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इन पांच कारणों से बसपा के लिए ‘हानिकारक’ साबित हो रही हैं मायावती

कांशी राम ने 1984 में बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की जयंती 14 अप्रैल को बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की स्थापना की।

बहुजन समाज पार्टी के विधायकों की एक बैठक में पार्टी प्रमुख मायावती। (Express Photo by Vishal Srivastav)

कांशी राम ने 1984 में बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की जयंती 14 अप्रैल को बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की स्थापना की थी। अगले एक दशक में पार्टी यूपी, पंजाब, मध्य प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली में चुनाव दर चुनाव खुद को मजबूत दावेदार के रूप में पेश करती गयी। साल 2001 में कांशी राम ने मायावती को अपना राजनीतिक वारिस घोषित कर दिया। कांशी राम का लंबी बीमारी के बाद साल 2006 में निधन हो गया। कांशी राम के जाने के बाद बसपा की केवल मायावती की सर्वेसर्वा बन गईं। भले ही बसपा राष्ट्रीय पार्टी हो यूपी के बाहर उसका जनाधार चुनाव दर चुनाव सिकड़ुता जा रहा है। यूपी में भी पार्टी की सत्ता में वापसी की सारी उम्मीद मुस्लिम वोटों का बसपा के पक्ष में ध्रुवीकरण पर टिकी है। आइए देखते हैं कि भारत के दलित, आदिवासी, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की पार्टी होने का दावा करने वाली बसपा के लिए खुद उसकी नेता मायावती किस तरह “हानिकारक” साबित हो रही हैं।

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1- पार्टी को व्‍यक्तिकेंद्रित बना कर रखा- बसपा सुप्रीमो मायावती पर सबसे गंभीर आरोप खुद को ही पार्टी का प्रतीक बना देने का है। मायावती ने पार्टी में किसी दूसरे नेता को पनपने नहीं दिया। मीडिया में अक्सर ऐसी खबरें आती रहती हैं कि मायावती से होने वाली बैठकों के दौरान केवल एक कुर्सी होती है जिस पर वही बैठती हैं बाकी मुलाकातियों को खड़े-खड़े ही अपनी बात रखनी पड़ती है। शायद यही वजह थी कि सोनेलाल पटेल, स्वामी प्रसाद मौर्य और आरके चौधरी जैसे नेताओं ने एक-एक कर बसपा छोड़ दिया। चुनावी राजनीति के जातीय समीकरणों के चलते ऐसे नेताओं के पार्टी छोड़ने की कीमत बसपा को चुकानी पड़ी।

2- पार्टी का विस्‍तार नहीं कर सकीं- पंजाब के रहने वाले कांशी राम ने बसपा की स्थापना के बाद 1989 के लोक सभा चुनाव में राज्य में 8.62 प्रतिशत वोटों के साथ पहली संसदीय सीट जीती थी। 1992 के विधान सभा चुनाव में बसपा का 16.32 प्रतिशत वोट और नौ सीटें मिलीं। साल  2014 के लोक सभा चुनाव में पार्टी का राज्य में जनाधार सिकुड़कर 1.91 प्रतिशत हो गया। साल 2012 के विधान सभा चुनाव में भी पार्टी को 4.28 प्रतिशत वोट मिले लेकिन वो कोई विधान सभा सीट नहीं जीत सकी। पंजाब में 30 प्रतिशत से अधिक दलित आबादी है। दलितों को बसपा का मुख्य जनाधार माना जाता है फिर पंजाब के विधान सभा चुनाव में बसपा मुकाबले में दूर-दूर तक नहीं नजर आ रही है। यही हाल पार्टी का दिल्ली में हुआ। पार्टी को दिल्ली विधान सभा चुनाव 2003 में करीब छह प्रतिशत वोट मिले थे। वहीं 2008 के विधान सभा चुनाव में बसपा को करीब 14 प्रतिशत वोटों के साथ दो सीटों पर जीत मिली। लेकिन साल 2013 और 2015 में हुए दिल्ली विधान सभा चुनाव में बसपा दिल्ली की राजनीति से लगभग बाहर हो गयी। बसपा का यही हाल मध्य प्रदेश, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश इत्यादि राज्यों में भी हुआ जहां कभी पार्टी एक निश्चित वोट पाती थी लेकिन पिछले एक दशक में मायावती के नेतृत्व में इन राज्यों में पार्टी का जनाधार कमजोर होता गया। नतीजतन बसपा केवल यूपी की पार्टी बनकर रह गयी है। नए राज्यों में विस्तार की बात तो कोसों दूर है।

