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उत्तर प्रदेश चुनाव: सत्ता की चाबी है गांव की मतदाता आबादी, 404 में से 299 सीटें ग्रामीण इलाके से

पिछले कई चुनावों के नतीजों से साफ है कि विधानसभा चुनाव में उसी राजनीतिक दल का परचम लहराता है जिसपर ग्रामीण मतदाता ने अपना भरोसा जताया।

Author नई दिल्ली | February 28, 2017 5:18 AM
UP Assembly 5th Phase Elections, 607 candidate EVM, UP Assembly Elections 2017, UP Assembly Elections 5th phaseउत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पांचवें चरण में फैज़ाबाद में एक मतदान केंद्र के बाहर वोट डालने के लिए अपनी बारी के लिए कतार में खड़ी महिलाएं। (PTI Photo/27 feb, 2017)

उत्तर प्रदेश में सत्ता तो उसी पार्टी को हासिल होती रही है जिसकी सूबे के ग्रामीण अंचल में लहर और पैठ बनी रही। यही वजह है कि इस बार भी विधानसभा चुनावों में लगभग सभी दलों ने ऐसे उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है जिनको लेकर उन्हें यह भरोसा है कि वे इलाकाई पैठ रखते हैं जो वोट दिलाने की पहली शर्त है। सूबे की कुल 403 विधानसभा सीटों में से 299 सीटें ग्रामीण अंचल की हैं। ऐसे में विधानसभा चुनावों के दौरान विभिन्न दलों की ओर से ग्रामीण इलाके के लोगों खासतौर पर किसानों के लिए लुभावने वादों का पिटारा एक बार फिर खुल गया है। देहात में जिसकी जितनी मजबूत पकड़ उसकी उतनी अधिक सीटों का सीधा गणित ही चुनावी माहौल में विभिन्न दलों के छोटे-बड़े नेताओं को गांवों की पगडंडियों व कस्बों के चौराहों तक पहुंचा रहा है। ग्रामीण इलाके की वोटों की इस फसल को काटने के लिए भाजपा, बसपा, सपा-कांग्रेस आदि पार्टियां अपनी कोशिशों में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं।

पिछले कई चुनावों के नतीजों से साफ है कि विधानसभा चुनाव में उसी राजनीतिक दल का परचम लहराता है जिसपर ग्रामीण मतदाता ने अपना भरोसा जताया। पिछली बार समाजवादी पार्टी को जो बहुमत हासिल हुआ उसकी मुख्य वजह ग्रामीण इलाकों में उसकी बड़ी जीत रही। सपा को ग्रामीण इलाकों की कुल 179 सीटों पर जीत मिली थी। शायद यही कारण है कि कभी जड़ों तक पैठ रखने का दावा करने वाली कांग्रेस पार्टी ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान सूबे के ग्रामीण अंचल में कम हुई अपनी पैठ को देखते हुए सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया हुआ है। कांग्रेस सपा का सहारा लेकर और सपा कांग्रेस का सहारा लेकर ग्रामीण इलाके के वोटर को पाले मेंं बनाए रखने की कोशिश में है।
निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 2012 में कुल 403 में से 224 सीटें जीतने वाली सपा को जहां शहरी क्षेत्र में बमुश्किल 25.45 फीसद वोट मिले वहीं ग्रामीण इलाके से 30.44 फीसद वोट। ग्रामीण इलाकों में बेहतरीन प्रदर्शन करने के बाद भी इस बार सपा ने कांग्रेस से जो हाथ मिलाया है उसकी एक वजह यह भी है कि 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को हासिल कुल सीटों में से 19 ग्रामीण इलाकों से मिलीं थीं। ग्रामीण क्षेत्र से तब कांग्रेस को 11.24 फीसद वोट हासिल हुए थे।बहुजन समाज पार्टी का मुख्य जनाधार ग्रामीण इलाके का वोटर माना जाता है। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा को कुल 80 सीटें मिली थीं। इनमें 62 सीटें ग्रामीण इलाको की थीं। जबकि 165 सीटों पर उसके उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहे। बसपा प्रमुख मायावती ने इन नतीजों को ध्यान में रखते हुए पिछले एक अरसे से अपने काडर वोट को संगठित करने की मुहिम चला रखी है। इस काम में पार्टी की विभिन्न इकाइयों व समितियों को भी जोड़ा गया।

हालांकि लोकसभा चुनाव में मोदी की लहर का नतीजा सामने आया पर जमीनी सच्चाई को समझते हुए भाजपा ने भी इस विधानसभा चुनाव में ग्रामीण इलाकों में पूरा जोर लगा रखा है। सूबे के ग्रामीण इलाके में अपनी पैठ बनाने के लिए पार्टी ने किसानों की पूरी तरह कर्ज माफी का तुरुप भी चला हुआ है। यहां तक कि भाजपा ने अपना जो संकल्प पत्र जारी किया उसमें किसानों व खेती को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। भाजपा ने इसके साथ ही पूर्वांचल व बुंदेलखंड के विकास के लिए अलग से विकास बोर्ड के गठन व बुंदेलखंड की पेयजल समस्या को दूर करने के लिए केन-बेतवा लिंक को शुरू करने की बात कही हुई है।
चार-चार गांवों को जोड़ कर मिनी सचिवालय बनाने का भी भाजपा का संकल्प है।

 

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