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बंद पड़ी मिलें इस बार चुनावी मुद्दा नहीं

कानपुर में उद्योगों की शुरुआत अंग्रेजों के समय हुई और देश की आजादी तक कानपुर ने भारत ही नहीं विश्व में औद्योगिक नगरी के रूप में अपनी पहचान बना ली।

Author April 24, 2019 2:23 AM
पीएम मोदी और कानपुर से सांसद मुरली मनोहर जोशी

औद्योगिक नगरी कानपुर की मिलों को चालू करने के लिए 1990 के बाद हर लोकसभा चुनाव में राजनीतिक दलों ने बड़े-बड़े वादे किए लेकिन मिलों की चिमनियों से आज तक धुआं नहीं निकल सका। इस बार लोकसभा चुनाव में तो उम्मीदवारों ने मिलों के चालू करने पर चुप्पी ही साध ली है। कोई भी उम्मीदवार अब इसे मुद्दा नहीं बना रहा है। कानपुर में उद्योगों की शुरुआत अंग्रेजों के समय हुई और देश की आजादी तक कानपुर ने भारत ही नहीं विश्व में औद्योगिक नगरी के रूप में अपनी पहचान बना ली।

यह सिलसिला आजादी के बाद 1990 तक चलता रहा और दूर दराज के लोगों को रोजगार का कानपुर माध्यम बन गया था। इसके बाद 1995 आते-आते मिलें बंद होती गईं। हालांकि लाल इमली चलती रही पर आज उसकी भी स्थिति दयनीय हो चुकी है और इन दिनों बंदी पर है। इसके साथ ही वेतन न मिलने से कर्मचारियों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कानपुर की बीआइसी व एनटीसी की बंद मिलें तो तीन दशकों से विभिन्न सियासी दलों के लिए वोट बटोरने का जरिया बनी रही थीं लेकिन चुनाव बाद किसी दल या नेता ने इन्हें बदहाली से उबारने की कोशिश तक नहीं की।

सबने किया केवल वादा

इन मिलों में फिर से धुआं उगलने की आस 1996 में बंधी थी। यहां पर भाजपा को सत्ता में लाने को प्रयासरत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने फूलबाग मैदान की चुनावी सभा में कहा था कि अगर भाजपा सरकार में आई तो कानपुर की बंद मिलों में से कम से कम एक को तत्काल चालू करा दिया जाएगा। इसके बाद वर्ष 1998, 1999, 2004, 2009 और 2014 यानी बारहवीं लोकसभा से लेकर सोलहवीं लोकसभा के चुनावों तक मिलों की बंदी कानपुर से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों और सियासी दलों के लिए महत्त्वपूर्ण मुद्दा बनी रही। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने भी यहां की मिलों को चालू करने का वादा किया था। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी, मनमोहन सिंह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावों में यहां की मिलों को चालू करने का वादा भी किया था। लेकिन अबकी बार लोकसभा चुनाव में तो मिलों को चालू करने का मुद्दा ही नहीं बन पा रहा है। किसी भी पार्टी का उम्मीदवार जनसभाओं में अब इनकी चर्चा तक नहीं कर रहा है।

हड़तालों ने बिगाड़ा खेल

ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन (बीआइसी) की एल्गिन मिल नंबर एक व नंबर दो, लाल इमली, एनटीसी की म्योर मिल या लक्ष्मीरतन जैसी पांच बड़ी मिलों का एक समय धुआं बराबर निकलता था। इसके साथ ही कानपुर में करीब एक दर्जन मिलों से हजारों कामगारों की रोजी-रोटी जुड़ी थी। इन मिलों में पुरानी प्रौद्योगिकी,मशीनों का नवीनीकरण न करने और प्रबंधन की खामियों के कारण भारी कर्ज में डूबती चली गईं। रही सही कसर हड़तालों ने पूरी कर दी। धीरे-धीरे इनमें ताला पड़ गया।

सरकार से थी आस

जब प्रदेश में भाजपा की सरकार आई तो उम्मीद बंधी थी कि प्रधानमंत्री के मेक इन इंडिया के कारण कानपुर की मिलें चालू हो जाएगीं। यह उम्मीद तब और बढ़ गई जब उद्योग से जुड़े प्रदेश सरकार ने कानपुर से दो विधायकों को मंत्री बना दिया। लेकिन आज भी स्थित ज्यों की त्यों बनी हुई है। यह अलग बात है कि रक्षा, अभियांत्रिकी, कपड़ा एवं होजरी, चमड़ा की जरूरतों के आधार पर बनने वाले टूल रूम का शिलान्यास 18 अक्तूबर 2016 को अथर्टन मिल परिसर में केंद्रीय एमएसएमई मंत्री कलराज मिश्र ने किया था।
-सुनील वैश्य, अध्यक्ष, इंडियन इंड्रस्ट्रीज एसोसिएशन (आईआइए)

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