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योगी को अभिभावक प्रतिनिधि के तौर पर देख रहा है गोरखपुर

उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने से पहले पांच बार गोरखपुर से लोकसभा के सदस्य रहे योगी आदित्यनाथ को लोग अब इस क्षेत्र के ‘अभिभावक’ की तरह देखने लगे हैं।

Assembly election, Gorakhpur
योगी आदित्यनाथ, राधा मोहन दास अग्रवाल , चंद्रशेख्रर आजाद। फाइल फोटो।

उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने से पहले पांच बार गोरखपुर से लोकसभा के सदस्य रहे योगी आदित्यनाथ को लोग अब इस क्षेत्र के ‘अभिभावक’ की तरह देखने लगे हैं और मानते हैं कि इलाके के कद्दावर नेता रहे पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह के निधन के बाद जो जगह खाली हो गई थी योगी उसकी भरपाई कर रहे हैं।

गोरखपुर शहर विधानसभा क्षेत्र में छठे चरण में तीन मार्च को मतदान होगा और योगी के यहां से भारतीय जनता पार्टी का उम्मीदवार घोषित होने के बाद पूरे प्रदेश की निगाह इस सीट पर है। योगी विधानसभा चुनाव में पहली बार अपनी किस्मत आजमाएंगे। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हर्ष कुमार सिन्हा का कहना है कि गोरखपुर की जनता का एक जख्­म रहा है कि वीर बहादुर सिंह के न रहने के बाद यहां कोई बड़ा नेता नहीं था। राजनीतिक अभिभावक नहीं था जिसके कारण विकास अवरुद्ध हुआ और यह क्षेत्र उपेक्षित रहा। इसलिए लोगों के मन में है कि एक बड़ा नेता यहां होना चाहिए।

योगी के अलावा इस विधानसभा क्षेत्र से अभी केवल आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष और भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद के ही चुनाव लड़ने की अधिकृत घोषणा हुई है। लेकिन 2017 में मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी के इस्तीफा देने से खाली हुई गोरखपुर संसदीय सीट पर भाजपा के म्मीदवार रहे दिवंगत उपेंद्र दत्त शुक्ल की पत्नी शुभावती शुक्ल ने हाल ही में समाजवादी पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली और योगी के खिलाफ उनके सपा उम्मीदवार होने की अटकलें लगाई जा रही हैं। उपेंद्र दत्त शुक्ल के पुत्र अमित दत्त शुक्ल ने कहा कि अखिलेश यादव ने चुनाव लड़ने को कहा है और मां के नाम पर पूरी सहमति बन गई है।

हुमायूंपुर उत्तरी निवासी युवा कारोबारी कौशल शाही ने प्रोफेसर सिन्हा की बात से सहमति जताते हुए कहा कि वीर बहादुर सिंह 24 नवंबर 1985 से 24 जून 1988 तक मुख्यमंत्री रहे और उन्हें गोरखपुर के विकास का श्रेय जाता है। उनके निधन के बाद यहां के खाद कारखाने में तालाबंदी, रामगढ़ ताल परियोजना के ठप होने और अन्य बुनियादी सुविधाओं का अभाव हर बार चुनावों में मुद्दा बना। शाही ने दावा किया कि योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद इन सब कार्यों के पूरा होने से यह मुद्दा समाप्त हो गया है।

गोरखपुर शहर विधानसभा क्षेत्र में साढ़े चार लाख मतदाता हैं और राजनीतिक जानकारों के मुताबिक यहां 60 से 70 हजार ब्राह्मण मतदाता हैं। यहां दूसरे नंबर पर 55 से 60 हजार कायस्थ, 50 हजार वैश्य, 40 हजार मुसलमान, 25 से 30 हजार क्षत्रिय, 50 हजार अनुसूचित जाति की आबादी और पिछड़ी जातियों में सैंथवार, चौहान (नोनिया), यादव आदि मिलाकर 75 हजार से अधिक लोग हैं। शहरी क्षेत्र में बंगाली, पंजाबी, ईसाई और सिंधी समाज के लोग भी निवास करते हैं और अलग-अलग मोहल्लों में इनकी बसावट है।

गोरखपुर संसदीय क्षेत्र में गोरखपुर (शहर), गोरखपुर (ग्रामीण), कैम्पियरगंज, सहजनवा और पिपराइच विधानसभा क्षेत्र आते हैं जबकि इस जिले के बांसगांव, चिल्लूपार, चौरीचौरा (बांसगांव लोकसभा क्षेत्र) तथा खजनी विधानसभा क्षेत्र (संत कबीर नगर लोकसभा क्षेत्र) दूसरे लोकसभा क्षेत्रों में आते हैं। गोरखनाथ मंदिर से करीब जाहिदाबाद मोहल्ले के रहने वाले चाय दुकानदार समीउल्लााह (62) ने कहा कि जो सरकार अच्छी चलाए हम उसी को वोट देंगे। हम लोग चाहेंगे कि योगी जीतें। जाहिदाबाद निवासी कपड़ों के कारोबारी सलीम (35) ने कहा, राजनीति में हमारी रुचि नहीं है लेकिन योगी की सरकार बनेगी क्योंकि उनका जनाधार है और वे अच्छा काम कर रहे हैं।

गौरतलब है कि आजादी के बाद विधानसभा चुनाव में शुरुआती तीन बार गोरखपुर शहर क्षेत्र से इस्तफा हुसैन (दो बार) और एक बार नियामतुल्­लाह अंसारी कांग्रेस पार्टी से जीते, जबकि भारतीय जनसंघ के टिकट पर एक बार उदय प्रताप दुबे (1969) और चार बार भारतीय जनता पार्टी के पार्टी के टिकट पर (1989-1996) शिवप्रताप शुक्ल यहां से चुनाव जीते। साल 1974 और 1977 में अवधेश कुमार श्रीवास्तव क्रमश: जनसंघ और जनता पार्टी के टिकट पर जीते जबकि 1980 और 1985 में पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पुत्र सुनील शास्त्री कांग्रेस से चुनाव जीते। 2002 से 2017 तक चार बार भारतीय जनता पार्टी के डाक्टर राधा मोहन दास अग्रवाल ने गोरखपुर शहर से चुनाव जीता।

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