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Lok Sabha Election 2019: उम्मीदवारों से ज्यादा दिग्गजों की साख दांव पर

Lok Sabha Election 2019 (लोकसभा चुनाव 2019): असल में यहां पर मुकाबला मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर व उनकी टीम और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखराम के बीच का है। इस सीट पर सुखराम के राजनीतिक शत्रु व प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह क्या खेल खेलते हैं, यह भी उजागर हो जाना है।

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ओमप्रकाश ठाकुर

Lok Sabha Election 2019: हिमाचल प्रदेश की चारों संसदीय सीटों पर इस बार भाजपा और कांग्रेस के उम्मीदवारों में ही मुकाबला नहीं है बल्कि प्रदेश के बड़े नेताओं में कितना दम बचा है, इसका भी फैसला होना है। प्रदेश के भाजपा-कांग्रेस के दिग्गजों की प्रतिष्ठा के बीच उम्मीदवारों के कद कहीं दब से गए हैं। मंडी संसदीय हलके में मुकाबला कांग्रेस उम्मीदवार आश्रय शर्मा और भाजपा उम्मीदवार व सांसद रामस्वरूप शर्मा के बीच है। जनता के बीच न तो रामस्वरूप शर्मा और न ही आश्रय शर्मा की कोई बड़ी पैठ है।

असल में यहां पर मुकाबला मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर व उनकी टीम और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखराम के बीच का है। इस सीट पर सुखराम के राजनीतिक शत्रु व प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह क्या खेल खेलते हैं, यह भी उजागर हो जाना है। इसके अलावा उनकी मतदाताओं पर पकड़ है भी या नहीं, यह भी इस चुनाव ने साबित करना है। 2014 में इस सीट से उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह उनकी सरकार होते हुए हार गई थी। लेकिन तबदेश भर में मोदी लहर का जलवा था।

मंडी
मंडी जिला, जहां पर मंडी संसदीय हलके में नौ विधानसभा हलके आते हैं, में सभी पर भाजपा व उसके समर्थक विधायकों का कब्जा है। लेकिन इनमें से जयराम सरकार में मंत्री व कांग्रेस उम्मीदवार आश्रय शर्मा के पिता अनिल शर्मा जयराम मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे चुके हैं। वे अंदरखाने आश्रय शर्मा को जिताने के लिए पिता सुखराम की तरह पूरी ताकत लगाए हुए हैं। 93 साल के सुखराम खुद लोगों से वोट मांगने उतर चुके हैं। वे उम्र में बड़े होने के बावजूद वीरभद्र सिंह से भी माफी मांग चुके हैं। सुखराम का मंडी और कुल्लू जिले में दखल है तो वीरभद्र सिंह का रामपुर विधानसभा हलके, किन्नौर, लाहुल स्पीति और भरमौर में दखल है।

दूसरी ओर मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। वे अपने विधानसभा हलके से लेकर पूरी मंडी में कई बार प्रचार में जा चुके हंै। वे पहली बार मुख्यमंत्री बने हैं और उन्हें इसका अंदाजा भी नहीं था कि सुखराम ऐन मौके पर अपने पोते को कांग्रेस से टिकट ले आएंगे व उनकी राह मुश्किल कर देंगे। जयराम मंत्रिमंडल के सबसे ताकतवर मंत्री महेंद्र सिंह ने जयराम ठाकुर की प्रतिष्ठा बचाने के मंडी में पूरी ताकत झोंक दी है। महेंद्र सिंह का विधानसभा हलका धर्मपुर हमीरपुर संसदीय सीट में पड़ता है लेकिन वे मंडी में प्रचार कर रहे हैं।

