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मणिपुर चुनाव: थाउबल सीट पर सीएम इबोबी को हराना इरोम शर्मिला के लिए टेढ़ी खीर

इबोबी सिंह ने 2012 में अपने निकटतम भाजपा प्रतिद्वंद्वी को 16 हजार से ज्यादा मतों से हराया था।

Author थाउबल (मणिपुर) | February 27, 2017 8:54 PM
प्रेस कॉन्फ्रेंस करतीं इरोम शर्मिला। (पीटीआई फाइल फोटो)

मणिपुर में इस हफ्ते होने वाले चुनावों में सबकी निगाह थाउबल विधानसभा सीट पर लगी हुई है जहां सामाजिक कार्यकर्ता से नेता बनीं इरोम शर्मिला तीन बार के मुख्यमंत्री रहे ओ. इबोबी सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ रही हैं। इस सीट पर दूसरे चरण में आठ मार्च को चुनाव होंगे। थाउबल जिले की दस विधानसभा सीटों में शामिल थाउबल क्षेत्र में 27 हजार 728 मतदाता हैं। यह कांग्रेस का गढ़ रहा है जहां से इबोबी सिंह 2007 से दो बार से विधायक हैं। मुख्यमंत्री का विधानसभा क्षेत्र होने के अलावा थाउबल को अनौपचारिक तौर पर वीआईपी जिला भी माना जाता है।

राज्य के निवासियों और कांग्रेस नेताओं के मुताबिक थाउबल विधानसभा क्षेत्र में हर घर में कोई न कोई सरकारी नौकरी में है, हर घर में पीने का पानी और बिजली आपूर्ति जैसी मूलभूत सुविधाएं हैं। जिला कांग्रेस के एक नेता ने बताया, ‘विभिन्न जांच चौकियों पर जांच के दौरान अगर कोई व्यक्ति बताता है कि वह थाउबल से है तो राज्य की पुलिस काफी सावधानी बरतती है। थाउबल में लड़ाई इस बात को लेकर नहीं है कि इबोबी सिंह जीतेंगे या नहीं, बल्कि बहस इस बात को लेकर है कि उनकी जीत का अंतर 2012 की जीत से अधिक होगा या नहीं।’

इबोबी सिंह ने 2012 में अपने निकटतम भाजपा प्रतिद्वंद्वी को 16 हजार से ज्यादा मतों से हराया था। थाउबल की सीमा पांच जिलों से लगती है और आम लोगों का मानना है कि थाउबल विधानसभा सीट पर इबोबी सिंह को हराना न केवल असंभव है बल्कि जिले की शेष नौ सीटों पर भी उनकी पार्टी को हराया नहीं जा सकता। इस सीट पर टीएमसी, भाजपा और एक निर्दलीय उम्मीदवार के अलावा यहां से इरोम शर्मिला अपनी नवगठित पार्टी पीपुल्स रिसर्जेंस एंड जस्टिस अलायंस (पीआरजेए) से चुनाव लड़ रही हैं।

इरोम शर्मिला के इस सीट से लड़ने के बारे में पूछे जाने पर इबोबी सिंह ने कहा, ‘हर किसी को चुनाव लड़ने का अधिकार है। उनको मेरी शुभकामनाएं।’ थाउबल जिले में कुछ कांग्रेस उम्मीदवारों के झंडात्तोलन कार्यक्रम में काफी भीड़ उमड़ी और कांग्रेस की रैलियों में काफी संख्या में लोग उमड़े। इरोम शर्मिला को धन की कमी का सामना करना पड़ रहा है और हालत यह है कि वह अपना प्रचार साइकिल पर कर रही हैं। उन्होंने कहा, ‘मैं अपनी साइकिल पर प्रचार करती हूं। मैं पोस्टर और पैम्फलेट छपवाने में विश्वास नहीं करती। आपका काम, लोगों के लिए आपका आंदोलन बोलेगा। मेरा मानना है कि चुनाव लड़ने के लिए एक उम्मीदवार को एक लाख रूपए से कम राशि चाहिए, बशर्ते वे मेरी तरह चुनाव प्रचार करे।’

पिछले वर्ष नौ अगस्त को 16 वर्ष पुराना अपना अनशन तोड़ते हुए शर्मिला ने घोषणा की थी कि ‘अफ्सपा को खत्म करने के लिए सत्ता की जरूरत है’ जिसे वह चुनावी रास्ते से हासिल करेंगी। लोगों को अफ्सपा के खिलाफ उनके 16 वर्षों की लड़ाई से सहानुभूति है लेकिन उनकी राजनीतिक कुशलता को लेकर लोग सशंकित हैं और उनका मानना है कि राजनीति में जगह बनाने में उनको लंबा रास्ता तय करना होगा। राज्य भाजपा के अध्यक्ष के. भावनंद सिंह ने कहा, ‘उन्होंने अफ्सपा के खिलाफ लड़ाई लड़ी होगी लेकिन राजनीति अलग खेल है और उन्हें अभी काफी कुछ सीखना है।’

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