scorecardresearch

सौ सीटों पर प्रसपा को लड़ाने की चाह रखने वाले शिवपाल सिंह अब लड़ रहे हैं अकेले

चुनाव पूर्व एक सौ से अधिक सीटों की मांग करने वाले शिवपाल सिंह यादव आखिरकार केवल एक सीट पर कैसे मान गए।

Up election
शिवपाल यादव,अखिलेश यादव।

दिनेश शाक्य

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का ऐलान होने के बाद जिस तरह से प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव केवल एक सीट पर चुनाव मैदान में उतरे हुए हैं, यह राजनीतिक हलकों में चर्चा का बड़ा विषय बना हुआ है। पीएसपीएल प्रमुख शिवपाल सिंह यादव उत्तर प्रदेश के इटावा जिले की जसवंतनगर विधासनसभा सीट से सपा गठबंधन के उम्मीदवार बनाए गए हैं जो सपा के साइकिल चुनाव चिन्ह से लड़ रहे हैं। इसी सीट से शिवपाल के बेटे आदित्य के चुनाव मैदान में उतरने की अटकले लगाई जा रही थीं लेकिन आदित्य के चुनाव लड़ने की संभावनाएं कम हो गई हैं।

राजनीतिक विश्लेषक यह नहीं समझ पा रहे हैं कि आखिरकार चुनाव पूर्व एक सौ से अधिक सीटों की मांग करने वाले शिवपाल सिंह यादव आखिरकार केवल एक सीट पर कैसे मान गए हैं, सिर्फ इतना ही नहीं पीएसपीएल के नेता और कार्यकर्ता भी सकते में हैं लेकिन कोई भी कुछ खुल कर के बोल पाने की स्थिति में नहीं है।

शिवपाल सिंह यादव भी अपने भतीजे सपा प्रमुख अखिलेश यादव को उत्तर प्रदेश का एक बार फिर से मुख्यमंत्री बनाने की बात कहते हुए दिखाई दे रहे हैं। केवल इतना ही नहीं, उन्होंने अखिलेश यादव को अब समाजवादी पार्टी का नया नेता भी मान लिया है। शिवपाल सिंह यादव साफ तौर पर कई दफा इस बात को भी कह चुके हैं कि अब समाजवादी पार्टी के नए नेता उनके भतीजे अखिलेश यादव हो चुके हैं और उनको उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाना एकमात्र लक्ष्य है।

विधानसभा चुनाव पूर्व शिवपाल सिंह यादव अपने संबोधन में कई बार बोल चुके थे कि 2022 विधानसभा चुनाव में सरकार किसी भी दल की बने लेकिन वे सरकार का हिस्सा हर हाल में होंगे। यह कुछ ऐसे सवाल थे जिनको लेकर के राजनीतिक हलकों में चर्चा होना लाजमी थी ही, कोई यह नहीं समझ पा रहा था कि शिवपाल सिंह यादव के इन बयानों का मतलब आखिरकार है क्या?

शिवपाल सिंह अपने बयानों में इस बात को भी प्रभावी ढंग से रखते हुए दिखाई देते थे कि वे जब भी चाहते हैं तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सीधे बात कर लेते हैं जबकि उनके भतीजे सपा प्रमुख अखिलेश यादव से उनकी बात नहीं हो पाती है। इससे एक बात साफ कही जा सकती है कि शिवपाल के रिश्ते सरकार में बैठे राजनेताओं के अलावा मुख्यमंत्री से बहुत ही बेहतर हैं। इस बीच, शिवपाल सपा के पाले में चले गए।

उत्तर प्रदेश में राजनीति को करीब से समझने वाले डा शांतनु मौर्य कहते हैं कि शिवपाल यादव ने तो अपने राजनीतिक गठबंधन से पहले ही कई सीटों पर प्रत्याशियों को चुनाव लड़ाने की न सिर्फ हामी भरी थी बल्कि उनका टिकट तक फाइनल कर दिया था लेकिन जब समझौता सपा से हुआ तो शिवपाल यादव की पार्टी से टिकट की चाह रखने वाले ऐसे कई बड़े नेताओं का अब फिलहाल कोई राजनीतिक भविष्य नजर नहीं आ रहा है।

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले शिवपाल यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी चुनावी गठबंधन के लिए 100 सीटों पर ताल ठोक कर चुनावी समझौते के तहत सीटें मांग रही थी लेकिन जब शिवपाल और अखिलेश यादव के बीच समझौता हुआ तो हालात बिल्कुल बदले हुए दिखे। शिवपाल को अब तक सिर्फ एक सीट ही चुनाव लड़ने के लिए मिली है। चुनाव चिन्ह भी सपा का यानी साइकिल है।

मौर्य उदाहरण देकर कहते हैं कि इटावा की भरथना सीट पर शिवपाल यादव ने सुशांत वर्मा को उम्मीदवार घोषित किया था चूंकि अब शिवपाल का समाजवादी पार्टी से गठबंधन है और सपा ने इसी भरथना सीट से राघवेंद्र गौतम को टिकट दे दिया है। इसी तरीके से पूर्व राज्यसभा सांसद वीरपाल यादव को शिवपाल यादव ने बिथरी चैनपुर से उम्मीदवारघोषित किया, लेकिन अखिलेश यादव ने इस चुनाव में अगम मौर्य को उम्मीदवार बना दिया।

शिवपाल सिंह ने इटावा सदर सीट से रघुराज सिंह का टिकट घोषित किया था। फिरोजाबाद की सिरसागंज सीट से शिवपाल हरीओम यादव का टिकट चाहते थे लेकिन उनका सपा में प्रवेश ही नही हो सका । बदली हुई सूरत मे हरीओम को सिरसागंज से भाजपा ने टिकट दे चुनाव मैदान मे उतार दिया। शांतनु कहते हैं कि यह तो महज उदाहरण है। ऐसा ही कुछ हाल शिवपाल यादव की पार्टी से ताल्लुक रखने वाले पूर्व मंत्री शारदा प्रताप शुक्ला, अरुणा कोरी, शादाब फातिमा समेत कई बड़े नेताओं का भी हुआ।

भले ही शिवपाल अपने समर्थकों को टिकट न मिलने पर शिवपाल खामोश हो लेकिन भीतरी तौर पर आक्रोश बड़े स्तर पर एहसास करा रहा है जो कही ना कही कुछेक सीटों पर नुकसान की ओर इशारा कर रहा है।

विलय जैसी स्थिति

राजनीतिक विश्लेषक सुभाष त्रिपाठी कहते हैं कि शिवपाल यादव और अखिलेश यादव की पार्टी के बीच हुए समझौते को सिर्फ राजनीतिक समझौता नहीं माना जाना चाहिए। क्योंकि यह परिवार से अलग हुआ एक बड़ा धड़ा था जो समझौते के साथ समाजवादी पार्टी में विलय जैसी ऐसी स्थिति में पहुंच गया। वे कहते हैं कि मान लीजिए शिवपाल यादव के कहने पर कुछ जिताऊ उम्मीदवारों के नाम समाजवादी पार्टी टिकट दे देती है, तो वह चुनाव सपा के चुनाव चिन्ह पर ही लड़ेंगे। ऐसे में अगर उनमें से कोई प्रत्याशी जीतता भी है तो वह समाजवादी पार्टी का ही प्रत्याशी माना जाएगा।

पढें उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 (Upassemblyelections2022 News) खबरें, ताजा हिंदी समाचार (Latest Hindi News)के लिए डाउनलोड करें Hindi News App.

अपडेट