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उत्तर प्रदेश चुनाव: शामली में होगा भाजपा के हिंदु पलायन मुद्दे का इम्तिहान

सपा के जाट को न मुसलमान वोट देंगे और न अजित के मुसलमान को जाट। ऐसे में भाजपा के सुरेश राणा ही ध्रुवीकरण के चलते भारी अंतर से फिर जीत दर्ज करेंगे।

Author शामली | February 5, 2017 3:59 AM
भारतीय जनता पार्टी के विधायक और योगी सरकार में मंत्री सुरेश राणा।

अनिल बंसल

शामली के चुनावी नतीजे तय करेंगे कि हिंदुओं के पलायन के भाजपा के मुद्दे का क्या नफा नुकसान है। मुजफ्फरनगर जिले का विभाजन कर शामली जिला पिछले दिनों ही बना था। यहां विधानसभा की तीन सीटें हैं। थाना भवन, कैराना और शामली। फिलहाल भाजपा के पास केवल थाना भवन है। अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल के साथ जाटों के झुकाव के कारण भाजपा को इस जिले में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने में पसीना आ रहा है। 2013 में हुए सांप्रदायिक दंगों से यही जिला सबसे ज्यादा प्रभावित था। पिछले दिनों इलाके के भाजपा सांसद हुकुम सिंह ने कैराना से हिंदुओं के पलायन का मुद्दा भी उठाया था। भाजपा ने इसे चुनावी एजंडा भी बनाया है।

कैराना हुकुम सिंह का गढ़ रहा है। चौधरी चरण सिंह और कांग्रेस दोनों के साथ उनका सियासी जुड़ाव रहा। राम जन्मभूमि आंदोलन के बाद वे भाजपा में आए। 2012 में गुर्जर बहुल इस सीट से वे ही विधायक चुने गए थे। लेकिन 2014 में लोकसभा चुनाव जीत जाने के बाद उन्हें विधानसभा से इस्तीफा देना पड़ा। उपचुनाव हुआ तो पार्टी ने उनके सुझाव पर उनके बड़े भाई के पौत्र अनिल चौहान को टिकट दे दिया। इससे हुकुम सिंह की प्रतिष्ठा दांव पर आ गई। कड़े मुकाबले में चौहान सपा के नाहिद हसन से हार गए। चौहान इस बार भी दावेदार थे। पर हुकुम सिंह ने उनकी जगह नोएडा में रह रही अपनी पुत्री मृगांका को टिकट दिला दिया। इससे चौहान ने बगावत कर दी और उन्हें अजित सिंह ने टिकट दे दिया।

कैराना में अब मृगांका (भाजपा), नाहिद हसन (सपा), दिवाकर कश्यप (बसपा) व अनिल चौहान (रालोद) के बीच लड़ाई है। भाजपा की तरफ से जिले की कमान पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मंत्री संजीव जैन संभाल रहे हैं। बसपा उम्मीदवार को अति पिछड़ों और दलितों का आसरा है। गुर्जर और मुसलमान यहां तकरीबन बराबर हैं। संजीव जैन का दावा है कि हुकुम सिंह की प्रतिष्ठा को देखते हुए गुर्जर मत भाजपा को ही मिलेंगे। अनिल चौहान इन मतों के विभाजन और जाट मतदाताओं के सहारे हैं। जातीय समीकरण के हिसाब से अगर गुर्जर मतों का बंटवारा हुआ तो सपा के नाहिद हसन फिर जीत सकते हैं।
शामली में कांग्रेस के पंकज मलिक पिछली बार जीते थे। वे इलाके के कद्दावर जाट नेता हरेंद्र मलिक के बेटे हैं। इस बार मुकाबले में भाजपा के जाट तेजेंद्र निरवाल, रालोद के विजेंद्र मलिक और बसपा के मोहम्मद असलम हैं। सपा के बागी मनीष चौहान भी निर्दलीय लड़ रहे हैं। वे गुर्जर हैं। संजीव जैन का दावा है कि इस बार शामली में भाजपा जीतेगी। शामली शहर के नगर पालिका चेयरमैन के चुनाव में भी भाजपा के अरविंद संगल ही जीते थे।

जहां तक थाना भवन सीट का सवाल है। यहां 2012 में भाजपा के सुरेश राणा जीते थे जो 2013 के दंगों के आरोपी भी हैं। हालांकि उनकी राजपूत जाति के यहां ज्यादा वोट नहीं हैं तो भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ने उनकी राह आसान बनाई थी। भाजपा इसे अपनी पक्की सीट के तौर पर गिन रही है। राणा के मुकाबले सपा ने जाट सुधीर पवार को उतारा है। बसपा से राव वारिस मुकाबले में हैं। रालोद ने भी मुसलमान उम्मीदवार जावेद राव को टिकट देकर विरोधियों के समीकरण बिगाड़ने की कोशिश की है। वैसे भी यहां मुसलमान और जाट ही ज्यादा हैं। संजीव जैन का गणित अलग है। जाटों की भाजपा से नाराजगी का उन्हें यहां असर पड़ता नहीं दिख रहा। अलबत्ता उनका दावा है कि सपा के जाट को न मुसलमान वोट देंगे और न अजित के मुसलमान को जाट। ऐसे में भाजपा के सुरेश राणा ही ध्रुवीकरण के चलते भारी अंतर से फिर जीत दर्ज करेंगे।

भाजपा ने असंतुष्टों के असर को कम करने के लिए खास रणनीति बनाई है। जिन्हें टिकट नहीं मिल पाया उन्हें दूसरे जिलों में चुनाव की देखरेख में लगाया है। हर जिले में एक चुनाव प्रभारी है तो एक लोकसभा पालक। जिला प्रभारी अलग हैं। उम्मीदवार घर-घर जाकर जनसंपर्क कर रहे हैं तो प्रभारी और पालक मिलकर रणनीति बना रहे हैं। सात फरवरी को गृह मंत्री राजनाथ सिंह की झिंझाना में रैली होगी। इससे पहले रविवार को पार्टी अध्यक्ष अमित शाह थाना भवन आएंगे। भाजपा ने हर सीट पर मिल रहे जनसमर्थन के आधार पर वर्गीकरण भी किया है। जहां जीत तय दिख रही है, ऐसी सीट को ए श्रेणी, जहां कड़ा मुकाबला है उसे बी प्लस श्रेणी में गिना जा रहा है। कमजोर सीटें सी श्रेणी में हैं जहां चमत्कार ही पार्टी को जिता सकता है।

 

 

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