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मोदी से क्यों बढ़ी शत्रुघ्न सिन्हा की दूरी? 6 साल तक पहले दिया गया ‘फ्रैंक ओपेनियन’ पड़ा भारी

2015 में बिहार में बीजेपी की हार के बाद शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा था कि अगर जीत की ताली कप्तान को तो गाली भी कप्तान को। इसके बाद कई मौकों पर उन्होंने कभी मोदी के नेतृत्व की प्रशंसा की पर कई मौकों पर ताने भी कसे। लेकिन बीजेपी में 27 साल के राजनीतिक करियर के बाद आखिरकार उन्होंने पार्टी छोड़ने के संकेत दे दिए हैं।

Author Updated: March 29, 2019 2:57 PM
पीएम नरेंद्र मोदी और शत्रुघ्न सिन्हा फोटो सोर्स- सोशल मीडिया

Lok Sabha Election 2019: बीजेपी में 27 साल के राजनीतिक करियर के बाद आखिरकार शत्रुघ्न सिन्हा ने पार्टी छोड़ दी। आडवाणी खेमे के समझे जाने वाले शत्रुघ्न सिन्हा ने आखिरकार पार्टी में अनदेखी और पटना से सीट ना मिलने के बाद कांग्रेस की ओर रूख कर लिया। बॉलीवुड से राजनीति में कदम रखने वाले बड़े नामों में शत्रुघ्न सिन्हा एक हैं, और इन्होंने न सिर्फ राजनीति में पैठ बनाई बल्कि कई बड़े स्टार कि तरह फिर राजनीति छोड़ सिनेमा में गए नहीं। यही तो वजह है कि पार्टी में बड़े नेता के तौर पर भी देखे गए और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में केंद्रीय मंत्री भी बने। आखिर इसकी शुरुआत कैसे हुई? इसकी पूरी दास्तां पढ़िए…

ऐसे हुई थी मोदी के विरोध की शुरुआत: बात जुलाई 2013 की है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में राज्यों के चुनाव होने वाले थे उसी के साथ बीजेपी 2014 के लिए प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भी तय करने के क्रम में आ गई थी। गुजरात में 2012 का चुनाव जीत कर इस दावेदारी की तरफ नरेंद्र मोदी सबसे तेजी से आगे बढ़ थे। दो बार चुनाव का नेतृत्व मिलने के बाद सत्ता न दिला पाने के कारण आरएसएस लाल कृष्ण आडवाणी को लेकर आगे बढ़ने के मूड में नहीं था। जब इसकी भनक आडवाणी और उनके साथी नेताओं को हुई तो पार्टी में ही मोदी का विरोध शुरू हो गया था। बयान देने वालों में शत्रुघ्न सिन्हा ही सिर्फ नहीं थे बल्कि कई और नेताओं ने मोदी के खिलाफ बोला था।

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शत्रुघ्न सिन्हा ने जुलाई महीने में एक ‘फ्रैंक अपोनियन’ में कहा था- ‘मोदी को अगर आगे बढ़ना है तो लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में ही बढ़ना होगा। मोदी देश के लोकप्रिय नेता जरूर हैं पर आडवाणी जी का आशीर्वाद जरूरी है। अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, मुरली मनोहर जोशी, जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा जैसे वरिष्ठ नेताओं के गाइडेंस की जरूरत है।’ यहीं से बात बिगड़ गई। बाद में शत्रुघ्न सिन्हा ने जरूर कहा कि उनके इस बयान का मतलब ‘एंटी-मोदी’ होना नहीं है लेकिन उनकी तमाम सफाई के बाद भी 6 साल में उनके लिए हालात बीजेपी में फिर पहले ही तरह सामान्य नहीं हुए।

शत्रुघ्न सिन्हा की सफाई नहीं आई काम: उस वक्त 2014 में बीजेपी की अध्यक्षता राजनाथ सिंह के हाथ में थी। इसलिए हो सकता है कि शत्रुघ्न सिन्हा को पटना से टिकट मिल गया लेकिन फिर इसके बाद उन्हें कई मौकों पर कोई तवज्जों नहीं मिली।

