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सस्ते कर्ज पर खरीद पाएंगे मकान और गाड़ी

आम चुनाव शुरू होने से पहले अर्थव्यवस्था को गति देने की कोशिश के तहत भारतीय रिजर्व बैंक ने गुरुवार को प्रमुख नीतिगत दर रेपो को 0.25 फीसद घटाकर छह फीसद कर दिया।

Author मुंबई | Updated: April 5, 2019 12:11 AM
आम चुनाव शुरू होने से पहले अर्थव्यवस्था को गति देने की कोशिश के तहत भारतीय रिजर्व बैंक ने गुरुवार को प्रमुख नीतिगत दर रेपो को 0.25 फीसद घटाकर छह फीसद कर दिया।

आम चुनाव शुरू होने से पहले अर्थव्यवस्था को गति देने की कोशिश के तहत भारतीय रिजर्व बैंक ने गुरुवार को प्रमुख नीतिगत दर रेपो को 0.25 फीसद घटाकर छह फीसद कर दिया। अपनी रेपो दर में रिजर्व बैंक ने लगातार दूसरी बार कटौती की है। इससे बैंकों के धन की लागत कम होगी और वे भविष्य में अपने ग्राहकों को सस्ता कर्ज दे पाएंगे। आने वाले दिनों में इससे मकान, वाहन और दूसरे कर्ज सस्ते हो सकते हैं। केंद्रीय बैंक ने हालांकि मानसून की स्थिति को लेकर अनिश्चितता के मद्देनजर मौद्रिक नीति रुख को फिलहाल तटस्थ बनाए रखा है। इसके साथ ही केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2019- 20 के लिए आर्थिक वृद्धि का अपना अनुमान भी 7.4 फीसद से घटाकर 7.2 फीसद कर दिया है। रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास की अध्यक्षता में हुई मौद्रिक नीति समिति की दूसरी बैठक में बुधवार को समिति के छह सदस्यों में से चार ने रेपो दर में कटौती के पक्ष में अपना मत दिया जबकि दो ने इसे स्थिर बनाए रखने की राय दी।

केंद्रीय बैंक ने मौद्रिक नीति समिति की तीन दिन चली बैठक के बाद गुरुवार को रेपो दर को तुरंत प्रभाव से 0.25 फीसद घटाकर छह फीसद कर दिया। इससे पहले रिजर्व बैंक ने फरवरी 2019 में हुई समीक्षा में इसे 6.50 से घटाकर 6.25 फीसद किया था। इससे पहले अप्रैल 2018 में रेपो दर छह फीसद पर थी। यानी दूसरी कटौती के बाद रेपो दर एक साल पहले की स्थिति में ही आ गई है।

रेपो दर वह दर होती है जिस पर रिजर्व बैंक दूसरे वाणिज्यिक बैंकों को छोटी अवधि के लिए नकदी उपलब्ध कराता है। इसके साथ ही रिवर्स रेपो दर भी इसी अनुपात में घटकर 5.75 फीसद और बैंकों के लिए सीमांत स्थायी सुविधा और बैंक दर को 6.25 फीसद कर दिया है। चालू वित्त वर्ष की पहली द्वैमासिक मौद्रिक नीति के वक्तव्य में रिजर्व बैंक ने कहा है कि रेपो दर में की गई कटौती मध्यम अवधि के लक्ष्य के अनुरूप की गई है। इस लक्ष्य में मुद्रास्फीति को चार फीसद के दायरे में रखने के साथ-साथ आर्थिक वृद्धि को समर्थन देना है।

मौद्रिक नीति समीक्षा में कहा गया है कि उत्पादन फासला नकारात्मक बना हुआ है और घरेलू अर्थव्यवस्था के समक्ष चुनौती बनी हुई है। खासतौर से वैश्विक मोर्चे पर ये चुनौतियां ज्यादा हैं। निजी निवेश को बढ़ावा देकर घरेलू आर्थिक वृद्धि को मजबूती देने की जरूरत है। निजी निवेश अभी भी धीमी गति पर बना हुआ है। समीक्षा रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले समय में वैकल्पिक कृषि समर्थन योजनाओं, कुछ राज्य सरकारों द्वारा की गई कृषि ऋण माफी घोषणाओं और फसलों के लिए ऊंचा न्यूनतम समर्थन मूल्य और खाद्यान्नों की खरीदारी के साथ ही कम प्रत्यक्ष कर प्राप्ति से सकल राजकोषीय घाटे पर दबाव और बढ़ सकता है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि खुदरा मुद्रास्फीति अपने हाल के निम्न स्तर से ऊपर उठ सकती है। अनुकूल आधार प्रभाव समाप्त होने के बाद यह बढ़ सकती है हालांकि इसके चार फीसद के लक्ष्य से नीचे ही रहने की उम्मीद है। समीक्षा रिपोर्ट में मुद्रास्फीति दायरे के समक्ष मौजूद जोखिम के बारे में भी बताया गया है। कच्चे तेल के ऊंचे दाम, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में उतार चढ़ाव और जल्द नष्ट होने वाले खाद्य पदार्थों के दाम में अचानक गिरावट आना व वित्तीय लक्ष्यों को हासिल करने में पीछे रह जाना जैसी चुनौतियां बरकरार हैं।

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