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UP Election: अहमदाबाद ब्‍लास्‍ट केस से जुड़े 14 टेरर केस वापस लेना चाहती थी सपा सरकार, इनमें 8 हुए दोषमुक्‍त, 4 को हुई सजा

आतंकी मामले में 19 लोग यूपी और पश्चिम बंगाल से थे। बाकियों की बात करें तो इसमें लखनऊ के छह और कानपुर के तीन मामले थे। वहीं बिजनौर, रामपुर, वाराणसी, गोरखपुर और बाराबंकी का एक-एक मामला था।

UP Election: अहमदाबाद ब्‍लास्‍ट केस से जुड़े 14 टेरर केस वापस लेना चाहती थी सपा सरकार, इनमें 8 हुए दोषमुक्‍त, 4 को हुई सजा
यूपी की पूर्व सपा सरकार पर आरोप है कि उसने अहमदाबाद ब्लास्ट केस में लिप्त लोगों को बचाने की कोशिश की(फोटो सोर्स: PTI)।

अहमदाबाद ब्लास्ट केस में स्पेशल कोर्ट ने 49 में से 38 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई है। इस फैसले के आने के बाद से उत्तर प्रदेश की राजनीतिक में इस मुद्दे पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक इस मामले में यूपी की तत्कालीन सपा सरकार 14 आतंकी मामलों को वापस लेना चाहती थी।

बता दें कि द इंडियन एक्स्प्रेस की रिपोर्ट की मुताबिक 2012 में यूपी में सत्ता में आने के एक साल बाद 2013 में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी सरकार ने अपने चुनावी घोषणापत्र में वादे के अनुसार आतंकी मामलों को वापस लेने का फैसला किया। इसमें इस तरह के 14 मामलों को वापस लेने का फैसला किया जिनमें 19 लोग यूपी और पश्चिम बंगाल से थे। इसमें लखनऊ के छह और कानपुर के तीन मामले थे। इसके अलावा वाराणसी, गोरखपुर, बिजनौर, रामपुर और बाराबंकी का एक-एक मामला था।

हालांकि, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक वकील रंजना अग्निहोत्री और पांच अन्य द्वारा इस फैसले के खिलाफ एक जनहित याचिका दायर की गई थी। जिसके बाद राज्य सरकार के कदम पर रोक लगा दी गई थी। अग्निहोत्री के वकील हरि शंकर जैन ने कहा कि तत्कालीन सपा सरकार ने हाईकोर्ट के स्टे ऑर्डर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) दायर की थी, जो अभी भी लंबित है।

8 बरी, 4 को सजा: इस बीच 14 में से आठ आतंकी मामलों में अदालत ने सबूतों के अभाव में या फिर संदेह का लाभ देते हुए आरोपियों को बरी कर दिया। चार अन्य में अदालत ने आरोपियों को दोषी करार दिया है। वहीं एक मामले की सुनवाई अभी चल रही है और आखिरी मामले में आरोपी अभी फरार है।

आइए डालते हैं उन 14 मामलों पर एक नजर जिन्हें सपा सरकार ने वापल लेने की कोशिश की थी

पहला और दूसरा मामला: यूपी के बिजनौर निवासी याकूब को यूपी पुलिस ने 21 जून, 2007 को लखनऊ से देश के विभिन्न हिस्सों में कथित तौर पर आरडीएक्स की आपूर्ति करने के आरोप में गिरफ्तार किया था। उसके पास से विस्फोटक बरामद करने का दावा किया गया। पुलिस के मुताबिक वह हूजी का सदस्य था। सपा सरकार ने याकूब के खिलाफ आरोप हटाने की मांग की थी।

आठ साल बाद 6 अगस्त, 2015 को लखनऊ की एक अदालत ने याकूब और दो अन्य को संदेह के आधार पर बरी कर दिया।

तीसरा और चौथा मामला: बिजनौर निवासी नासिर हुसैन को जून 2007 में लखनऊ के एक होटल से पुलिस ने गिरफ्तार किया था। पुलिस ने उसके कब्जे से आरडीएक्स और डेटोनेटर बरामद करने का दावा किया था। उसके खिलाफ लखनऊ के नाका हिंडोला पुलिस स्टेशन में दो प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

पांचवा मामला: मोहम्मद कलीम, सैयद अब्दुल मोबीन पर 15 अगस्त, 2000 को लखनऊ में सहकारिता भवन के पास हुए एक विस्फोट के सिलसिले में मामला दर्ज था। हालांकि इसमें कोई हताहत नहीं हुआ था। विस्फोट से एक दीवार टूट गई थी और कुछ खिड़की के शीशे टूट गए थे। इसमें भी आरोपियों को संदेह का लाभ मिला।

