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Lok Sabha Election 2019: तृणमूल के गढ़ में सेंध लगाना चुनौती

Lok Sabha Election 2019 (लोकसभा चुनाव 2019): वर्ष 2019 में तृणमूल उम्मीदवार इदरीस अली की जीत का अंतर तो बढ़ कर 1.10 लाख तक पहुंच गया। लेकिन भाजपा को मिलने वाले वोट भी बढ़ कर 18.36 फीसद तक पहुंच गए।

पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

Lok Sabha Election 2019: लोकसभा चुनाव के अंतिम चरण से पहले सत्ता के दावेदारों के बीच तेज होती सियासत के बीच भाजपा के लिए तृणमूल कांग्रेस के सबसे मजबूत गढ़ में सेंध लगाने की कड़ी चुनौती है। इस दौर में जिन नौ सीटों पर मतदान होना है वह राजधानी कोलकाता और उसके आस-पास हैं। इस दौर के के नतीजों से साबित होगा कि शहरी मतदाताओं पर तृणमूल कांग्रेस की पकड़ अब भी पहले जैसी है या भाजपा को इसमें सेंध लगाने में कामयाबी मिली है। भाजपा के लिए मतदान का छठा दौर तो अहम था ही, लेकिन इस दौर की अहमियत भी कम नहीं है। छठे दौर में पार्टी के सामने जहां झारखंड से लगे इलाकों में बेहतर प्रदर्शन की चुनौती थी, वहीं सातवां दौर शहरी मतदाताओं के बीच उसकी पैठ का पैमाना साबित होगा। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में यह तमाम सीटें तृणमूल कांग्रेस ने ही जीती थीं।

मतदान का आखिरी दौर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए भी काफी महत्त्वपूर्ण है। शहरी इलाकों में रहने वाले गरीब तबके के वोटर तृणमूल कांग्रेस के समर्थक रहे हैं। इन चुनावों से पता चलेगा कि उसका यह वोट बैंक अटूट है या भाजपा ने इसमें सेंध लगा दी है। यह कहना सही होगा कि इस दौर में ममता की साख दांव पर है। आखिरी दौर में खासकर दो सीटें-जादवपुर और कोलकाता दक्षिण बेहद अहम हैं। ममता बनर्जी ने पहली बार जादवपुर सीट जीत कर ही राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखा था। उसके बाद वे कोलकाता दक्षिण सीट पर लगातार जीतती रही हैं।

राजनीतिक प्रेक्षक प्रोफेसर रणबीर समाद्दार कहते हैं कि शहरी इलाकों के गरीब तबके और खासकर झोपड़पट्टियों के लोग शुरू से ही ममता का समर्थन करते रहे हैं। उच्च वर्ग और शहरी मध्यवर्ग शुरू से ही माकपा का वोट बैंक रहा है। अब इन चुनाव से पता चलेगा कि इन दोनों तबके के वोट किसे मिलते हैं।
वर्ष 2009 में ममता बनर्जी कोलकाता दक्षिण सीट पर जीत कर केंद्र की यूपीए सरकार में रेल मंत्री बनी थीं। लेकिन सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद वर्ष 2011 के विधानसभा चुनावों के बाद उन्होंने इस सीट से इस्तीफा दे दिया था। उसी साल हुए उपचुनाव में ममता की करीबी सुब्रत बख्शी यहां से जीते थे। बख्शी ने वर्ष 2014 के चुनाव में भी यह सीट बरकरार रखी। उन्होंने भाजपा के तथागत राय को 1.36 लाख वोटों से हराया था। वर्ष 2009 के मुकाबले 2014 में इस सीट पर भाजपा को मिले वोटों में जहां 21.33 फीसद की वृद्धि दर्ज की गई थी, वहीं तृणमूल कांग्रेस के वोटों में 20.24 फीसद की गिरावट आई थी। तृणमूल कांग्रेस ने इस बार माला राय को यहां उम्मीदवार बनाया है। माकपा की ओर से यहां नंदिनी मुखर्जी मैदान में हैं और कांग्रेस की ओर से मीता चक्रवर्ती।

भाजपा की ओर से नेताजी के पड़पोते चंद्र कुमार बसु यहां मैदान में हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के मैदान में होने से डायमंड हार्बर सीट की अहमियत काफी बढ़ गई है। कभी वामपंथियों का गढ़ रही इस सीट पर वर्ष 2009 में तृणमूल कांग्रेस के सोमेन मित्र जीते थे। वर्ष 2014 में ममता के भतीजे अभिषेक यहां से सांसद बने। तब भाजपा यहां तीसरे स्थान पर थी। अबकी अभिषेक के मुकाबले भाजपा ने नीलांजन राय को मैदान में उतारा है। कांग्रेस की ओर से अबकी सौम्या आइच राय मैदान में हैं तो माकपा की ओर से डा. फवाद आलम।

बांग्लादेश की सीमा से लगी बशीरहाट संसदीय सीट लगभग तीन दशक तक भाकपा का गढ़ रही है और इंद्रजीत गुप्ता भी यहां से सांसद रह चुके हैं। वर्ष 2009 में तृणमूल उम्मीदवार शेख नुरूल इस्ताम ने भाकपा के अजय चक्रवर्ती को 60 हजार वोटों के हरा कर इस सीट पर कब्जा किया था। तब भाजपा उम्मीदवार स्वपन कुमार दास को महज 6.51 फीसद वोट मिले थे।

वर्ष 2019 में तृणमूल उम्मीदवार इदरीस अली की जीत का अंतर तो बढ़ कर 1.10 लाख तक पहुंच गया। लेकिन भाजपा को मिलने वाले वोट भी बढ़ कर 18.36 फीसद तक पहुंच गए। अबकी तृणमूल कांग्रेस की ओर से बांग्ला फिल्मों की मशहूर अभिनेत्री नुसरत जहां के अलावा भाकपा के पल्लब सेनगुप्त, भाजपा के सायंतन बसु और कांग्रेस के काजी अब्दुर रहमान यहां मैदान में हैं। भाजपा ने अंतिम दौर में कम से कम चार सीटों पर पूरी ताकत झोंक दी है। चुनाव प्रचार के आखिरी दो दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चार रैलियों से साफ है कि पार्टी के लिए इस दौर की कितनी अहमियत है।

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