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नरेंद्र सिंह तोमर के गढ़ में जमकर गरज रही किन्नर प्रत्याशी नेहा, दोहरा सकती है शबनम मौसी का इतिहास

नेहा ने उस मुद्दे को छुआ है जिसने प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को असहज कर दिया था।

अंबाह से किन्नर प्रत्याशी नेहा और देश की पहली किन्नर विधायक शबनम मौसी (फोटोः सोशल मीडिया)

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में इन दिनों किन्नर प्रत्याशियों का प्रचार-प्रसार भी जोर-शोर से चल रहा है। पूरे राज्य में इस दफा पांच किन्नर प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं और पांचों ने बतौर निर्दलीय नामांकन दाखिल किया है। इनमें इंदौर-2 से बाला वेश्वर, दमोह से रेहाना, होशंगाबाद से पांची देशमुख, कटनी की बड़वारा विधानसभा सीट से दुर्गा मौसी और अंबाह विधानसभा से नेहा शामिल हैं। सबसे ज्यादा चर्चा डाकुओं के लिए कुख्यात चंबल के बीहड़ में स्थित मुरैना जिले की अंबाह सीट को लेकर है। यह इलाका भाजपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष और वर्तमान केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का गढ़ माना जाता है।

मुद्दा वो जिस पर शिवराज भी मुश्किल में फंस गए
अंबाह से मैदान में उतरी किन्नर प्रत्याशी नेहा ने उस मुद्दे को छुआ है जिसने प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को असहज कर दिया था। आरक्षित सीट से चुनाव लड़ रही नेहा ने सामान्य वर्ग के मतदाताओं पर फोकस करते हुए आरक्षण और अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम का स्पष्ट विरोध किया है। उनका पूरा फोकस सामान्य वर्ग के मतदाताओं को आकर्षित करने पर है। ताकि बाकी उम्मीदवारों के बीच वोटों के बंटवारे और ध्रुवीकरण का लाभ उन्हें मिल सके।

दोहरा सकती हैं शबनम मौसी का इतिहास

क्षेत्र के सियासी हालात देखते हुए कयास लगाए जा रहे हैं कि नेहा देश की पहली किन्नर विधायक रहीं शबनम मौसी का इतिहास दोहरा सकती हैं। शबनम मौसी 1998 से 2003 तक मध्य प्रदेश के ही सुहागपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक रही थीं। दरअसल जिस सीट से नेहा चुनाव लड़ रही हैं वहां भाजपा, कांग्रेस और बसपा तीनों लगभग मिलती-जुलती जातियों के लोगों को प्रत्याशी बनाया है। यहां कांग्रेस से कमलेश जाटव, भाजपा से गब्बर सखवार और बसपा से सत्यप्रकाश सखवार मैदान में हैं। इस जाति के यहां सबसे अधिक वोट हैं लेकिन तीन प्रत्याशी होने से उनमें वोट बंटना स्वाभाविक माना जा रहा है। जबकि नेहा छारी जाति से ताल्लुक रखती हैं और उनका फोकस सामान्य वर्ग के मतदाताओं पर है। गौरतलब है कि एससी-एसटी एक्ट पर बवाल के बाद यह मुद्दा भी चुनाव में खासा गर्म है। इन तमाम समीकरणों का फायदा नेहा को मिल सकता है।

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