शत्रुघ्न सिन्हा के दावे पर नहीं बनी बात: जुलाई 2013 में दिए गए बयान के बाद कई बार शत्रुघ्नन सिन्हा ने मोदी की तारीफ की पर मामला ‘बैलेंस’ नहीं हुआ। अप्रैल 2014 में उन्होंने बयान दिया कि मोदी के नेतृत्व में पार्टी 272 से ज्यादा सीटें जीतेगी। शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा कि वे बीजेपी के उन नेताओं में से पहले हैं जिन्होंने कहा था कि मोदी बतौर पीएम बेहतर काम करेंगे। शत्रुघ्न सिन्हा ने यह भी याद दिलाया कि उन्होंने ही पटना की रैली में पहली बार मोदी को “नमो (NaMo)” की संज्ञा दी थी।

मोदी सरकार बनने के बाद क्या हुआ: 2014 में भारी बहुमत के साथ केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी। एनडीए-1 यानी अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में मंत्री रह चुके शत्रुघ्न सिन्हा को मोदी कैबिनेट में कोई स्थान नहीं मिला। इसके बाद कुछ दिन तक तो शत्रुघ्न सिन्हा शांत रहे लेकिन बिहार चुनाव से पहले उन्होंने आवाज उठानी शुरू कर दी थी।

2015 में बिहार में बीजेपी की हार के बाद शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा था: अगर जीत की ताली कप्तान को तो गाली भी कप्तान को। इसके बाद कई मौकों पर उन्होंने कभी मोदी के नेतृत्व की प्रशंसा की पर कई मौकों पर ताने कसे। अपने ट्वीट में तंज कसे और इसी तरह वे धीरे धीरे बीजेपी में होते हुए भी बीजेपी शीर्ष नेतृत्व से दूर हो गए। इस बीच 2015 में ही शत्रुघ्नन सिन्हा के बेटे की शादी भी हुए। पूरा सिन्हा परिवार न्योता देने दिल्ली गया। पीएम मोदी ने मुंबई पहुंच कर शादी समारोह में हिस्सा भी लिया।

दूसरे नेताओं से मिलते-जुलते रहे शत्रुघ्न को बीजेपी ने नहीं दिया भाव: बीते पांच साल में शत्रुघ्न सिन्हा बीजेपी में होकर भी नहीं के बराबर थे। वे एक सांसद थे पर उनकी राय और उनकी पूछ कहीं भी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के लिए जरूरी नहीं थी। इस दौरान पांच साल तक शत्रुघ्न  सिन्हा दूसरी पार्टी के नेताओं से मिलते रहे। कभी नीतीश कुमार से मिले तो कभी जेल जाकर लालू प्रसाद से मुलाकात की। पर पार्टी ने कभी भाव नहीं दिया। वे पार्टी खासकर मोदी नेतृत्व और अमित शाह के पार्टी मैनेजमेंट को लेकर बयान देते रहे पर न तो उन पर एक्शन हुआ और न ही पार्टी ने उनके बयानों पर कभी सफाई दी। बीजेपी में अनुशासन कमेटी के अध्यक्ष रहे गणेशी लाल ने मीडिया से कहा था- उन्हें (शत्रुघ्न सिन्हा) को रिजाइन करने दीजिए और चाहें वे जितना पार्टी को गाली दे सकते हैं। पर पार्टी ने कभी शत्रुघ्न सिन्हा के खिलाफ एक्शन नहीं लिया।

ऐसे लगता है कि कुछ महीने पहले ही शत्रुघ्न सिन्हा को इस बात का अंदाजा हो गया था कि उन्हें पटना से टिकट नहीं मिलेगा, यही कारण है कि उन्होंने एक न्यूज चैनल के प्रोग्राम में कह दिया था कि वे चुनाव तो पटना से ही लड़ेंगे हालात जो कुछ भी हों। सिचुएशन अलग हो सकती है पर लोकेशन वही रहेगी।

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