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छत्तीसगढ़: हवा हो गई रमन सिंह की ‘स्काई’ योजना, स्मार्ट फोन बांटना भी नहीं आया काम

जुलाई महीने में मुख्यमंत्री रमन सिंह ने संचार क्रांति योजना यानी 'स्काई' का उद्घाटन किया। इस योजना के मुताबिक 55 लाख महिलाओं और स्कूल-कॉलेज के स्टूडेंट्स को स्मार्टफोन देने की शुरुआत हुई। माना जा रहा था कि इस योजना से रमन सिंह को लाभ मिल सकता है। लेकिन, नतीजों ने साफ कर दिया है कि मतदाताओं के ऊपर स्मार्टफोन से कोई खास असर नहीं पड़ा।

छत्तीसगढ़ के चुनाव में रमन सिंह की ‘स्काई’ योजना नहीं आई काम. (फोटो सोर्स: एक्सप्रेस आर्काइव)

छत्तीसगढ़ में सीएम रमन सिंह की ‘स्काई’ योजना हवा-हवाई हो गई। चुनावों के नतीजों ने साफ कर दिया कि योजना के तहत मतदाताओं को स्मार्ट फोन बांटना उन्हें जरा भी रास नहीं आया। यह भी साबित हो गया कि प्रदेश में डिजिटल इंडिया से पहले लोगों की जेब और उनका पेट पहले है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को सबसे ज्यादा छत्तीसगढ़ में नुकसान उठाना पड़ा है। 15 सालों से ताकत का प्रतीक रहे बीजेपी के इस दुर्ग को कांग्रेस ने अपने प्रचंड बहुमत से ढहा दिया है। बीजेपी ने चुनाव से पहले ही मतदाताओं को लुभाने की तमाम कोशिशें आजमानी शुरू कर दी थीं। चुनाव से ऐन पहले सीएम रमन सिंह ने 50 लाख लोगों को मोबाइल फोन बांटने की योजना का शुभारंभ किया था।

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जुलाई महीने में मुख्यमंत्री रमन सिंह ने संचार क्रांति योजना यानी ‘स्काई’ का उद्घाटन किया। इस योजना के मुताबिक 55 लाख महिलाओं और स्कूल-कॉलेज के स्टूडेंट्स को स्मार्टफोन देने की शुरुआत हुई। माना जा रहा था कि इस योजना से रमन सिंह को लाभ मिल सकता है। लेकिन, नतीजों ने साफ कर दिया है कि मतदाताओं के ऊपर स्मार्टफोन से कोई खास असर नहीं पड़ा।

दरअसल, मीडिया रिपोर्ट्स में उस दौरान इस योजना को लेकर कई खबरें छपीं। तभी यह संकेत दिए जा चुके थे कि स्मार्टफोन बांटने की योजना सफल नहीं हो सकती। क्योंकि, प्रदेश के अधिकांश क्षेत्रों में मोबाइल टावर ही नहीं है। गांव-देहात में लोगों को आपात स्थिति में बात करने के लिए पेड़ों पर चढ़ना पड़ता है या फिर दूर किसी टावर की खोज में निकलना पड़ता है। ऐसे में मुफ्त में मिला मोबाइल फोन अधिकांश के लिए बेकार ही रहा।

जबकि, दूसरी तरफ कांग्रेस ने जमीन पर लोगों की नब्ज पकड़ी। कांग्रेस ने अपने घोषणा-पत्र में किसानों की लोन माफी, तेंदू पत्ता और धान की ज्यादा कीमत का वादा किया। यहां तक कि प्रेस-कॉऩ्फ्रेंस के जरिए पार्टी के नेता अपनी घोषणा के संदर्भ में गंगा-जल लेकर कसम खाते दिखाई दिए। अधिकांश मीडिया रिपोर्ट्स में यह सामने आया कि चुनाव के दौरान किसानों ने अपने धान बेचने बंद कर दिए थे और चुनाव के नतीजों का इंतजार कर रहे थे।

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