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यादव सिंह प्रकरण निभाएगा चुनाव बाद समीकरणों में अहम भूमिका

सूत्रों के मुताबिक यादव सिंह से जुड़ी एक कंपनी में प्रोफेसर रामगोपाल के बेटे अक्षय और बहू ने हिस्सेदारी खरीदी थी।

Author नोएडा | January 17, 2017 3:15 PM
अगस्त 2015 को सीबीआई ने 954.38 करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार के संबंध में यादव सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के आगाज से ठीक पहले यादव सिंह मामले में अचानक प्रवर्तन निदेशालय की जांच में तेजी से नए राजनीतिक समीकरणों के उदय के आसार बने हैं। हाल ही में सपा मुखिया मुलायम सिंह ने यादव सिंह मामले पर प्रोफेसर रामगोपाल यादव पर सार्वजनिक टिप्पणी कर सभी को चौंका दिया था। इसके साथ ही मायावती के भाई आनंद की करीब 1300 करोड़ रुपए की संपत्ति भी केंद्रीय जांच एजंसियों के निशाने पर है। राजनीतिक जानकार इन दोनों मामलों का केंद्रबिंदु यादव सिंह को मान रहे हैं। माना जा रहा है कि यादव सिंह मामला उत्तर प्रदेश चुनाव के बाद राजनीतिक समीकरणों को साधने का आधार साबित हो सकता है।

बताते चलें कि यादव सिंह मामले पर भाजपा सांसद किरीट सोमैया ने कई साल पहले यादव सिंह की अकूत संपत्ति और फर्जी कंपनियों के नाम पर घोटालों के दस्तावेजों के साक्ष्य भी मुहैया कराए थे। इसमें बताया गया कि कैसे महज कुछ लाख की पूंजी से शुरू हुई कंपनियां कुछ ही महीनों और साल में करोड़ों रुपए का मुनाफा दिखाकर कालेधन को सफेद कर रही हैं। ज्यादातर ऐसी कंपनियों के नाम, पते भी फर्जी दिखाए गए थे।

नोएडा समेत ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेस वे प्राधिकरण मुख्य अभियंता यादव सिंह की गिरफ्तारी के करीब 11 महीने बाद अचानक यादव सिंह मामले में तेजी आ गई है। दिसंबर 2016 में यादव सिंह की पत्नी कुसुमलता और ठेकेदार पंकज जैन की आंशिक संपत्ति कुर्क की गई थी। नोएडा प्राधिकरण में 954 करोड़ रुपए के भूमिगत बिजली केबल घोटाले की जांच से पकड़ में आए यादव सिंह 2007-12 के बीच तत्कालीन मायावती सरकार में नोएडा के सबसे ताकतवर अफसर रहे थे। यादव सिंह पर चहेते ठेकेदारों को करोड़ों-अरबों रुपए के ठेके देने के अलावा किसानों के भूखंडों में भी अरबों के फर्जीवाड़े के आरोप लगे थे।

नोएडा में 1980 में जूनियर इंजीनियर से मुख्य अभियंता तक के सफर में बसपा सरकार की नजदीकी का खामियाजा 2012 में सपा सरकार आने के बाद ही यादव सिंह को झेलना पड़ा था। उत्तर प्रदेश में सपा सरकार बनने के बाद तत्कालीन चेयरमैन राकेश बहादुर और सीईओ संजीव सरन ने यादव सिंह के खिलाफ थाना सेक्टर- 20 में मामला दर्ज कराया था। सीबीसीआइडी की जांच में यादव सिंह दोषी साबित नहीं हुए। उसके बाद बसपा सरकार के सबसे नजदीकी रहे अफसर की पुन: नोएडा के मुख्य अभियंता के रूप में तैनात किए जाने पर सपा समर्थकों ने खासी नाराजगी जताई थी। इस नाराजगी को दरकिनार करते हुए कुछ ही महीनों बाद यादव सिंह को ना केवल नोएडा बल्कि ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेस वे प्राधिकरण के इंजीनियरिंग प्रभारी बना दिया गया था।

माना जा रहा है कि यादव सिंह को सपा सरकार में स्थापित करने में प्रोफेसर रामगोपाल यादव की भूमिका रही थी। सूत्रों के मुताबिक यादव सिंह से जुड़ी एक कंपनी में प्रोफेसर रामगोपाल के बेटे अक्षय और बहू ने हिस्सेदारी खरीदी थी। यादव सिंह की पत्नी कुसुमलता 2013 तक इस कंपनी की निदेशक रही थीं। गत दिनों मुलायम सिंह यादव ने प्रोफेसर रामगोपाल के बेटे-बहू को लेकर सार्वजनिक टिप्पणी इसी प्रकरण को लेकर की थी।

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