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दिल्ली में दो वर्गों का वोट तय करेगा हार-जीत

सालों दिल्ली के लोकसभा चुनाव में पाकिस्तान से देश के विभाजन के बाद आए लोग, आजादी के बाद हरियाणा और उत्तर प्रदेश के गांवों से आए वैश्य समाज के लोग और स्थानीय गांव के लोगों का दबदबा रहता था।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (REUTERS)

इस लोकसभा चुनाव में यह साफ दिखने लगा है कि दिल्ली वही जीतेगा जिसे पूर्वांचल के प्रवासियों (बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के मूल निवासियों) के साथ-साथ दलितों और अल्पसंख्यक वर्ग में से कम से कम दो का साथ मिले। इन तीनों के अलावा जो आबादी दिल्ली में है उनके वोट करने का तरीका इन तीनों वर्गों से थोड़ा अलग है। इन तीन वर्गों में दिल्ली की करीब 15 फीसद से ज्यादा आबादी वाला अल्पसंख्यक वर्ग उसी को वोट करेगा जो भाजपा को हराता दिखे। सात में से तीन लोकसभा सीट-दिल्ली उत्तर पूर्व, पूर्वी दिल्ली और चांदनी चौक में तो एक किसी बड़े वर्ग के साथ अल्पसंख्यक का जुड़ना जीत की गारंटी बन सकता है। आम आदमी पार्टी (आप) और कांग्रेस के नेता उन्हें अपने पक्ष में करने में लगे हुए हैं। पूर्वांचल के प्रवासी और दलित (दिल्ली में करीब 17 फीसद) सालों से कांग्रेस को वोट करते रहे। पहली बार 2013 में दोनों ने अलग होकर वोट किया और 2015 में वे आप के साथ जुड़ गए। बिहार मूल के दिल्ली भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी आदि के प्रयास से पूर्वांचल के प्रवासियों का एक वर्ग भाजपा के साथ जुड़ा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में दिल्ली में एक हद तक जाति की दीवार तोड़ी।

सालों दिल्ली के लोकसभा चुनाव में पाकिस्तान से देश के विभाजन के बाद आए लोग, आजादी के बाद हरियाणा और उत्तर प्रदेश के गांवों से आए वैश्य समाज के लोग और स्थानीय गांव के लोगों का दबदबा रहता था। कुछ सीटों पर तो भाजपा और कांग्रेस राष्ट्रीय नेताओं को चुनाव लड़वाती थी। फिर उत्तर प्रदेश, राजस्थान और उत्तराखंड के मूल निवासियों को भी कोटे जैसा टिकट दिया जाने लगा था, लेकिन उन राज्यों के प्रवासियों को भी नेतृत्त्व करने का मौका नहीं दिया गया। पहली बार 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने बिहार मूल के महाबल मिश्र को पश्चिमी दिल्ली से उम्मीदवार बनाया तो लोगों ने उनकी हार सुनिश्चित मान ली थी। पूर्वांचल के प्रवासी मतों के बूते और महाबल मिश्र की मेहनत और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सिख वोटों पर असर से उनकी जीत हो गई। उसके बाद तो राजनीति में बदलाव आया और ‘आप’ ने अपनी राजनीति का केंद्र प्रवासियों और गरीबों(दलितों) को बनाया। उसका उन्हें लाभ मिला। ‘आप’ को पहले 2013 के विधानसभा चुनाव में करीब 29 फीसद वोट और 2015 के चुनाव में 54 फीसद वोट और 70 विधानसभा सीटों में से 67 पर जीत हासिल हुई। इस चुनाव में कांग्रेस का पूरा वोट बैंक ही ‘आप’ में चला गया और कांग्रेस दस फीसद वोट लेकर हाशिए पर चली गई। दिल्ली में भाजपा 1998 में दिल्ली सरकार से बाहर हुई, तब से वह कभी विधानसभा चुनाव नहीं जीत पाई। इसका बड़ा कारण भाजपा का वोट समीकरण है। भाजपा खास वर्ग की पार्टी मानी जाती है। गैर-भाजपा मतों का ठीक से विभाजन होने पर ही भाजपा विधानसभा या नगर निगम चुनाव जीत पाती है। 1993 में दिल्ली विधानसभा के चुनाव में उसे करीब 43 फीसद वोट मिले तब वह सत्ता में आई।

