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भाजपा के सामने कठिन राह

पश्चिम उत्तर प्रदेश् की गन्ना पट्टी में इस बार के विधानसभा चुनाव में अबकी बड़ा उलटफेर हो सकता है।

सुरेंद्र सिंघल

पश्चिम उत्तर प्रदेश् की गन्ना पट्टी में इस बार के विधानसभा चुनाव में अबकी बड़ा उलटफेर हो सकता है। सियासी हालात और सामाजिक समीकरण तो बदले ही है, किसानों खासकर जाटों पर असर रखने वाले संगठनों से सपा-रालोद गठबंधन को ताकत मिल सकती है। पश्चिम यूपी के पहले चरण की 58 और दूसरे चरण की 56 सीटों पर क्रमश: 10 और 14 फरवरी को मतदान होना है। यह इलाका चीनी का कटोरा माना जाता है और गन्ना किसानों की यहां की सियासत में महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है।

इस वर्ग पर रालोद और भाकियू का प्रभाव माना-जाता है। कभी महेंद्र सिंह टिकैत उत्तर प्रदेश की सियासत को प्रभावित करते थे, अब उनके दोनो बेटे अध्यक्ष नरेश टिकैत और राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत हाथ किसानों की नब्ज को ठीक से पहचानता है। महेंद्र सिंह टिकैत का चुनाव को प्रभावित करने का अपना खास अंदाज रहा है।

उन्होंने 1991 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों के अवसर पर सिसौली में बैठक कर किसानों से संकेतों के जरिए अपील की थी कि वे मतदान के रोज ओम और राम का नाम लेकर वोट डाले। रामजन्मभूमि मंदिर आंदोलन के माहौल में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की किसान बिरादरियों ने भाजपा के बक्से भर दिए थे और कल्याण सिंह के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में भाजपा की पहली पूर्ण बहुमत की सरकार बनी थी।

महेंद्र सिंह टिकैत के बूते बीर बहादुर सिंह, मुलायम सिंह यादव, देवीलाल, चंद्रशेखर और एचडी देवगौड़ा सभी ने हुंकार भरी थी। यह बात दबी-छिपी नहीं है कि भारतीय किसान यूनियन अखिलेश यादव और जयंत चौधरी को सफल होते देखना चाहती है। 16 जनवरी को नरेश टिकैत के मुंह से भाजपा को हराने की बात निकल गई लेकिन तत्काल उनके भाई ने बात को संभालते हुए बयान जारी किया कि भाकियू चुनावी सियासत से दूर रहेगी।

17 जनवरी को नरेश टिकैत को भी अपने ब्यान से पलटना पड़ा जब उनकी बालियान खाप के केंद्रीय राज्यमंत्री डा. सुधीर बालियान उनके बीच पहुंचे थे। यह भी सभी जानते है कि लोकसभा चुनाव 2019 में भाकियू का समर्थन अजित सिंह को नहीं, उन्हें हराने वाले संजीव बालियान को था। भाजपा ने गन्ना पट्टी में जाटों के वर्चस्व को देखते हुए कई हलके-फुलके जाट नेताओं को संगठन और सरकार में महत्व दिया हुआ है। जिसके कोई खास सियासी मायने नहीं है। भाजपा के जाटों से ज्यादा दम विपक्ष में मौजूद जाटों में है। जाटों ने इस चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया है। उनका संकल्प देखकर कहा जा सकता है कि अबकी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए पिच आसान नहीं है।

मायावती ने मुलायम सिंह यादव के पृष्ठभूमि में चले जाने के दौरान पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित-मुसलिम गठजोड़ बनाकर कई बार सत्ता पाई। विपक्षी दल खासकर अखिलेश और जयंत चौधरी चुनाव को ध्रुवीकरण से रोकने से पूरे एहतियात बरत रहे है। प्रत्याशियों का चयन भी इसी के मद्देनजर सावधानीपूर्वक किया जा रहा है। विपक्ष को टिकटों के चयन से उपजे भाजपा के अंदरूनी विरोध का लाभ मिल सकता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश इस चुनाव मे सफलता कीं नई इबारत लिख सकता है। भाजपा नेतृत्व इस स्थिति से निपटने को कारगर रणनीति तैयार कर रहा है। उसका सारा दारोमदार अमित शाह के चुनाव प्रचार पर निर्भर रहेगा।

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