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यूपी चुनाव ग्राउंड रिपोर्ट: पक्‍की सड़कों से कटे हैं कानुपर देहात के आधे गांव, बंद फैक्ट्रियां बता रहीं कि बदतर हो गए हालात

UP Election Ground Report Kanpur Dehat: जिले के 970 गांवों में से 529 सड़क किनारे, 78 गांव पक्‍की सड़कों से एक किमी की रेंज में, 258 गांव पक्‍की सड़क से 2 किमी दूरी में व अन्‍य 3-5 किमी की रेंज में हैं।
Author February 18, 2017 22:11 pm
UP Election Ground Report Kanpur Dehat: डेरापुर में सड़कें नहीं, खड़जे हैं, जहां बारिश में फिसलन दोगुनी हो जाती है। (Source: Facebook)

उत्‍तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 के तहत कानुपर देहात जिले में 19 फरवरी को मतदान होना है। उद्योगों के लिए मशहूर कानपुर को जब दो हिस्‍सों में बांटा गया तो शहर से दूर गांवों का हिस्‍सा देहात के हिस्‍से आया। अलग जिला बने 16 साल हो गए, मगर अभी तक जिला मुख्‍यालय भी किसी कस्‍बे जैसा नजर आता है। कानपुर अपने उद्योग-धंधों के लिए जाना जाता है। मगर इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर के अभाव में कई फैक्ट्रियां बीते वर्षों में बंद हो गई हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, रनियां व जैनपुर में करीब पांच सौ फैक्ट्रियों पर ताला लग गया है। जब इलाके को इंडस्ट्रियल हब बनाने का शोर उठा तो रोजगार की संभावनाएं लोगों को दिखी थीं। मगर बीते एक दशक में जिले की कई बड़ी फैक्ट्रियां बंद होने से हजारों लोगों का रोजगार छिन गया है। यहां के कारोबारी बिजली, सड़क की खराब हालत के चलते मुंह मोड़ रहे हैं। इलाके में बेहतर आवासीय सुविधाएं न होना भी औद्योगिक इकाइयों के बंद होने की एक वजह है। रनियां में एक केमिकल फैक्‍ट्री चलाने वाले शारदा यादव कहते हैं, ”माल लाने-ले जाने में बहुत समस्‍या है। सड़कें इतनी खराब हैं कि आधा माल रास्‍ते में ही बर्बाद हो जाता है। अच्‍छे स्‍कूल और अस्‍पताल भी नहीं है। मैं तो कानपुर शहर में रहता हूं, बस वहीं से अप-डाउन करके फैक्‍ट्री चल रही है। पिछले साल घाटा हुआ था, इसलिए अगले साल तक इसे यहां से वहीं शहर के बाहर शिफ्ट करने की सोच रहे हैं।”

कानपुर देहात का जिला मुख्‍यालय माती में है। 16 साल हो गए, मगर यहां से जिले के अधिकांश कस्‍बों के लिए बसें नहीं चलतीं। यातायात का साधन बनता है टेंपो, जिस पर 7 की बजाय 18 लोग जान हथेली पर लेकर रोज सफर करते हैं। जिले के 970 गांवों में से 529 सड़क किनारे, 78 गांव पक्‍की सड़कों से एक किमी की रेंज में, 258 गांव पक्‍की सड़क से 2 किमी दूरी में व अन्‍य 3-5 किमी की रेंज में हैं। ऐसे में टेंपो के जरिए कच्‍ची सड़कों पर कैसी यात्रा होती होगी, अंदाजा लगाया जा सकात है। पहले दो-ढाई दर्जन बसें संचालित होती थीं, मगर अलग जिला बनने के बाद वह सेवा भी बंद कर दी गई। माती में बस स्‍टेशन तो बना दिया गया, कुछ दिन कानपुर-झांसी रूट की बसें चली भीं, मगर बाद में यहां स्‍टॉपेज ही खत्‍म कर दिया गया। माती बस डिपो भी साल भर से ज्‍यादा वक्‍त से बन ही रहा है। रसूलाबाद में भी बस डिपो बन रहा है। मगर पूरा कब तक होगा, यह कहा नहीं जा सकता।

रूरा में पश्चिम की तरफ एक क्रॉसिंग है, जिसपर अक्‍सर जाम लगा रहता है। दिल्‍ली-हावडा रूट पर बनी इस क्रॉसिंग से हर 15 मिनट में ट्रेन गुजरती है। रोड पर ट्रैफिट लोड ज्‍यादा है इसलिए आपाधापी मची रहती है। कई दोपहिया वाहन जल्‍दी निकलने के चक्‍कर में हादसों का शिकार हो चुके हैं। यहां के लोग सालों से क्रॉसिंग पर ओवरब्रिज बनाने की मांग करते आ रहे हैं, क्षेत्र के लिए यह बड़ा मुद्दा भी है, मगर नेताजी इधर देखते तक नहीं। इस रास्‍ते से होकर रोज गुजरने वाले अध्‍यापक आशीष शुक्‍ला ने हमसे कहा, ”दिक्‍कत तो बहुत होती है। कई बार एंबुलेंस फंस जाती है, मरीज की जान पर बनी रहती है। यहां ओवरब्रिज बहुत जरूरी है। पिछले दिनों हमारे पड़ोस के कॉलेज में पढ़ाने वाले टीचर की क्रॉसिंग पार करने के चक्‍कर में मौत हो गई थी।”

कानपुर देहात में ही रूरा विधानसभा क्षेत्र है। यहां की सड़कें सालों से खराब पड़ी हैं। रूरा-शिवली को जोड़ने वाली रोड हो या रूरा-मिडाकुआ के बीच की सड़क, हर रास्‍ते पर बड़े-बड़े गड्ढे हैं। स्‍थानीय निवासी बताते हैं कि रोज कोई न कोई दोपहिया वाहन हादसे का शिकार होता है, मगर कई बार मांग किए जाने के बावजूद सड़कों की स्थिति नहीं सुधरी। काशीपुर में रहने वाले रूद्र प्रताप सिंह बताते हैं, ‘बदहाल सड़कों के प्रति नेता तो क्‍या, अधिकारी भी गंभीर नहीं है। विधायक से लेकर डीएम तक, हर जगह सड़कें बनवाने के लिए अप्लिकेशन डाली मगर सालों से सड़क नहीं बन सकी है। शिवली रोड तो चलने लायक बची ही नहीं। नेता आते हैं, वादे करते हैं, वोट पा जाते हैं और जनता बेवकूफों की तरह उन्‍हें कोसती रह जाती है, जैसे हम लोग कोस रहे हैं।’

रसूलाबाद में भी सड़क बड़ा मुद्दा है। कुछ गांवों ने तो बिजली और सड़क के मुद्दे पर मतदान के बहिष्‍कार तक का ऐलान कर रखा है। इटैली ग्राम पंचायक के मजरा मऊ में तो गांववालों ने बहिष्‍कार का बैनर तक गांव के बाहर टांग दिया था। पुलिस ने जबरदस्‍ती उतरवाया तो हंगामा हो गया। इसी गांव में रहने वाले अखिलेश रावत कहते हैं, ‘बिजली को कोई ठिकाना नहीं, आती भी है तो वोल्‍टेज बहुत लो रहता है। गांव को पंचायत से जोड़ने वाली सड़क पर किसी मौसम में नहीं चल सकते। बारिश में तो तालाब से होकर जाना पड़ता है।’

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