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मतदाताओं की खामोशी से बेचैनी बढ़ी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उम्मीदवार हरीश द्विवेदी और बसपा सुप्रीमो मायावती उम्मीदवार राम प्रसाद चौधरी के समर्थन में चुनावी रैलियां कर चुके हैं जबकि कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी की राज किशोर सिंह के समर्थन में चुनावी रैली शुक्रवार को राजकीय इंटर कॉलेज में होनी है।

Author Published on: May 9, 2019 2:13 AM
अखिलेश यादव ने ईवीएम की गड़बड़ी पर उठाए सवाल। (express photo)

लक्ष्मी नारायण पांडे

बस्ती संसदीय सीट पर होने जा रहे छठे चरण के लोकसभा चुनाव में तीन राजनीतिक दिग्गजों की प्रतिष्ठा जहां दांव पर लगी है वहीं मतदाताओं की खामोशी इन दिग्गजों और उनके समर्थकों की बेचैनी बढ़ा रही है. इस संसदीय सीट पर इस बार कुल 11 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं पर मुख्य मुकाबला भाजपा के हरीश द्विवेदी, महागठबंधन के राम प्रसाद चौधरी और कांग्रेस के राज किशोर सिंह के बीच है। शुरुआती दौर में हरीश द्विवेदी और बसपा के उम्मीदवार राम प्रसाद चौधरी के बीच सीधी टक्कर मानी जा रही थी पर नामांकन के आखिरी क्षणों में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व मंत्री राजकिशोर सिंह को उतारकर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है।

लोकसभा के पिछले चुनाव में हरीश द्विवेदी ने सपा के ब्रजकिशोर सिंह को 33562 मतों से पछाड़कर जीत दर्ज की थी जबकि बसपा के राम प्रसाद चौधरी तीसरे स्थान पर थे। हरीश द्विवेदी जहां मोदी सरकार की पांच साल की उपलब्धियों और अपने विकास कार्यों के बूते मैदान में हैं वहीं महागठबंधन के बसपा उम्मीदवार राम प्रसाद चौधरी दलित, पिछड़ों और मुसलिमों के मजबूत जातीय गठजोड़ के कारण चुनौती पेश कर रहे हैं। राम प्रसाद चौधरी पांच बार इसी संसदीय इलाके की कप्तानगंज विधानसभा सीट से विधायक और 1989 में जनता दल के उम्मीदवार के तौर पर संत कबीर नगर संसदीय सीट से सांसद रहने के अलावा कई बार मंत्री भी रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उम्मीदवार हरीश द्विवेदी और बसपा सुप्रीमो मायावती उम्मीदवार राम प्रसाद चौधरी के समर्थन में चुनावी रैलियां कर चुके हैं जबकि कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी की राज किशोर सिंह के समर्थन में चुनावी रैली शुक्रवार को राजकीय इंटर कॉलेज में होनी है। चुनाव प्रचार में स्थानीय मुद्दे पूरी तरह गायब हैं और जातिवाद-धर्म के मुद्दे प्रभावी नजर आ रहे हैं। मतदाताओं की खामोशी न टूटने से उम्मीदवार और समर्थक सभी बेचैन हैं।

चीनी मिलों की बंदी, प्लास्टिक कांप्लेक्स की बदहाली और नए उद्योगों की स्थापना न होने से बेरोजगारों का महानगरों को पलायन जारी है जिससे चुनाव आयोग की कोशिशों के बाद भी मतदान प्रतिशत बढ़ने की उम्मीद नजर नहीं आ रही है। 17 लोकसभा चुनाव के दौरान तीन दशकों तक कांग्रेस का दबदबा कायम रहा लेकिन समय बदलने के साथ कांग्रेस की पकड़ कमजोर होती चली गई। और अब वह अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रही है जबकि भाजपा अब तक इस सीट पर छठी बार परचम लहराने के लिए चुनाव मैदान में है।

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