ ही वे यह बता पाने में भी कामयाब रहीं कि आगामी विधानसभा चुनाव में उन्होंने उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से 97 पर मुसलमान प्रत्याशियों को अपना उम्मीदवार बनाया है।

समाजवादी पार्टी में मचे आपसी घमासान का उसके पारम्परिक मुसलमान मतदाता पर दरअसल असर क्या हो रहा है? की बाबत समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और अखिलेश यादव के करीबी राजेन्द्र चौधरी कहते हैं, उत्तर प्रदेश का मुसलमान यह तय कर चुका है कि वह अखिलेश यादव के साथ रहेगा। इस बात को कहने के पीछे आधार क्या है? क्या टीम अखिलेश ने ऐसा कोई सर्वेक्षण कराया है जिससे उसे यह जानकारी मिली हो कि मुसलमान मुलायम सिंह यादव के भरोसे को तोड़कर उनके साथ आ खड़ा होगा। इस बात का जवाब फिलहाल समाजवादी पार्टी का हर बड़ा व छोटा नेता देने से बचता नजर आ रहा है। उधर भारतीय जनता पार्टी राहत की सांस ले रही है। भाजपा के वरिष्ठ नेता ह्रदय नारायण दीक्षित कहते हैं, उत्तर प्रदेश की उन 147 विधानसभा सीटों पर जहां मुसलमान हार-जीत का अंतर तय करते हैं वहां वो उसी को वोट देंगे जो भाजपा को पराजित करना हुआ दिखेगा। ऐसे में न ही वो बसपा के साथ जाएंगे और न ही सपा अथवा कांग्रेस के साथ। ऐसे में संगठित होने की जगह मुसलमान मतदाताओं के बंटने का खतरा ज्यादा है।

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