3- बहुजन वोटबैंक को साथ नहीं रख सकीं- बसपा का दावा रहा है कि वो भारत के “बहुजन” (दलित, आदिवासी, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों) का प्रतिनिधित्व करती है लेकिन धीरे-धीरे पार्टी की छवि दलितों की पार्टी की बनती गयी। दलितों में बसपा में “जाटवों और चमारों” का वर्चस्व रहा। मायावती खुद जाटव समुदाय से आती हैं।  दूसरी जातियों के मजबूत नेताओं की मायावती ने जिस तरह अनदेखी की उसकी वजह से वो पार्टी से दूर चले गए। भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी (सपा) गैर-जाटव नेताओं और उनके जातीय वोटों को अपने साथ लाने में कामयाब रहे। यूपी एवं अन्य राज्यों में अल्पसंख्यक वोटों का महत्व भी मायावती बहुत देर से समझीं। यूपी में बसपा के पास आज अल्संख्यक नेता के तौर पर केवल नसीमुद्दीन हैं जिन्हें कद्दावर मुस्लिम नेता मानना मुश्किल है।

4-  पार्टी के मूल सिद्धांत को बदलकर बहुजन से सर्वजन की ओर- बसपा की स्थापना के समय ही इसे महात्मा बुद्ध, छत्रपति साहूजी महाराज, ज्योतिराव फुले, ईवी पेरियार और भीमराव आंबेडकर इत्यादि के विचारों की प्रतिनिधि पार्टी के रूप में पेश किया गया। ब्राह्मणवाद और मनुवाद का विरोध पार्टी की मुख्य विचारधारा थे। साल 2007 के विधान सभा चुनाव में मायावती ने सतीश मिश्रा के चेहरे के साथ ब्राह्मण समुदाय को पार्टी से जोड़ने की कोशिश की। इसी के साथ बसपा बहुजन से “सर्वजन” की राजनीति की तरफ बढ़ गयी। माना जाता है कि ब्राह्मण वोटों की मदद से मायावती 2007 में बहुमत पाने में कामयाब रहीं। भले ही मायावती को एक बार इसका फायदा मिल गया हो लेकिन राज्य में परंपरागत तौर पर भाजपा के वोटर माने जाने वाले ब्राह्मण वोटर दलितों वोटों की तरह टिकाऊ नहीं साबित हुए। नतीजा ये रहा कि 2014 के लोक सभा चुनाव में यूपी में पार्टी को करीब 20 प्रतिशत वोट मिले लेकिन वो एक भी सीट नहीं जीत सकी। पार्टी के हाथ से ब्राह्मण वोटर तो फिसलना लाजिमी ही था साथ ही उसकी बहुजन की “एकमात्र” पार्टी वाली छवि भी भंग हो गयी। मायावती के इस चुनावी चाल से कहीं न कहीं अंदरखाने ये संदेश भी चला गया जब “बहुजन की पार्टी” ब्राह्मणों वोटरों को साथ लाने के लिए “चुनावी एडजस्टमेंट” कर सकती है तो दलित और पिछड़ी जातियां और उनके नेता भी “सवर्णों की पार्टी” माने जाने वालों दलों के संग “सुविधानुसार चुनावी गठजोड़” कर सकते हैं।

5- मीडिया और सोशल मीडिया से दूरी- साल 2014 के लोक सभा चुनाव में वोट पाने के मामले में बसपा देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी रही। पार्टी को 4.1 प्रतिशत वोट मिले थे। भले ही पार्टी कोई भी संसदीय सीट नहीं जीत सकी लेकिन 34 लोक सभाओं में वो दूसरे नंबर पर रही थी। लेकिन जब आप सोशल मीडिया और मीडिया में देश की तीसरी सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी की मौजूदगी देखेंगे तो वो शायद शुरू के आधा दर्जन पार्टियों में भी जगह नहीं बना पाएगी। सोशल मीडिया पर बसपा की उपस्थिति बिल्कुल निष्प्रभावी है। मायावती ने आधुनिक संचार माध्यमों तक पार्टी की पहुंच के बारे में नहीं सोचा। मायावती बमुश्किल ही प्रेस वार्ता करती हैं। उनकी प्रेस वार्ताओं में वो लिखा हुआ भाषण पढ़ती हैं और कभी-कभार ही पत्रकारों के सवालों का जवाब देती हैं। मायावती राष्ट्रीय मीडिया पर बसपा के संग भेदभाव करने का आरोप लगाती रही हैं लेकिन उन्होंने खुद ये कभी सुनिश्चित नहीं किया कि उनकी पार्टी के प्रवक्ता विभिन्न टीवी और अन्य संचार माध्यमों पर पार्टी का पक्ष रखते रहें। जहां लगभग हर बड़ी पार्टी ने टीवी माध्यमों के लिए प्रवक्ता नियुक्त कर रखे हैं वहीं बसपा इस मामले में सबसे गरीब नजर आती है।  मायावती की इस अदूरदर्शिता के कारण बसपा के प्रसार की संभावनाएं कम होती गईं।

वीडियो: मायावती के भाई आनंद के खिलाफ बेनामी संपत्ति का आरोप, जांच शुरू

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