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उत्तर प्रदेश चुनाव: जौनपुर में मुन्ना बजरंगी की शान और दल की साख का सवाल

जेल में रहते हुए चुनाव लड़ने और हारने के बाद मुन्ना ने अगले चुनाव के लिए ताना बाना बुनना शुरू कर दिया और पत्नी सीमा सिंह को राजनीति में उतारने की रणनीत तैयार की।

मुन्ना बजरंगी।

 

आरिफ हुसैनी

जिले की नौ विधानसभा सीटों में कुछ ऐसी सीटें हैं जिन पर हर किसी की निगाह लगी हुई है। इन्हीं सीटों में से एक है मड़ियाहूं। यहां जरायम की दुनिया के बादशाह कहे जाने वाले माफिया डान मुन्ना बजरंगी की शान के साथ उनके साथ दो चुनावों से जुड़ी राजनीतिक पार्टी की साख भी दांव पर लगी हुई है।
पिछले विधानसभा चुनाव में जहां डॉन ने खुद इस सीट से ताल ठोकी थी और पार्टी ने टिकट दिया था। वहीं इस बार उसी पार्टी ने एक बार फिर डॉन के ही परिवार पर भरोसा जताते हुए उसकी पत्नी को टिकट दिया है। गौरतलब है कि कभी यह विधानसभा सीट समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता पारसनाथ यादव की गृह सीट होती थी। 2004 में हालात ने करवट ली और पारसनाथ यादव विधायक रहते हुए लोकसभा का चुनाव जीत गए। इसके बाद तत्कालीन ब्लाक प्रमुख रहीं श्रद्धा यादव को सपा ने टिकट देकर उपचुनाव में उतार दिया और वह विधायक बन गईं।

तीन साल बाद 2007 के विधानसभा चुनाव में श्रद्धा यादव का सपा ने टिकट काट दिया और उनके स्थान पर पारसनाथ के पुत्र लकी यादव को प्रत्याशी बना दिया। इस पर, श्रद्धा ने बगावत कर दी और मात्र आठ सौ मतों के अंतर से चुनाव तो हार गईं लेकिन सपा प्रत्याशी को तीसरे स्थान पर धकेल दिया था। चुनाव बसपा उम्मीदवार केके सचान जीत गए। इसके बाद 2012 में पार्टी ने सबक लेते हुए फिर श्रद्धा पर भरोसा जताया और उन्होंने दूसरी बार इस सीट पर कब्जा जमाया। हालांकि इस चुनाव में श्रद्धा का मुकाबला बसपा की सावित्री पटेल के साथ ही मुन्ना बजरंगी से था। मुन्ना को अपना दल ने उतारा था लेकिन बजरंगी को तीसरे स्थान पर ही संतोष करना पड़ा। जेल में रहते हुए चुनाव लड़ने और हारने के बाद मुन्ना ने अगले चुनाव के लिए ताना बाना बुनना शुरू कर दिया और पत्नी सीमा सिंह को राजनीति में उतारने की रणनीत तैयार की। इसके तहत मुन्ना की पत्नी विभिन्न कार्यक्रमों में हिस्सा लेती रहीं।

सीमा अपना दल (कृष्णा पटेल गुट) से बतौर प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। सीमा भले ही चुनाव लड़ रही हो लेकिन यहां हर कोई मान रहा है कि चुनाव में मुन्ना ही है। लेकिन इस बार भी लड़ाई इतनी आसान नहीं है क्योंकि भाजपा ने इस सीट पर गठबंधन के रूप में अपना दल (अनुप्रिया) के खाते में यह सीट डाल दी और पार्टी ने इस बार ब्राह्राण कार्ड खेलते हुए लीना तिवारी को मैदान में उतार दिया है। लिहाजा लड़ाई और रोचक हो गई है। हालांकि इस चुनाव में सभी सियासी पंडितों की निगाह इस बात पर भी रहेगी की मां-बेटी के अलग होने के बाद बिरादरी के वोट किसके खाते में जाते है। इतना जरूर है कि जहां बेटी के गुट के साथ भाजपा के परंपरागत वोट और चुनाव निशान का भी लाभ रहेगा तो वहीं मां के गुट के साथ पीस पार्टी व अन्य दलों के आने से उनके परंपरागत वोट भी जुड़ते दिखाई देंगे। दूसरी तरफ कांग्रेस भले ही पिछले चुनाव में जमानत न बचा पाई हो लेकिन सपा से गठबंधन होने के कारण सपा प्रत्याशी को भी इसका लाभ मिलेगा।

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