उसके बाद उसका वोट औसत लोकसभा चुनावों के अलावा कभी भी 36-37 फीसद से बढ़ा ही नहीं। पहली बार भाजपा के टिकट पर सांसद बनने के बाद प्रदेश अध्यक्ष बने मनोज तिवारी ने 2017 के निगमों के चुनाव में 32 बिहार मूल के उम्मीदवारों को टिकट दिलवाया, जिसमें 20 चुनाव जीत गए। 36 फीसद वोट लाकर भाजपा तीसरी बार निगमों की सत्ता पर काबिज हुई। अस्सी के दशक से दिल्ली के राजनीतिक समीकरण में बदलाव की शुरुआत तेजी से हुई और उसके तीन दशक बाद दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से 50 सीटों में पूर्वांचल के प्रवासी 20 से 60 फीसद तक हो गए हैं। दिल्ली का हर चौथा या पांचवा मतदाता पूर्वांचल का प्रवासी माना जाने लगा है। भोजपुरी समाज के प्रमुख अजीत दुबे कहते हैं कि 2015 के विधानसभा चुनाव और 2017 के नगर निगम चुनाव ने साबित कर दिया कि अब दिल्ली में रहने वाले ज्यादातर प्रवासी दिल्ली के मतदाता बन गए हैं। नई दिल्ली, पश्चिमी दिल्ली और दक्षिणी दिल्ली में अल्पसंख्यक मतदाता 20 फीसद से ज्यादा हैं। सबसे ज्यादा अल्पसंख्यक मतदाता दिल्ली उत्तर पूर्व सीट पर हैं और संयोग से दिल्ली उत्तर पश्चिम की तरह सबसे ज्यादा पूर्वांचल के प्रवासी मतदाता भी इसी सीट पर हैं। इस सीट पर तीनों उम्मीदवार गैर-प्रवासी हैं। गुगन सिंह जहां स्थानीय हैं वहीं भाजपा के हंसराज हंस लोकप्रिय गायक हैं। मनोज तिवारी के अलावा दोनों उम्मीदवार शीला दीक्षित और दिलीप पांडेय भी अपने को पूर्वांचली बताते हैं लेकिन बड़ी लड़ाई अल्पसंख्यक मतों की दोनों में हैं। यही लड़ाई चांदनी चौक में अब सीधी डॉ हर्षवर्धन और कांग्रेस के जयप्रकाश अग्रवाल में दिख रही है। पूर्वी दिल्ली में तिकोनी लड़ाई में गौतम गंभीर के मुकाबले पहले आतिशी दिख रही थीं अब अरविंदर सिंह लवली दिख रहे हैं।

नई दिल्ली
यह ऐसी सीट ऐसी है जहां पूर्वांचल के प्रवासी 15 फीसद से कम हैं। दलित के अलावा अल्पसंख्यक पांच फीसद हैं। कायदे में यह सीट जातीय समीकरण से भाजपा के पक्ष वाली मानी जाती है। इस बार भाजपा का विरोध, सरकारी कर्मचारियों और सीलिंग से के चलते भाजपा के हाथ से निकलती दिखती है।

पश्चिमी दिल्ली
इस सीट पर भी अल्पसंख्यक कम हैं लेकिन प्रवासी 20 फीसद से ज्यादा हैं। इसी के चलते कांग्रेस के महाबल मुकाबले में हैं। इस सीट पर जीत हार में बड़ी भूमिका गांवों के लोग और पंजाबी बहुल इलाके करेंगें। इससे ज्यादा पूर्वांचल के प्रवासी और अल्पसंख्यक उत्तर पश्चिम सीट पर हैं।

दक्षिणी दिल्ली
इस सीट पर भी उत्तर पश्चिम जैसा अनधिकृत कॉलोनियों और 54 गांवों के स्थानीय नागरिक निर्णायक होने वाले हैं। कांग्रेस उम्मीदवार मुक्केबाज विजेंदर सिंह के चलते गांवों के वोट बंट रहे हैं। इससे रमेश बिधूड़ी परेशान हैं। पूर्वांचली वोट पर इस सीट पर बड़ी लड़ाई है।

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