दबथुवा की रैली से जयंत अखिलेश का बढ़ा उत्साह

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद, अलीगढ़ और आगरा मंडल जाट बहुल होने के कारण लंबे दौर तक चौधरी चरण सिंह और अजित सिंह का गढ़ रहे। लेकिन भाजपा के मंदिर आंदोलन के उभार ने चौधरी चरण सिंह की जाट और मुसलमान गठबंधन की सियासत को छिन्न भिन्न कर दिया।

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मेरठ में मंगलवार को एक रैली को संबोधित करने से पहले सपा नेता अखिलेश यादव और रालोद नेता जयंत चौधऱी।

आखिर अखिलेश यादव और जयंत चौधरी एक मंच पर आ गए। मंगलवार को मेरठ के दबथुवा गांव में दोनों ने साझा रैली कर साफ कर दिया कि रालोद और सपा मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ेंगे। दोनों की 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद यह पहली साझा रैली थी। रैली की तैयारी सपा और रालोद के कार्यकर्ता कई दिन से कर रहे थे। तैयारी के हिसाब से भीड़ जुटी भी खूब। इतनी कि दोनों को अनुमान भी नहीं था। एक तरह से भीड़ बेकाबू होने के कारण कुछ अव्यवस्था भी दिखी।

अखिलेश यादव और जयंत चौधरी का साथ आना कोई अजूबी घटना भले न हो। खासकर इस संदर्भ में कि लोकसभा चुनाव में भी दोनों का गठबंधन था पर जयंत और उनके पिता अजित सिंह दोनों ही हार गए थे। पर ढाई साल में परिस्थितियां बदली हैं, लिहाजा सियासी आबोहवा में भी बदलाव दिख रहा है। योगी सरकार के पांच साल के कार्यकाल ने विपक्ष को ऊर्जा दी है।

जयंत और अखिलेश सूबे की भाजपा सरकार के प्रति लोगों के मूड को भांपकर बदलाव की बात कर रहे हैं। सरकार के खिलाफ महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और किसानों की पीड़ा को मुद्दा बना रहे हैं। भाजपा पर अलगाववाद की राजनीति करने और समाज में नफरत फैलाकर वोट बटोरने जैसे हथकंडे अपनाने का आरोप लगाते हुए अखिलेश और जयंत ने लोगों को सावधान रहने और किसी भी बहकावे में न आने का संदेश दिया।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद, अलीगढ़ और आगरा मंडल जाट बहुल होने के कारण लंबे दौर तक चौधरी चरण सिंह और अजित सिंह का गढ़ रहे। लेकिन भाजपा के मंदिर आंदोलन के उभार ने चौधरी चरण सिंह की जाट और मुसलमान गठबंधन की सियासत को छिन्न भिन्न कर दिया। अजित सिंह इसी वजह से लगातार अपना जनाधार खोते गए। मुजफ्फरनगर में 2013 में हुए सांप्रदायिक दंगों ने उनके जनाधार को और भी समेट दिया।

जाट और मुसलमान दोनों पहले किसान थे पर 2013 के बाद हिंदू-मुसलमान होकर रह गए। दबथुवा की रैली के मंच पर चौधरी चरण सिंह के साथ डाक्टर भीमराव अंबेडकर के चित्र का होना नए सामाजिक समीकरणों का संकेत दे रहा है। उत्तर प्रदेश में दलित मोटे तौर पर बसपा के साथ रहे हैं। यही वजह है कि पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा को सीटें भले 19 ही मिली हों पर उसे वोट फिर भी 20 फीसद मिले थे।

इस बार बसपा चुनावी परिदृश्य से अभी तक तो नदारद है। मुसलमानों और पिछड़ों को भुलाकर बीच में उसने ब्राह्मणों पर डोरे डालने की रणनीति अपनाई पर कुछ खास प्रभाव पड़ता दिखा नहीं। चुनाव में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है। तो भी मायावती ने अभी तक अपनी एक भी रैली नहीं की है।
भाजपा से नाराज दलित बखूबी समझ रहे हैं कि बहिन जी के सत्ता में आने के आसार नहीं हैं, लिहाजा उनका समर्थन करना परोक्ष रूप से भाजपा को ही सत्ता में वापस लाएगा। उलझन में दिख रहे ऐसे दलित मतदाताओं पर भी इस बार अखिलेश और जयंत की निगाह है। अंबेडकर को महत्व देना इसी रणनीति की तरफ इंगित करता है।

मायावती के उलट अखिलेश यादव एक महीने से जगह-जगह रैलियां कर लोगों का मूड भांप रहे हैं। उनकी सभाओं में आ रही भीड़ उनका उत्साह भी बढ़ा रही है। अखिलेश यादव ने दबथुवा में चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत की जमकर प्रशंसा की तो जयंत चौधरी ने कहा कि योगी को गोरखपुर की गऊशाला में भेजना है।

दबथुवा की रैली ने जयंत और अखिलेश का उत्साह इतना बढ़ाया कि जयंत ने अपने दादा चौधरी चरण सिंह की जयंती पर 23 दिसंबर को अलीगढ़ के इगलास में फिर साझा रैली करने का एलान कर दिया।

उन्होंने कहा कि सपा-रालोद की सरकार बनी तो सबसे पहले मेरठ में किसानों के लिए स्मारक बनाएंगे। जिससे किसान आंदोलन के दौरान शहीद हुए किसानों की कुर्बानी याद रहे। खेती की लागत बढ़ने और किसानों की आय दो गुना करने का भाजपा का वादा अधूरा रहने को भी अखिलेश यादव ने इस रैली में जानबूझकर मुद्दा बनाया। यहां ज्यादातर किसान गन्ने की खेती करते हैं।

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