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सियासी जमीन संग भरोसेमंद की तलाश बड़ी चुनौती

गौर करने वाली बात यह है कि बसपा के लिए अति पिछड़े तबके का वोट जुटाने वाले करीब सभी बड़े ओबीसी नेता पार्टी से बाहर हैं। पार्टी के मुसलिम चेहरे कहे जाने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी भी माया के विराधी नंबर वन बन चुके हैं।

बसपा प्रमुख मायावती फोटो सोर्स- जनसत्ता

सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में खाता न खोल पाने वाली बहुजन समाज पार्टी, सत्रहवीं लोकसभा चुनाव में अपनी खोई साख बचाने की कोशिश में है। हालांकि बसपा प्रमुख मायावती ने सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में खाता न खुल पाने की कड़वी हकीकत को भांप कर इस बार अपनी कट्टर शत्रु समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया है। इस चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग के अपने पुराने फार्मूले को वे आजमाने से कतरा रही हैं। साथ ही खांटी बसपाइयों के पार्टी से अलग होने की कमी भी बहनजी को खासी खल रही है।

गौर करने वाली बात यह है कि बसपा के लिए अति पिछड़े तबके का वोट जुटाने वाले करीब सभी बड़े ओबीसी नेता पार्टी से बाहर हैं। पार्टी के मुसलिम चेहरे कहे जाने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी भी माया के विराधी नंबर वन बन चुके हैं। ये सभी नेता मायावती के हर पुराने मामले को बीजेपी तक पहुंचाने में अब तक कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। सियासी जमीन और भरोसेमंद साथी खोने के बाद उपचुनावों में अपने वोट बैंक की ताकत का अहसास ही उनमें आत्मविश्वास पैदा कर रहा है।

समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करने के बाद भाजपा गठबंधन के दो दलों सपा और बसपा के पारंपरिक वोट बैंक को अपने पाले में सुरक्षित रखने की पूरी तैयारी में है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 में से खुद 71 सीटें जीतने वाली भाजपा ने विधानसभा चुनावों में 325 सीटें जीतकर इस बात की ताकीद करा दी है कि सपा और बसपा के वोट बैंक के बिना वह इस जादुई आंकड़े को हासिल नहीं कर सकती थी। ऐसे में वर्ष 2014 से सपा और बसपा के वोट बैंक में सेंधमारी कर उसे अपने पाले में करने में कामयाबी हासिल कर चुकी भाजपा इस बार भी गठबंधन के वोट बैंक पर पैनी निगाहें गड़ाए हुए है।
सपा के पारंपरिक पिछड़े वोट बैंक का बड़ा हिस्सा भाजपा पहले ही छीन चुकी है।

बसपा प्रमुख के लिए पिछले कुछ चुनाव अच्छे नहीं रहे हैं। वर्ष 2012 में उत्तर प्रदेश चुनावों में उनकी पार्टी को 26 फीसद मत के साथ 403 में से 80 सीटें मिली थीं। लेकिन पार्टी को सबसे बड़ा झटका वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में लगा। तब मत प्रतिशत के हिसाब से उत्तर प्रदेश में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद बसपा एक भी सीट नहीं जीत पाई।

विधानसभा चुनाव में 22.2 फीसद वोट हासिल करने के बावजूद वह महज 19 सीटें ही जीत पार्इं। अब स्वामी प्रसाद मौर्य, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, ठाकुर जयवीर सिंह सरीखे दर्जनों नेता बसपा छोड़कर भाजपा का दामन थाम चुके हैं। कई नेता मौजूदा योगी सरकार में मंत्री हैं। ऐसे में बसपा प्रमुख के पास उत्तर प्रदेश में अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को संगठित करने के लिए जोर लगाना पड़ रहा है। समाजवादी पार्टी, बहनजी की सियासी खस्ता हालत का लाभ लेने की कोशिश में है। उत्तर प्रदेश में हाशिये पर आ चुके दो क्षेत्रीय दलों की दुर्दशा की बाबत भाजपा के वरिष्ठ नेता विजय बहादुर पाठक कहते हैं, सपा और बसपा ने 15 वर्षों में उत्तर प्रदेश में विकास के नाम पर क्या किया? यह किसी से छिपा नहीं है।

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