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मध्य प्रदेश में भी है एक ‘नोएडा’, 13 साल बाद गए शिवराज और चली गई CM की कुर्सी

मध्यप्रदेश में भी एक नोएडा है, जिसे अशोक नगर के नाम से जाना जाता है। कहते हैं कि अशोक नगर मुख्यमंत्रियों की कुर्सियों को खा जाता है।

Author Updated: December 13, 2018 10:02 AM
शिवराज सिंह चौहान, फोटो सोर्स- सोशल मीडिया
  • अमिताभ तिवारी/अमर सिन्हा

राजनीति में रुचि रखने वाले नोएडा के मिथक या यूं कहें कि अंधविश्वास से अच्छी तरह परिचित होंगे। माना जाता है कि जो भी मुख्यमंत्री यहां जाता है, उसकी कुर्सी चली जाती है। मध्यप्रदेश में भी एक नोएडा है, जिसे अशोक नगर के नाम से जाना जाता है। कहते हैं कि अशोक नगर मुख्यमंत्रियों की कुर्सियों को खा जाता है। यहां आने वाला कोई मुख्यमंत्री अब तक इससे बचा नहीं। शायद इसीलिए 13 साल तक मध्यप्रदेश के मुख्मंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान भी कई बार आमंत्रित किए जाने के बावजूद अशोक नगर जाना टालते रहे। खुद भी उन्होंने 2013 में आने का वादा किया, लेकिन नहीं पहुंचे।

नहीं पहुंचे शिवराज, मिल गई थी चुनौती
24 अगस्त 2017 को अशोकनगर कलेक्ट्रेट की नई इमारत के उद्घाटन के लिए शिवराज को आमंत्रित किया गया। उन्होंने आमंत्रण स्वीकार किया, लेकिन वह नहीं गए। कई बार ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि शिवराज सिंह चौहान को अशोक नगर भी आना चाहिए, यह भी उनके ही राज्य का हिस्सा है। इसी साल के प्रारम्भ में कांग्रेसी नेता तरुण भट्ट ने चुनौती देते हुए कहा था कि सीएम शिवराज अशोक नगर आएं, तो 51 हजार रुपये अस्पताल में दान दूंगा।

अशोकनगर की वजह से गई ‘कुर्सी’ ?
2018 की शुरुआत में जब अशोकनगर की एक विधानसभा सीट मुंगावली में उपचुनाव होना था, तब और हाल ही में चुनाव प्रचार के दौरान शिवराज मुंगावली गये, लेकिन कार की बजाय हेलिकॉप्टर से। लेकिन 11 दिसंबर को आये मध्यप्रदेश विधानसभा के चुनाव परिणाम ने साबित कर दिया कि कुछ तो बात है, जो बड़े-बड़े सूरमा भी कुर्सी पर रहते हुए वहां जाने से कतराते हैं। तो क्या यह समझा जाये कि अजेय समझे जाने वाले शिवराज की कुर्सी को भी अशोक नगर ही निगल गया या वास्तव में एंटी इंकम्बेंसी, नोटबंदी, जीएसटी, किसान आंदोलन जैसे कारणों को जिम्मेदार माना जाये।

मुख्यमंत्रियों की कुर्सियां खाने वाले अशोक नगर का यह मिथक कितना सही है या गलत, यह तो कहना मुश्किल है, लेकिन सत्ता में रहते हुए जो लोग भी अशोक नगर गए, उनकी कुर्सी कुछ ही दिनों में चली गई। आइए, जानें कुछ ऐसे बड़े नामों के बारे में-

प्रकाश चंद्र सेठी-  1975 में तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश चंद्र सेठी इसी साल पार्टी के अधिवेशन में अशोकनगर गए और साल खत्म होते-होते 22 दिसंबर को इनकी कुर्सी चली गई।

श्यामा चरण शुक्ला – 1977 में तत्कालीन मुख्यमंत्री श्यामा चरण तुलसी सरोवर का लोकार्पण करने अशोकनगर आये। यह भी अशोक नगर के मिथक का शिकार बने और 29 मार्च 1977 में सूबे में राष्ट्रपति शासन लगा और इन्हें कुर्सी छोड़नी पड़ी।

अर्जुन सिंह – 1985 में कांग्रेस के कद्दावर नेता अर्जुन सिंह भी इस मिथक के जाल में फंस गए। इनके मुख्यमंत्री रहते तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी दौरे पर आये और इन्हें भी उनके साथ अशोक नगर जाना पड़ा। फिर सियासी हालात ऐसे बने कि इनकी भी कुर्सी जाती रही। संतोष की बात यह रही कि गवर्नर बनाकर इन्हें पंजाब भेज दिया गया, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी तो चली ही गई।

मोतीलाल वोरा – 1988 में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा अशोक नगर के रेलवे स्टेशन के फुटओवर ब्रिज के उद्घाटन के लिए रेलमंत्री माधवराव सिंधिया के साथ पहुंचे। अशोक नगर का मिथक इन पर भी बहुत भारी पड़ा और कुछ वक्त बाद ही यह मुख्यमंत्री नहीं रहे।

सुंदरलाल पटवा- 1992 में अशोक नगर में आयोजित कल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव में शामिल हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा की भी कुर्सी कुछ ही समय में चली गई। दरअसल, इसी दौरान अयोध्या के विवादित ढांचे को ढहाया गया था, जिसके कारण भाजपा शासित राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया और इन्हें भी कुर्सी छोड़नी पड़ी।

दिग्विजय सिंह – अशोक नगर में कदम रखने पर सत्ता गंवाने वालों की फेहरिस्त में दिग्गी राजा का नाम भी शामिल है। यह अपने चुनाव प्रचार नहीं, बल्कि 2001 में माधव राव सिंधिया के देहांत के बाद खाली हुई सीट पर उनके बेटे ज्योतिरादित्य के प्रचार के लिए अशोक नगर गये थे, फिर भी इनकी कुर्सी नहीं बची। इनकी कुर्सी जाने में थोड़ा वक्त लगा, लेकिन 2003 में उमा भारती ने इन्हें कुर्सी से अपदस्थ कर दिया।

 

(ये लेखक के अपने विचार हैं, Jansatta.com इसके लिए उत्तरदायी नहीं है)

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