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UP Election 2022: जिस क्षेत्र में बीजेपी ने जीती थीं 74% सीटें, इस बार वहीं चुनौती, जानें-कैसे

पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 74 फ़ीसदी सीटें जीती थी। लेकिन इस बार सपा और रालोद गठबंधन के रूप में उसे बड़ी चुनौती मिल रही है।

आगामी उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में इन पांच चेहरों का राजनीतिक इम्तिहान होगा (एक्सप्रेस फोटो/ पीटीआई)

उत्तर प्रदेश चुनाव 2022 में पश्चिमी यूपी का महत्व काफी बढ़ चुका है क्योंकि किसान आंदोलन के बाद राजनीतिक स्थितियां काफी जटिल बन गई हैं। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक 2014, 2017 और 2019 के चुनाव में जाट वोट एकमुश्त बीजेपी के पक्ष में पड़ा और पश्चिमी यूपी में बीजेपी ने सभी राजनीतिक दलों का सूपड़ा साफ कर दिया था; लेकिन इस बार 2022 के विधानसभा चुनाव में स्थिति कुछ अलग है। कृषि बिल के खिलाफ आंदोलन के बाद जाटों में सरकार के खिलाफ नाराजगी है और चुनाव में भी उस नाराजगी का असर दिख सकता है। साथ ही सपा और रालोद का गठबंधन भी बीजेपी को परेशानी में डाल सकता है।

बता दें कि पश्चिमी यूपी में मुसलमान और जाटों की संख्या निर्णायक होती है और इसीलिए इसे जाटलैंड भी कहा जाता है। बीजेपी पिछले तीन चुनावों से जाटों को अपने पक्ष में कर अन्य दलों का सूपड़ा साफ करते हुए आ रही थी। इस चुनाव में किसान आंदोलन के कारण बीजेपी को जाट वोट छिटकने का डर है।

2017 में बीजेपी ने जीती थी 74% सीटें: पश्चिमी यूपी में 15 जिले आते हैं और इसके अंतर्गत 78 विधानसभा सीटें आती हैं। सहारनपुर, शामली, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, मुरादाबाद, रामपुर, अमरोहा, संभल, मेरठ, बागपत, बुलंदशहर, हापुड़ और अलीगढ़ जिले पश्चिमी यूपी में आते हैं। पिछली बार 78 में 58 सीटें अकेले भारतीय जनता पार्टी ने जीती थी और 16 सीटें सपा ने जीती थी। बीएसपी और रालोद को 1-1 सीट से संतोष करना पड़ा था, जबकि कांग्रेस ने 2 सीटें जीती थी। नतीजों से साफ तौर पर नजर आ रहा कि जाटों ने बीजेपी को एकमुश्त वोट किया और पोलराइजेशन का फायदा बीजेपी को मिला।

2014 और 2019 के चुनावों में जाटों के कद्दावर नेता चौधरी अजीत सिंह को भी क्रमशः बागपत और मुजफ्फरनगर से हार का सामना करना पड़ा था। कारण सिर्फ एक था कि जाटों ने चौधरी अजीत सिंह को भी वोट नहीं किया था। लेकिन इस बार किसान आंदोलन के कारण स्थिति बदल सकती है और बीजेपी को जाट वोट छिटकने का डर भी सता रहा है।

मुस्लिम-जाट बाहुल्य क्षेत्र: पश्चिमी यूपी मुस्लिम और जाट बाहुल्य है। पश्चिमी यूपी के 15 में 10 जिलों में जाट आबादी की संख्या 35 फ़ीसदी से अधिक है। जबकि 78 में से 73 सीटों पर मुस्लिम आबादी 25 फ़ीसदी से अधिक है। जातीय समीकरण से साफ नजर आ रहा है कि अगर जाट वोट बीजेपी से हटा तो सपा और रालोद गठबंधन को पश्चिमी यूपी में बड़ा फायदा मिल सकता है, क्योंकि बीएसपी के कमजोर होने से मुसलमानों का भी अधिक संख्या में रुझान अब समाजवादी पार्टी की तरफ ही है। उत्तर प्रदेश में चुनाव की शुरुआत भी पश्चिमी यूपी से ही हो रही है।

जाटों के भरोसे बीजेपी: पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी का जाटों पर भरोसा बना हुआ है क्योंकि बीजेपी को भी पता है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट ही बीजेपी की नैया पार कर सकते हैं। हिंदुत्व और विकास के मुद्दे पर बीजेपी चुनाव लड़ रही है। पश्चिमी यूपी में सीएम योगी आदित्यनाथ चुनाव प्रचार के दौरान भी कानून और व्यवस्था पर सबसे अधिक जोर दिया। मुजफ्फरनगर दंगों का भी ज़िक्र बीजेपी चुनाव प्रचार में कर रही है क्योंकि ध्रुवीकरण से बीजेपी को काफी फायदा मिलेगा। सितंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अलीगढ़ में जाट राजा महेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर बन रहे विश्वविद्यालय का भी उद्घाटन किया था।

बीजेपी को भी पता है कि अगर उत्तर प्रदेश में बड़े बहुमत के साथ सरकार बनानी है तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 2017 चुनाव जैसा प्रदर्शन फिर से दोहराना पड़ेगा। उसके लिए बीजेपी हर संभव प्रयास कर रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पश्चिमी उत्तर प्रदेश क्षेत्र की जिम्मेदारी भी दी गई है।

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