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मणिपुर चुनाव: धमकाऊ फतवे से बेपरवाह नजीमा डटी हैं चुनाव मैदान में

नजीमा कहती हैं कि उनका एकमात्र कसूर यह है कि वे महिला हैं। यह बात समाज के चंद लोगों के गले से नीचे नहीं उतर रही है। उनका सवाल है कि आखिर एक मुसलिम महिला चुनाव कैसे लड़ सकती है?

राज्य की इस पहली मुसलिम महिला उम्मीदवार नाजिमा ।

पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में विधानसभा की 60 में से कम से कम एक दर्जन सीटों पर मुसलिम मतदाता ही निर्णायक हैं। फिर भी राज्य की इस पहली मुसलिम महिला उम्मीदवार को भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है। इरोम शर्मिला की पार्टी पीपुल्स रीसर्जेंस एंड जस्टिस अलायंस (प्रजा) के टिकट पर वाबगाई सीट से चुनाव लड़ रहीं नजीमा को मौलवियों ने मौत के बाद दफनाने के लिए उनके गांव में दो गज जमीन तक नहीं देने की धमकी दी है। बावजूद इसके वे चुनाव जीत कर अल्पसंख्यक महिलाओं के अधिकारों की रक्षा की लड़ाई लड़ना चाहती हैं। इस सीट पर पहले चरण में चार मार्च को ही मतदान होना है।

मणिपुर के नौ फीसद मुसलिम मतदाता यहां भी राजनीतिक दलों की किस्मत बनाने या बिगाड़ने में सक्षम हैं। यहां इस तबके को पांगल या मैतेयी पांगल के नाम से जाना जाता है। नजीमा के खिलाफ फतवा जारी करने वालों ने इसकी कोई वजह तो नहीं बताई है, लेकिन समझा जाता है कि वे उसके चुनाव मैदान में उतरने से नाराज हैं। नजीमा ने शर्मिला के साथ राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला से मुलाकात कर उनको इस फतवे के बारे में जानकारी दे दी है। फतवे काइतना आतंक है कि थाउबल जिले में नजीमा के गांव की महिलाएं तक उनसे बातचीत के लिए तैयार नहीं है। नजीमा कहती हैं कि उनका एकमात्र कसूर यह है कि वे महिला हैं। यह बात समाज के चंद लोगों के गले से नीचे नहीं उतर रही है। उनका सवाल है कि आखिर एक मुसलिम महिला चुनाव कैसे लड़ सकती है?
वैसे नजीमा के लिए धमकियों का यह सिलसिला कोई नया नहीं है। इससे पहले घरेलू हिंसा के मामले उठाने और महिलाओं के स्व-सहायता समूहों की सहायता की वजह से उनको मौलवियों का कोपभाजन बनना पड़ा है। उन्होंने अल्पसंख्यक महिलाओं की सहायता के लिए चेंग मारूप यानी चावल कोष नाम से एक योजना शुरू की थी। इसके तहत हर महिला अपने घर से एक मुठ्ठी चावल दान करती थी। इस तरीके से बाकी  जमा होने वाले चावल को महीने में दो बार बेचा जाता था और इस रकम से पशु खरीदे जाते थे।

नजीमा बताती हैं कि उनके तबके की महिलाओं को साइकिल चलाने तक की छूट नहीं है, लेकिन विद्रोही तेवरों वाली नजीमा ने स्कूल आने-जाने के लिए साइकिल ही चुनी। इसके लिए चारों ओर से कसी जाने वाली फब्तियों ने नजीमा का मनोबल कम करने की बजाय उसका हौसला ही बढ़ाया। वे बताती हैं कि अपनी कक्षा की अकेली और परिवार की पहली लड़की के तौर पर उसने दसवीं तक की पढ़ाई पूरी की। उसके बाद घरवाले उस पर शादी के लिए जोर डालने लगे, लेकिन इस दबाव के आगे झुकने की बजाय वह घर से एक ऐसे व्यक्ति के साथ भाग गई जिससे वह पहले महज दो बार ही मिली थी, लेकिन बाद में वह व्यक्ति तानाशाही साबित हुआ। उसके अत्याचारों से तंग आकर नजीमा छह महीने में ही उससे अलग हो गई।नजीमा के चावल कोष की वजह से उसके गांव की महिलाएं आत्मनिर्भर होने लगीं, लेकिन मौलवियों को यह बात नहीं पची। नजीमा के मुताबिक, पुरुषों की नजर में यह चोरी थी। बावजूद इसके मुश्किल हालातों में भी नजीमा लगातार आगे बढ़ती रहीं। शर्मिला इरोम ने जब उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया तो मुसलिम तबके ने इसका विरोध शुरू कर दिया, लेकिन न तो शर्मिला ने हार मानी और न ही नजीमा ने। वे कहती हैं कि लोग चाहे जितना विरोध करें, गांव वाले मेरे साथ हैं।

नजीमा कहती हैं कि पूर्वोत्तर की महिलाओं को ज्यादा अधिकार होने के प्रचार के बावजूद राज्य में अल्पसंख्यक तबके की महिलाएं भारी शोषण की शिकार हैं। वे अपनी मर्जी से न तो जी सकती हैं और न ही खा-पहन सकती हैं। नजीमा का लक्ष्य अब चुनाव जीत कर इस शोषण और अत्याचार के खिलाफ अपनी आवाज और बुलंद करना है।

पहले भी मिल चुकी हैं धमकियां
नजीमा के लिए धमकियों का यह सिलसिला कोई नया नहीं है। इससे पहले घरेलू हिंसा के मामले उठाने और महिलाओं के स्व-सहायता समूहों की सहायता की वजह से उनको मौलवियों का कोपभाजन बनना पड़ा है। उन्होंने अल्पसंख्यक महिलाओं की सहायता के लिए चेंग मारूप यानी चावल कोष नाम सेएक योजना शुरू की थी। फतवे का इतना आतंक है कि थाउबल जिले में नजीमा के गांव की महिलाएं तक उनसे बातचीत के लिए तैयार नहीं है। नजीमा कहती हैं कि उनका एकमात्र कसूर यह है कि वे महिला हैं। यह बात समाज के चंद लोगों के गले से नीचे नहीं उतर रही है। उनका सवाल है कि आखिर एक मुसलिम महिला चुनाव कैसे लड़ सकती है?

 

 

 

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