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सास बोली बहू से- स्कूलों के बाहर तक शराब की दुकानें पहुंच गई हैं, उतर मैदान में

अब सास भी समझने लगी हैं कि इस देश और भारतीय संस्कारों को बचाने के लिए गृहिणी की भूमिका से बढक़र कुछ करना होगा। एक सास ने बहू को चुनाव लडऩे की अनुमति देते हुए कहा कि अब मां को आगे आना होगा, यदि मां बच्चों को संस्कारित कर सकती है तो देश को भी लाइन पर ला सकती है।

Author उदयपुर | November 26, 2018 5:50 PM
राजस्थान- सास भगवत कुंवर के साथ बहू डिम्पल कुंवर

अब वह दिन नहीं रहे जब बहू का ड्योढ़ी लांघना प्रतिबंधित माना जाता था। बहुएं पढ़ी-लिखी हुई हैं, तो सास भी समझदार हुई हैं। शायद यही वजह है कि एक सास ने दिलेरी दिखाई और अपनी बहू को चुनाव मैदान में उतरने के लिए सिर्फ अनुमति ही नहीं दी, बल्कि ऐसी बात कही कि बहू भी सास की कायल हो गई।

जी हां, यह सास हैं उदयपुर के गुलाबबाग मार्ग निवासी श्रीमती भगवत कुंवर। उस जमाने में छठी कक्षा तक पढ़ीं श्रीमती भगवत कुंवर ने अपनी बहू श्रीमती डिम्पल कुंवर को शिवसेना के टिकट से चुनाव मैदान में उतरने का आशीर्वाद दिया है। जब एमए-बीएड डिम्पल कुंवर को टिकट देने की बात आई तब सबसे पहले डिम्पल ने अपनी सास से अनुमति चाही, उस वक्त सास ने जो कहा उसे आप भी जानेंगे तो दंग रह जाएंगे। उन्होंने कहा कि, आज बच्चों के स्कूल के पास तक शराब की दुकानें आ पहुंची हैं, इसके लिए अब मां को मैदान में उतरना ही होगा।

अब आप ही सोचिये, यह सुनने के बाद कोई बहू अपनी सास की कायल क्यों नहीं होगी, क्योंकि यह उस परिवार में बात हो रही है जिस समाज में आज भी कम ही महिलाएं घूंघट से बाहर आकर जनता की सेवा में कदम रखती हैं।

खुद डिम्पल कुंवर बोलती हैं कि, आज भी उनके समाज की सामान्य तौर पर यह सोच नहीं है कि बहुएं राष्ट्रीय व वैश्विक विषयों पर चर्चा करें। उन्होंने अपनी सास से चर्चा की तब उनका विचार सुन उनमें नई ऊर्जा का संचार हुआ। डिम्पल कुंवर ने बताया कि संस्कारों से जुड़ी इस बात के साथ कन्या भ्रूण हत्या का दर्द भी उनमें और सास में एक सा है। डिम्पल कहती हैं कि कन्या भ्रूण हत्या के लिए खुद मां को ही जागरूक होना होगा। मां को ही अपनी कोख में पल रही बेटी को बचाना होगा। समाज में बेटियों की जरूरत भी उतनी ही है, जितनी बेटों की।

सास और बहू के साथ जब डिम्पल की परिचित महिलाएं, युवतियां प्रचार के लिए निकल रही हैं तो उनका मिलना गृहिणियों से ज्यादा होता है। जब वे घर के मुद्दों पर उनसे बात करती हैं तो महिलाएं शराब, नशा, कन्या भ्रूण के साथ बच्चों की फीस, निजी स्कूलों की मनमानी आदि व्यावहारिक परेशानियों की चर्चा करती हैं। डिम्पल का कहना है कि एक गृहिणी के रूप में सुबह से शाम तक जो व्यावहारिक समस्याएं वह खुद महसूस कर रही हैं, उनके लिए सरकार नीतिगत समाधान करेगी तभी गृहिणियों को सुकून मिलेगा। इसी बात को लेकर उन्होंने इन सभी मुद्दों को उठाया है और इन मुद्दों पर गृहिणियों का उन्हें समर्थन भी मिल रहा है।

डिम्पल कहती हैं कि परिणाम चाहे कुछ भी हो, लेकिन एक दादी और एक मां की आवाज जनता की आवाज जरूर बनेगी और स्कूल-मंदिर के पास मर्यादा और संस्कारों की महक फिर स्थापित हो सकेगी। सासू मां भगवत कुंवर कहती हैं कि किसी से डरने और घबराने की जरूरत नहीं है, वे हर वक्त अपनी बहू के साथ खड़ी हैं।

सामाजिक दृष्टि से देखा जाए तो हम यह कह सकते हैं कि आजादी के इतने सालों में अब सासू की भी वह पीढ़ी आ गई है जो पढ़ी-लिखी बहू से सास बनी है। ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’, यह उक्ति अब कई मायनों में चरितार्थ होने लगी है। आज की सास उन बातों से अपनी बहुओं को बचाना चाहती हैं, जो कभी बहू रहते हुए उन्हें भी खलती थीं। हां, आंख की शर्म, बहू की लज्जा, बड़ों का आदर-सत्कार को वे जरूरी मानती हैं क्योंकि यह भारतीय संस्कृति की आत्मा है। (सौजन्य: स्टोरी एवं फोटो- सुनीता माहेश्वरी)

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