ताज़ा खबर
 

Lok Sabha Election 2019: मोदी राज में ठंडा रहा बाजार का प्रदर्शन, नोटबंदी और GST से मार्केट को नहीं मिल पाया वाजिब मुनाफा

Electopn 2019: बीते पांच सालों में बाजार के सूचकांक का औसत मनमोहन सिंह के कार्यकाल से भी कम है। वहीं, जानकारों का मानना है कि मार्केट रिटर्न में कमी के पीछे बड़ी वजह जीएसटी और नोटबंदी जैसे कदम रहे हैं।

रिपोर्ट बताते हैं कि बाजार को मोदी सरकार से जो उम्मीदें थीं, वो पूरी नहीं हो पाईं। (फाइल फोटो सोर्स: द इंडियन एक्सप्रेस)

2019 लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र केंद्र सरकार समेत सभी पार्टियां प्रचार में अपनी-अपनी ताकत झोंक रही हैं। सरकार भी विकास के संबंध में अपनी पीठ थपथपा रही है। लेकिन, प्रचार से हटकर अगर आंकड़ों के हिसाब से आर्थिक मोर्चे पर सरकार के कार्यों की विवेचना करें तो तथ्य कुछ अलग नज़र आते हैं। 2014 लोकसभा चुनाव के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए ने प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाई। उस दौरान बाजार को मोदी सरकार से काफी उम्मीदें थीं। एक प्रकार से टिकाऊ सरकार बनने से बाजार के सूंचकांक में काफी तेजी भी देखी गई। तब कारोबारी जगत को लगा कि मजबूत सरकार उनके पक्ष में योजनाओं का सूत्रपात करेगी। लेकिन, पिछले पांच सालों में बाजार की यह उम्मीद परवान नहीं चढ़ पाई। मई, 2014 के बाद से अब तक सूचकांक में सिर्फ 53 फीसदी का इजाफा पाया। बिजनस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक एनडीए के कार्यकाल में इक्विटी के मामले में सालाना रिटर्न 9.2 फीसदी रहा, जो औसत से 10से 14 फीसदी कम है।

रिपोर्ट के मुताबिक मोदी सरकार की यह परफॉर्मेंस मनमोहन सिंह के कार्यकाल वाली यूपीए-1 और यूपीए-2 की सरकार से भी कमतर है। यूपीए-1 (2004-09) के 5 साल के कार्यकाल के दौरान सूचकांक से सालाना 22.6 फीसदी का रिर्टन मिला, वहीं यूपीए-2 (2009-14) के दौरान यह आंकड़ा 12.4 फीसदी था। नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में उम्मीद के मुताबिक निवेशकों के भीतर भी कोई खास उत्साह नहीं देखने को मिला। वैश्विक आर्थिक शक्तियों से इस ग्रोथ का तुलनात्मक अध्ययन करें तो भारत फिलहाल अमेरिका, चीन और ब्राजील से पीछे है।

बीते पांच सालों में नोटबंदी और गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) जैसे कदमों की वजह से कॉरपोरेट सेक्टर की कमाई भी उम्मीद से काफी कम रही। हालांकि, आर्थिक जानकारों का मानना है कि सरकार के द्वारा इस दिशा में उठाए गए सुधारवादी कदम का रिजल्ट आगामी सालों में दिखाई देगा। अर्थव्यवस्था में जो खामियां थीं, फिलहाल वर्तमान सरकार ने उन्हें दूर करने की कोशिश की है। ऐसे में इस दौरान ग्रोथ रेट में कमी दिखाई दे रही है, लेकिन आगे के लिए बाजार और समूची भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका बेहतर असर पड़ने वाला है। बिजनस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट में इकोनॉमिक्स रिसर्च एडवाइजरी के संस्थापक जी चोकलिंगम ने कहा,”जिस तरह का बहुमत एनडीए की सरकार को मिला, उससे देश में एक राजनीतिक स्थिरता कायम हुई। इस हालात ने बाजार को भी आत्मविश्वास से भर दिया। जीएसटी, नोटबंदी, बैंकरप्सी कोड और इंश्योरेंस जगत के क्षेत्र में उठाए गए सुधारात्मक कदमों का बाजार ने भी स्वागत किया। लेकिन, यदि कमाई के मामले में कुछ और सुधार हुए होते तो मार्केट रिटर्न की गुंजाइश काफी अधिक होती।”

हालांकि, मोदी के इन पांच सालों की तुलना को लेकर आर्थिक जगत भी दो नैरेटिव रखे हुए है। एक के मुताबिक भारतीय अर्थव्यवस्था की तकदीर नोटबंदी और जीएसटी जैसे कदमों से खराब हुई है, जबकि दूसरे ने इसे सुधारवादी कदम बताया है।  इनका मानना है कि 1991 की तरह ही बीते पांच सालों में अर्थव्यवस्था के भीतर ढांचागत बदलाव किए गए हैं। आर्थिक जानकारों का मानना है कि अर्थव्यवस्था के मामले में मोदी सरकार के पांच सालों की विवेचना 2008 के बाद वैश्विक स्तर बदले आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 Lok Sabha Election 2019: धर्मेंद्र, हेमा मालिनी के बाद सनी देओल को भी भाजपा से चुनाव लड़ाने की चर्चा
2 Lok Sabha Election 2019: पार्टी बदलने वालों पर नितिन गडकरी का तंज- जब दिल चाहे, नई दुनिया बसा लेते हैं लोग
3 Lok Sabha Election 2019: नरेन्द्र मोदी की बायोपिक मेकर्स को EC का नोटिस, 30 मार्च तक मांगा जवाब
यह पढ़ा क्या?
X