छठा मामला: 13 अगस्त, 2008 को लखनऊ की एक अदालत में पेश किए जाने पर पांच विचाराधीन कैदियों पर कथित रूप से राष्ट्र विरोधी नारे लगाने का मामला दर्ज किया गया था। नौशाद को छोड़कर, अन्य पश्चिम बंगाल के निवासी थे। उन्हें 2007 में लखनऊ में कथित तौर पर विस्फोट की योजना बनाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

सातवां मामला: मकसूद, जावेद और ताज मोहम्मद को रामपुर पुलिस ने मुमताज मियां समेत 13 अगस्त 2002 को कथित तौर पर पाकिस्तान को भारतीय सैन्य रहस्य लीक करने के आरोप में गिरफ्तार किया था। पुलिस ने दावा किया कि उन्होंने सेना के आंदोलन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी और उनके पास से देहरादून और मेरठ सहित कई स्थानों के सैन्य स्थापना मानचित्र मिले हैं। सपा सरकार ने मकसूद, जावेद, ताज मोहम्मद के खिलाफ आरोप हटाने का फैसला किया था। वहीं अदालत ने 20 जनवरी 2014 को सबूतों के अभाव में अदालत ने इन्हें बरी कर दिया।

आठवां मामला: एक ट्रक चालक अहमद हसन और उसके पड़ोसी वसीफ को 21 जून 2002 को बिजनौर में पाकिस्तानी एजेंसियों के लिए कथित तौर पर जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उन पर ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट समेत कई आरोप लगाए गए थे। सपा सरकार ने हसन के खिलाफ मामले को खत्म कराने की कोशिश की थी। वहीं हसन को पिछले महीने बरी कर दिया गया।

नौवां मामला: 14 अगस्त 2000 को कानपुर के आर्य नगर इलाके में एक विस्फोट में चार पुलिसकर्मी घायल होने के बाद, एक किशोर सहित 10 लोगों पर विस्फोटक अधिनियम के तहत और हत्या के प्रयास, देशद्रोह और राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने के आरोप में मामला दर्ज किया गया था। इसमें एक आरोपी को कश्मीर में 2005 में मुठभेड़ में मार गिराया गया था।

कानपुर की एक स्थानीय अदालत ने आठ प्रमुख आरोपियों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। हालांकि, अन्य आरोपियों में एक किशोर का परीक्षण जारी रहा। सपा सरकार चाहती थी कि किशोर के खिलाफ मामला वापस लिया जाए।

दसवां मामला: झांसी के रहने वाले इम्तियाज अली को सितंबर 2009 में कानपुर से पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी के लिए कथित तौर पर जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। पुलिस के मुताबिक वह पेरोल पर था और उसे आईएसआई द्वारा 5,000 रुपये हर महीने देने का आश्वासन दिया गया था। पुलिस ने तब उसके कब्जे से आठ सिम कार्ड और भारतीय सेना के विवरण वाले दस्तावेज बरामद करने का दावा किया था।

अली को 2017 में दोषी ठहराया गया था और 13 साल कैद की सजा सुनाई गई थी। उनके वकील ने कहा कि निचली अदालत के फैसले के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपील दायर की गई है।

11 और 12: तत्कालीन सपा सरकार ने आजमगढ़ निवासी तारिक कासमी के खिलाफ बाराबंकी और गोरखपुर में दर्ज दो मामलों को वापस लेने का फैसला किया था। उस पर मई 2007 के गोरखपुर सीरियल ब्लास्ट का मामला दर्ज किया गया था जिसमें छह लोग घायल हो गए थे। दिसंबर 2020 में गोरखपुर की एक अदालत ने भी कासमी को विस्फोट मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। उसे लखनऊ और फैजाबाद कोर्ट विस्फोटों के लिए भी आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है, जिसमें पांच लोग मारे गए थे।

तेरहवां मामला: औरैया की रहने वाली सितारा बेगम को अगस्त 2010 में पाकिस्तानी नागरिक वकास अहमद को कथित तौर पर पनाह देने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। अप्रैल 2017 में, कानपुर की एक अदालत ने सितारा को दोषी ठहराया और उसे छह साल और 10 महीने के कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने वकास को 10 साल की जेल भी सुनाई।

चौदहवां मामला: चंदौली निवासी शमीम अहमद पर 2006 में वाराणसी में एक सार्वजनिक स्थान पर कथित रूप से बम लगाने का आरोप लगाया गया था। 7 मार्च, 2006 को संकटमोचन मंदिर और वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन में दोहरे विस्फोटों में 21 लोगों की मौत हो गई थी। इसमें यूपी एसटीएफ ने 5 अप्रैल, 2006 को प्रयागराज में एक मस्जिद के इमाम वलीउल्लाह को गिरफ्तार किया और कहा कि वह विस्फोटों का मास्टरमाइंड था।

वलीउल्लाह इस समय गाजियाबाद की डासना जेल में बंद है, तीनों को कभी पकड़ा नहीं गया। दिसंबर 2006 में पुलिस ने चार्जशीट में शमीम का नाम लिया और वह भी फरार है।

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