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किसका साथ देंगे जंगलमहल के लोग

पिछली बार तमाम सीटों पर उनके उम्मीदवार जीत गए थे। लेकिन पांच साल के दौरान कुछ सांसदों के खिलाफ इलाके में नाराजगी है तो एक को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निकाला जा चुका है।

ममता बनर्जी ( फोटो सोर्स : इंडियन एक्सप्रेस )

पश्चिम बंगाल में 23 सीटें जीतने के लक्ष्य के साथ मैदान में उतरी भाजपा की निगाहें जंगलमहल पर टिकी हैं। जंगलमहल यानी झारखंड से लगे पश्चिम मेदिनीपुर, बांकुड़ा और पुरुलिया। राज्य में माओवादी गतिविधियों के दौर में इन तीनों जिलों को जंगलमहल कहा जाता था। अब माओवादी गतिविधियां तो खत्म हो चुकी हैं लेकिन इन जिलों के नाम के साथ जुड़ा यह विश्लेषण जस का तस है। छठे दौर में चार जिलों की जिन आठ सीटों पर मतदान होना है उनमें से छह जंगलमहल इलाके में ही हैं। पिछली बार तमाम सीटें तृणमूल कांग्रेस ने जीती थीं। इलाके की इन छह सीटों में से तीन पर आदिवासी वोट ही निर्णायक हैं।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी लगातार इलाके का दौरा करती रही हैं। उन्होंने आदिवासी इलाकों के विकास के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। इसके अलावा सबूज साथी योजना के तहत हजारों छात्र-छात्राओं को साइकिलें बांटी गई हैं।

ममता इलाके में माओवाद की समस्या खत्म कर विकास की शुरुआत करने का दावा करती रही हैं। इसी आधार पर पिछली बार तमाम सीटों पर उनके उम्मीदवार जीत गए थे। लेकिन पांच साल के दौरान कुछ सांसदों के खिलाफ इलाके में नाराजगी है तो एक को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निकाला जा चुका है। ऐसे में यह चुनाव ममता सरकार के कामकाज की कसौटी भी है। दूसरी ओर, भाजपा बीते कुछ समय से लगातार इन आदिवासियों के बीच पैठ बनाने का प्रयास कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के अलावा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक इस इलाके में रैलियां कर चुके हैं।

पार्टी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बढ़ती सक्रियता पर सवार होकर इस आदिवासी इलाके में अपनी जीत का परचम फहराना चाहती है। बीते साल पंचायत चुनावों में इलाके में मिली कामयाबी से पार्टी के हौसले बुलंद हैं। उसे भरोसा है कि पंचायत चुनावों की तरह लोकसभा चुनावों में भी इलाके के आदिवासी तमाम सीटें उसकी झोली में डाल देंगे। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष भी छठे चरण में मेदिनीपुर सीट से अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। उन्होंने इसी जिले की खड़गपुर विधानसभा सीट से जीत दर्ज की थी। घोष को अबकी अपनी जीत का पूरा भरोसा है। लेकिन यहां उनका मुकाबला तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य मानस भुइयां से हैं।

भुइयां कांग्रेस के टिकट पर लंबे अरसे तक इसी जिले से विधायक रहे हैं। बीते साल तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने के बाद उनको राज्यसभा का सदस्य बनाया गया था। लेकिन ममता बनर्जी ने दिलीप घोष के टक्कर में उनको मैदान में उतार दिया है। इससे घोष की राह पथरीली हो गई है। इस चरण में बांकुड़ा की सीट भी है। भाकपा नेता बासुदेव आचार्य वर्ष 19080 से 2009 तक लगातार यहां जीते थे। लेकिन वर्ष 2014 में अभिनेत्री मुनमुन सेन ने उनको लगभग एक लाख वोटों से हरा कर सबको हैरत में डाल दिया था। लेकिन इलाके के लोगों और तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय नेताओं में मुनमुन के खिलाफ भारी नाराजगी को ध्यान में रखते हुए ममता ने अबकी राज्य के वरिष्ठ नेता और पंचायत मंत्री सुब्रत मुखर्जी को यहां उम्मीदवार बनाया है। मुनमुन को आसनसोल भेजा गया था। भाजपा ने इस सीट पर डॉ सुभाष सरकार को मैदान में उतारा है।

भाजपा को आदिवासी बहुल पुरुलिया संसदीय सीट से भी काफी उम्मीदें हैं। बीते साल हुए पंचायत चुनावों में उसने जिले में 33 फीसद सीटें जीती थीं। तृणमूल कांग्रेस के मृगांक महतो ने पिछली बार फारवर्ड ब्लाक के बीर सिंह महतो से यह सीट छीन ली थी। अबकी मृगांक ही मैदान में हैं। यह इलाका कुछ साल पहले तक फारवर्ड ब्लाक का गढ़ माना जाता था। भाजपा ने यहां पिछले उम्मीदवार को बदलते हुए ज्योतिर्मय महतो को मैदान में उतारा है। कांग्रेस के नेपाल महतो भी यहां किस्मत आजमा रहे हैं।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि ममता ने पांच साल के दौरान इलाके में विकास की कई योजनाएं शुरू जरूर की हैं। लेकिन जमीनी स्तर पर उनका कितना फायदा पहुंचा है, यह कहना मुश्किल है। कुछ इलाकों में विकास की रोशनी अब तक नहीं पहुंच सकी है। बेरोजगारी जैसे मुद्दे अब भी मुंह बाए खड़े हैं। भाजपा इन मुद्दों के सहारे ही इलाके में पैठ बना कर कामयाबी हासिल करना चाहती है। दोनों दलों की जोर-आजमाइश की वजह से यह दौर दिलचस्प हो गया है।

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