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दिल्ली में सिमटती आप की राजनीति

लोकसभा चुनाव 2014 में दिल्ली की सभी सात सीटों पर आप को हार का सामना करना पड़ा था। हालांकि, इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में आप ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 67 सीट जीती थीं। आज 2019 में आप की जंग सिर्फ दिल्ली तक सिमट गई है।

Author May 9, 2019 2:34 AM
दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल। (file pic)

मृणाल वल्लरी

2014 में हुआ 16वां लोकसभा चुनाव। कई जगह दीवारों और रिक्शों पर आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल को प्रधानमंत्री के चेहरे के तौर पर देखा जा रहा था। राष्ट्रीय दल उनकी छवि से प्रभावित थे। अभी तक नहीं बन पाया वाला तीसरा मोर्चा एक बार फिर से अपना ढांचा बनाने की सोचने लगा था। वाम की राजनीति करने वाले भी इस ‘आम’ पर फिदा थे और अपने हिस्से के संघर्ष का वोट आप के सावधि खाते में जमा करवाने की अपील कर रहे थे। सबसे बड़ा दांव था वाराणसी में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के सामने अरविंद केजरीवाल का पर्चा भरना।

यूपीए के लगातार दो बार के शासन के बाद जनता बदलाव चाह रही थी। महंगाई और भ्रष्टाचार के आरोपों ने कांग्रेस की साख गिरा दी थी। लड़ाई में भाजपा थी और उसका चमकता चेहरा नरेंद्र मोदी। भाजपा और कांग्रेस के विकल्प की बात हुई और उसकी जगह पर आने का दावा किया आप ने। 2014 में आप ने लोकसभा की 543 सीटों में से 350 से ज्यादा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का एलान किया था। आप का दावा था कि 162 सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं, और उसकी लड़ाई मुख्यत: इन्हीं सीटों पर होगी। पार्टी ने उन 15 केंद्रीय मंत्रियों के खिलाफ भी चुनाव लड़ने का एलान किया था जिन पर भ्रष्टाचार के मुकदमे दर्ज हैं। उस वक्त ए राजा का नाम सबसे ज्यादा सुर्खियों में था। टूजी और कोयला खदान आबंटन घोटाला मामले को लेकर केजरीवाल केंद्र के मंत्रियों पर हमलावर थे।

2014 में पार्टी की नजर हरियाणा, गुजरात, उत्तर प्रदेश सहित शहरी क्षेत्रों में थी। लेकिन पार्टी के सभी प्रमुख नेता चुनाव हार गए। हां, आश्चर्यजनक तौर पर पंजाब में आप ने जीत पाई थी। पंजाब में चार सीटों-पटियाला, संगरूर, फरीदकोट और फतेहगढ़ साहिब सीटें आप को मिली। पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ रही आप को देश भर से दो फीसद यानी एक करोड़ से ज्यादा वोट मिले। यह दिल्ली में उन्हें मिले वोटों से करीब पांच गुना ज्यादा है। लोकसभा चुनाव में फजीहत के बाद 2019 के पहले हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में आप ने सिर्फ पंजाब और गोवा में ही अपनी जंग को बरकरार रखा। लेकिन वहां भी वह विकल्प का चेहरा बनने में नाकाम रही। 2014 में उत्तर प्रदेश में आप 77 सीटों पर लड़ी थी। लेकिन एक भी सीट उसे नहीं मिली। उन दिनों पार्टी के ब्रैंड अंबेसडर बने कुमार विश्वास को अमेठी से 25 हजार वोट मिले थे। इन नतीजों का असर यह रहा था कि प्रधानमंत्री पद की दावेदारी करने वाले केजरीवाल ने उत्तर प्रदेश का मोह छोड़ दिया और सूबे के विधानसभा चुनाव से दूरी बनाए रखी।

2019 में सहारनपुर, गौतमबुद्धनगर, अलीगढ़, लालगंज, प्रयागराज और कानपुर देहात की सीटों पर आप ने उम्मीदवार उतारे हैं। उत्तर प्रदेश में आज आप कितनी जुझारू है इसका अंदाजा इसी से लगता है कि उसके गौतबुद्धनगर और कानपुर देहात के उम्मीदवार का पर्चा खारिज हो जाता है। इन सीटों पर अब यह गठबंधन को समर्थन दे रही है। आंदोलन के बाद एक राजनीतिक पार्टी के रूप में आप उम्मीदों पर खड़ी नहीं उतर पाई। समाजसेवा, कला और अन्य क्षेत्रों के नामचीन लोग जैसे एक आंधी की तरह पार्टी से जुड़े थे। विफलता का तूफान आते ही अपने-अपने खेमे में लौट गए। प्रशांत भूषण, शांति भूषण, योगेंद्र यादव जैसे चेहरों ने बहुत जल्दी ही केजरीवाल के तानाशाही रुख के कारण पार्टी छोड़नी पड़ी।

लोकसभा चुनाव 2014 में दिल्ली की सभी सात सीटों पर आप को हार का सामना करना पड़ा था। हालांकि, इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में आप ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 67 सीट जीती थीं। आज 2019 में आप की जंग सिर्फ दिल्ली तक सिमट गई है। कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर दिल्ली के मंच पर जितना बड़ा प्रहसन खेला गया, उससे साफ है कि वह अपने प्रदर्शन को लेकर डरी हुई है। दिल्ली के लिए चुनावी घोषणापत्र में जब पार्टी यह वादा करती है कि यहां के शिक्षा और नौकरियों में 86 फीसद आरक्षण सिर्फ मूल दिल्लीवालों का होगा तो समझा जा सकता है कि अब उसकी जंग देश से सिकुड़ कर दिल्ली तक सिमट गई है।

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