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सवर्ण आरक्षण: लोकसभा में बहस ने दिया कई अटकलों को जन्म

केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले ने भी इस तरफ इशारा करते हुए मांग की कि SECC डेटा को जल्द सार्वजनिक किया जाना चाहिए क्योंकि यह OBC जनसंख्या पर वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करता है।

Author January 9, 2019 3:51 PM
2011 से पहले साल 1931 में जाति आधारित जनगणना हुई थी। इसी के आधार पर साल 1980 में मंडल कमीशन ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी।

लोकसभा ने मंगलवार (08 जनवरी) को दो तिहाई बहुमत के साथ 124वें संविधान संशोधन बिल पारित कर दिया है, जिसके आधार पर अगड़ी जाति के गरीब लोगों (आर्थिक पिछड़ों) को 10 फीसदी आरक्षण देने का प्रावधान किया गया है। सपा, बसपा, कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने इस बिल का समर्थन किया मगर दूसरी तरफ अब आवाज उठने लगी है कि साल 2011 में किए गए सामाजिक-आर्थिक जातीय जनगणना (SECC) के आंकड़ों (ओबीसी के आंकड़ों) को सार्वजनिक कर ओबीसी आरक्षण का भी दायरा बढ़ाया जाय। दूसरी तरफ कई ओबीसी नेता इस बात की मांग कर चुके हैं कि ओबीसी में अति पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण में बंटवारा किया जाय। केंद्रीय मंत्री और दलित नेता रामविलास पासवान लोकसभा में बिल पर चर्चा के दौरान और पहले भी कई मौकों पर निजी क्षेत्र की नौकरियों में भी आरक्षण की मांग करते रहे हैं। उधर, सपा के धर्मेंद्र यादव ने आबादी के आधार पर आरक्षण की मांग की।

ऐसे में अटकलें लगाई जा रही हैं कि मोदी सरकार आगामी दिनों में कुछ और फैसले लेकर सरप्राइज दे सकती है। सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण देने का फैसला भी मोदी कैबिनेट ने अचानक लिया था। हालात ऐसे थे कि संबंधित मंत्री को भी एक दिन पहले पता चला और एक दिन के अंदर विधेयक संसद में पेश करना पड़ा। इससे पहले मोदी ने नोटबंदी का फैसला भी अचानक किया था और देश समेत पूरी दुनिया को आश्चर्यचकित कर दिया था। लिहाजा, उम्मीद जताई जा रही है कि पीएम मोदी ओबीसी वर्ग को ध्यान में रखते हुए भी चुनावी तुष्टिकरण के लिहाज से कोई सरप्राइज दे सकते हैं।

केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले ने भी इस तरफ इशारा करते हुए मांग की कि SECC डेटा को जल्द सार्वजनिक किया जाना चाहिए क्योंकि यह OBC जनसंख्या पर वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करता है। मंगलवार को उन्होंने कहा, “यह सच नहीं है कि अगर जातीय जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक होते हैं तो जातिवाद बढ़ेगा।” उन्होंने कहा कि जातीय जनगणना आवश्यक है ताकि ओबीसी को दिए गए आरक्षण को उसी के अनुसार बढ़ाया जा सके। बता दें कि 2011 की जातीय जनगणना का डेटा जारी करने को लेकर कई राजनीतिक दल लंबे अर्से से मांग करते रहे हैं। सरकार वैसे एससी/एसटी के जातीय आंकड़ों को तो सार्वजनिक कर चुकी है लेकिन ओबीसी के आंकड़े अब तक सार्वजनिक नहीं हुए हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, एससी और एसटी की जनसंख्या क्रमशः 16.6 और 8.6 फीसदी है। हालांकि, ओबीसी के आंकड़ों पर अभी तक स्थिति स्पष्ट नहीं है।

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माना जा रहा है कि इन आंकड़ों के जारी होने से ओबीसी रिजर्वेशन की सीमा बढ़ाने की भी मांग उठ सकती है क्योंकि एससी और एसटी वर्ग को उनकी आबादी के हिसाब से आरक्षण दिया गया है। इधर, केंद्र सरकार ने ओबीसी में उप-वर्गीकरण के लिए जस्टिस रोहिणी आयोग का गठन 2017 में किया था। आयोग को यह देखना है कि ओबीसी के अंदर केंद्रीय सूची मे शामिल जातियों को क्या उनकी संख्या के अनुरूप सही मात्रा में आरक्षण का लाभ मिल रहा है? अगर नहीं तो इनका वर्गीकरण कैसे किया जा सकता है?

बता दें कि 2011 से पहले साल 1931 में इस तरह की जनगणना हुई थी। इसी के आधार पर साल 1980 में मंडल कमीशन ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। 1931 की जनगणना के आधार पर ओबीसी की आबादी तब 52 फीसदी थी। हालांकि, 2006 का नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन डेटा ओबीसी की आबादी 41 फीसदी बताता है, लेकिन यह केवल सैंपल डेटा पर आधारित अनुमान था। इसके बाद ओबीसी नेताओं खासकर मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव के अनुरोध पर तत्कालीन यूपीए-दो की मनमोहन सिंह सरकार ने 2011 के जनगणना में सामाजिक-आर्थिक जातीय जनगणना भी कराने का फैसला किया था। उस वक्त भाजपा ने भी सपा और राजद की मांग का समर्थन किया था। यह गणना साल 2015 में पूरी हुई थी।

केंद्र की एनडीए सरकार ने इस जनगणना से जुड़े ग्रामीण और शहरी आंकड़ों को जुलाई 2015 में जारी किया था। यहां तक कि मोदी सरकार ने उन आंकड़ों के आधार पर ग्रामीण क्षेत्र के लिए कई योजनाएं चलाईं। शहरी डेटा का उपयोग करते हुए भी मोदी सरकार ने पिछले साल आयुष्मान भारत योजना के लिए लाभार्थियों की पहचान की लेकिन जाति पर आधारित डेटा, जिसमें सैकड़ों ओबीसी जातियां शामिल हैं, उसे सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा सार्वजनिक नहीं किया गया है। अब चुनावी मौसम में जब सहयोगी दलों के कई ओबीसी नेता भाजपा से ओबीसी आरक्षण में बंटवारे की मांग कर रहे हैं, तब माना जा रहा है कि मोदी सरकार सवर्ण आरक्षण की तरह इसे भी अचानक लागू कर सकती है। हालांकि, रोहिणी आयोग ने अभी तक रिपोर्ट नहीं सौंपी है लेकिन यूपी में इसी तरह के एक आयोग ने अपनी सिफारिशें सौंपी हैं। इसलिए सबसे बड़े राज्य में जहां ओबीसी रिजर्वेशन के बंटवारे को लेकर सबसे ज्यादा हलचल है, वहां भाजपा इसे तुरूप के पत्ते की तरह इस्तेमाल कर सकती है। सपा-बसपा के गठबंधन से भाजपा को यहां पहले से ही चुनौती मिल रही है।

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