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उत्तर प्रदेश चुनाव: राज्य में हुई 700 चुनावी सभाएं, अकेले सीएम अखिलेश ने की 221 चुनावी सभा

सभी दलों के नेताओं ने डेढ़ महीने में उत्तर प्रदेश में 700 सभाएं कर डालीं। इतने के बावजूद अब तक कोई भी राजनीतिक दल पूर्ण आत्मविश्वास के साथ प्रदेश में बहुमत हासिल करने का दावा नहीं कर पा रहा है।

उत्‍तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में त्रिशंकु नतीजे आ सकते हैं।

आखिर इस बार के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश किस राजनीतिक दल को अपना सुलतान बनाता है? इस सवाल में खुद को फिट बैठाने के लिए भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। इन सभी दलों के नेताओं ने डेढ़ महीने में उत्तर प्रदेश में 700 सभाएं कर डालीं। इतने के बावजूद अब तक कोई भी राजनीतिक दल पूर्ण आत्मविश्वास के साथ प्रदेश में बहुमत हासिल करने का दावा नहीं कर पा रहा है। आठ मार्च को अंतिम सातवें चरण का मतदान समाप्त होने के तीसरे दिन 11 मार्च को इस बात का फैसला होना है कि आखिर किसे उत्तर प्रदेश की जनता ने इस बार अपना रहनुमा चुना।  उत्तर प्रदेश में हो रहे विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव की सरकार के पांच साल कसौटी पर कसे जाने हैं। मौजूदा समाजवादी पार्टी की सरकार ने क्या प्रदेश की जनता का भरोसा दोबारा हासिल कर पाने में कामयाबी हासिल की? क्या सोलहवीं लोकसभा के चुनाव सरीखा माहौल अब भी भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में उत्तर प्रदेश में कायम है? जनता की कसौटी पर यह भी कसा जाएगा। क्या उत्तर प्रदेश की  जनता का भरोसा बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस पर दोबारा कायम हो पाया है? फैसला इस बात का भी है। यही वजह है, जिसके चलते उत्तर प्रदेश डेढ़ महीने तक लगातार राजनेताओं की सभाओं का अखाड़ा बन गया।

उत्तर प्रदेश में विकास को आधार बना कर विधानसभा चुनाव में उतरी समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 221 चुनावी सभाओं को संबोधित किया। विधानसभा चुनाव में अखिलेश के सबसे अधिक सभा करने के कई कारण रहे। वे अपने पांच सालों की सरकार का रिपोर्ट कार्ड लेकर जनता के बीच पहुंचे थे। साथ ही पार्टी और परिवार में चार महीने से अधिक समय तक मची कलह से भी खुद को उबार कर अलग पहचान बनाने की चुनौती भी उनके समक्ष रही। कांग्रेस के साथ गठबंधन के कारणों को भी जनता को समझाना भी अखिलेश के लिए किसी चुनौती से कम नहीं था। उधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के समक्ष केंद्र सरकार की पौने तीन साल के कामों का रिपोर्ट कार्ड भी उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम देंगे। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहां 23 चुनावी सभाएं की और अमित शाह ने सौ। इसके अलावा प्रदेश की 195 विधानसभा सीटें ऐसी रहीं जहां अमित शाह ने वहां के कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद स्थापित किया। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 47 सीटें जीती थीं। उत्तर प्रदेश में 15 सालों से वह सत्ता से बाहर है। इसी लिए इस बार उसने फतह हासिल करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।

अब बात बहुजन समाज पार्टी की। पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती के लिए यह विधानसभा चुनाव कड़ी परीक्षा है। पांच सालों से वह उत्तर प्रदेश की सत्ता से बाहर है। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने वाली बसपा ने इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। खुद मायावती को प्रदेश में 52 चुनावी सभाएं करनी पड़ीं। पार्टी ने 157 मुसलमानों को अपना उम्मीदवार बना कर समाजवादी पार्टी के पारंपरिक वोट बैंक में सेंधमारी की कोशिश भी की है। चुनाव परिणाम इस बात की ताकीद भी करेंगे कि बहनजी को सपा के वोट बैंक में सेंधमारी करने में कामयाबी हासिल हो पाई? या नहीं। उधर, कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव परिणाम बड़ी कसौटी साबित होने जा हा है। पिछले चुनाव में 28 सीटें जीतने वाली कांग्रेस ने इस बार प्रदेश की सरजमीन पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए समाजवादी पार्टी का सहारा लिया है। पार्टी की राष्टÑीय अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी के सक्रिय चुनाव प्रचार न करने की वजह से राहुल गांधी को 45 और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर को 65 चुनावी सभाएं करनी पड़ी हैं। वह भी सपा गठबंधन में रहने के बावजूद।

 

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