शिमला
मंडी के बाद शिमला संसदीय हलके में भी दोनों दलों के दिग्गजों के दमखम का इम्तिहान है। वीरभद्र सिंह व कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष कुलदीप सिंह राठौर दोनों इसी संसदीय हलके से हैं। भाजपा का कोई बड़ा नेता इस संसदीय हलके में नहीं है। 2014 के चुनावों में पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल का जलवा इस संसदीय हलके में था लेकिन इस बार पार्टी ने उन्हें हमीरपुर तक ही सीमित रखा है। पार्टी जयराम को प्रदेश का नेता बनाना चाहती है सो, शिमला सीट जिताने की जिम्मेदारी भी उन्हें ही दी गई है।

प्रचार में भाजपा यहां पर आगे है। कांग्रेस के नेता वीरभद्र सिंह का इस संसदीय हलके में दखल बचा है या नहीं यह इस चुनाव में साफ हो जाना है। यहां से कांग्रेस उम्मीदवार कर्नल धनीराम शांडिल पहले भी दो बार सांसद रह चुके हंै। इसके अलावा वे वीरभद्र सिंह सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। जबकि भाजपा उम्मीदवार सुरेश कश्यप सांसद का चुनाव पहली बार लड़ रहे हंै। वे दूसरे बार विधायक बने हैं। लेकिन उनका अपने विधानसभा हलके पच्छाद के अलावा बाहर ज्यादा दखल नहीं है। वे पूरी तरह से मुख्यमंत्री जयराम व संगठन पर निर्भर हैं। ऐसे में इस सीट पर असल परीक्षा मुख्यमंत्री जयराम व पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की ही है।

हमीरपुर
सबसे दिलचस्प मुकाबला हमीरपुर संसदीय हलके में है। यहां पर पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल का सब कुछ दांव पर है। इस सीट पर उनके पुत्र अनुराग ठाकुर व कांग्रेस विधायक राम लाल ठाकुर के बीच मुकाबला है। लेकिन प्रतिष्ठा धूमल की दांव पर है। अनुराग ठाकुर हर बार अपने पिता धूमल की वजह से जीतते रहे हैं। विधानसभा चुनावों में धूमल भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री उम्मीदवार थे लेकिन फिर भी वे सुजानपुर हलके से चुनाव हार गए। यह हार भितरघात का नतीजा रही थी। अब उन्हें अपना दमखम दिखाने का मौका मिला है। लेकिन भितरघात का खतरा अभी भी नहीं टला है।

शांता कुमार से लेकर जयराम और केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा तक धूमल को जमीन पर लाने पर आमादा हंै। इसी अंदेशे के चलते ही धूमल इस बार किसी अन्य संसदीय हलके मे प्रचार करने नहीं गए। शांता की तरह ही धूमल भी प्रदेश भाजपा के बड़े नेता थे लेकिन उन्हें हाशिए पर डाल कर शांता कुमार समेत पूरी पार्टी जयराम को बड़ा नेता बनाने की मुहिम छेड़े हुए हैं। अनुराग ठाकुर के लिए जयराम प्रचार भी कर आए हैं। दूसरी ओर कांग्रेस पार्टी को भाजपा के बागी व पूर्व सांसद सुरेश चंदेल से उम्मीदें हैं। चंदेल भाजपा में धूमल विरोधियों को गांठने में लगे हैं। वीरभद्र सिंह का इस सीट पर कितना दखल हैं, यह भी इन चुनावों में तय होना है।

कांगड़ा
कांगड़ा संसदीय हलके में भाजपा के वरिष्ठ व बुजुर्ग नेता शांता कुमार को इस बार टिकट नहीं दिया गया। वे पिछली बार 1 लाख 70 हजार से ज्यादा मतों से जीते थे। वे अपने करीबी व जयराम सरकार में खाद्य आपूर्ति मंत्री किशन कपूर को टिकट दिलाने में कामयाब रहे। भाजपा ने किशन कपूर को जिताने की जिम्मेदारी भी शांता कुमार को ही दी है। पवन काजल के लिए वीरभद्र सिंह खासतौर से प्रचार करने कांगड़ा गए थे। काजल को अपनी छवि का भी फायदा मिल रहा है, जबकि किशन कपूर को शांता कुमार के अलावा मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का भी सहारा है।

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