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आरएसएस की 30 साल की तपस्‍या का नतीजा है मणिपुर में भाजपा की जीत, 99 फीसदी ईसाई वोटर्स वाली सीट पर भी दिलाई जीत

भाजपा ने मणिपुर विधानसभा चुनावों के नतीजों में 60 में से 21 सीटें जीती थी।

मणिपुर में भाजपा 0 से 21 सीटों पर पहुंची है। एक साल पहले ही उसने असम विधानसभा में 60 सीट जीतकर उत्‍तर-पूर्व के किसी राज्‍य में पहली बार अपने दम पर सरकार बनाई थी।

भाजपा ने मणिपुर विधानसभा चुनावों के नतीजों में 60 में से 21 सीटें जीती थी। बाद में उसने दूसरे दलों को साथ लेकर सरकार बना ली और पहली बार इस राज्‍य में भाजपा का राज हो गया। इन चुनावों में भाजपा ने कई मिथ तोड़े हैं। उसने कई ईसाई बहुल सीटों पर जीत हासिल कर यह भ्रम तोड़ा कि वह केवल हिंदुओं की पार्टी है। जैसे हेंगलेप से टी थांगजलम हाओकिप, थानलोन से वुंगजागिन वाल्‍टे, चूड़ाचंद्रपुर से वी हांगखानलियान, तामेंगलॉन्‍ग से सेम्‍युअल जेंडाई कामेई और कांपोपी से नेमचा किपगेन। ये सभी ईसाई हैं और जिन सीटों से जीते हैं वहां पर 99 प्रतिशत वोटर ईसाई हैं।

मणिपुर में भाजपा 0 से 21 सीटों पर पहुंची है। एक साल पहले ही उसने असम विधानसभा में 60 सीट जीतकर उत्‍तर-पूर्व के किसी राज्‍य में पहली बार अपने दम पर सरकार बनाई थी। मणिपुर में भारत की जीत का श्रेय नॉर्थईस्‍ट डेमोक्रेटिक अलायंस (नेडा) के संयोजक और असम के मंत्री हिमंत बिस्‍व सरमा, भाजपा के महासचिव राम माधव, युवा रणनीतिकार रजत सेठी, मणिपुर भाजपा के प्रभारी प्रहलाद पटेल और असम भाजपा सचिव जगदीश भुयान को दिया जाता है। लेकिन संघ परिवार की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

मणिपुर चुनावों के जिम्‍मेदारी संभालने वाले और 40 साल तक नागालैंड में काम करने वाले आरएसएस के वरिष्‍ठ नेता जगदम्‍बा माल ने बताया, ”यह बात सही है कि भाजपा ने काफी मेहनत की। लेकिन कोई यह ना भूले कि कई सालों से संघ परिवार के कई संगठन यहां इंफाल घाटी और पास के पहाड़ी इलाकों में मेहनत से काम कर रहे हैं। आदिवासी लोगों ने धार्मिक विश्‍वास से ऊपर उठकर हमारे कल्‍याणकारी कार्यक्रमों में भरोसा और सम्‍मान जताया है। यह भरोसा निश्चित रूप से वोटों में बदला है।”

मणिपुर में संघ से जुड़े कम से कम 15 संगठन सक्रिय हैं। कई तो 30 साल से यहां पर काम कर रहे हैं। भाजपा के लिए खुलेआम प्रचार करने के बजाय आरएसएस संगठन मतदान के दिन लोगों को घरों से बाहर लाने पर ध्‍यान देते हैं। आरएसएस के उत्‍तर असम प्रांत के प्रचार प्रमुख शंकर दास के अनुसार, ”जब आप घर-घर जाते हैं और कहते हैं कि वोटर्स को बाहर आना होगा तो संदेश साफ होता है।”

सेवाश्रम, एकल विद्यालय, वनवासी कल्‍याण आश्रम, सेवा भारती, किसान संघ, एबीवीपी, विद्या भारती, वनबंधु परिषद, विश्‍व हिंदू परिषद, भारतीय जन सेवा संस्‍थान, भारत कल्‍याण प्रतिष्‍ठान, बाल संस्‍कार केंद्र और राष्‍ट्रीय शैक्षिक महासंघ पूरे मणिपुर में सालों से कार्यक्रम चला रहे हैं। महाराष्‍ट्र के रहने वाले और उत्‍तरपूर्व में 20 साल गुजार चुके एक आरएसएस कार्यकर्ता ने बताया कि नागालैंड में कई तथाकथित उग्रवादियों के बच्‍चे आएसएस की ओर से चलाई जा रही अंग्रेजी माध्‍यम की स्‍कूलों में पढ़ते हैं।

1995 में उत्‍तरपूर्व में संघ के संगठनों की 650 शाखाएं थी जो अब बढ़कर 6000 हो चुकी हैं। अकेले मणिपुर में आएसएस की 120 शाखा और मंडल हैं। केंद्र सरकार के नागा संगठन एनएससीएन (आईएम) से समझौते के बाद मणिपुर के मैतेई लोग भाजपा से छिटक गए थे। एनएससीएन अपने नागालिम के नक्‍शे में मणिपुर के भी कुछ हिस्‍सों को दर्शाता है। इससे मैतेई नाराज थे। लेकिन आरएसएस ने उन्‍हें मना लिया और यह भाजपा की जीत में बड़ी वजह रही।

आरएसएस के दिग्‍गजों का मानना है कि मणिपुर उत्‍तरपूर्व में एक शुरुआत है। त्रिपुरा और मेघालय में भी आरएसएस और भाजपा ने जोर लगा रखा है। इन दोनों राज्‍यों में अगले साल चुनाव होने हैं। त्रिपुरा में आरएसएस की सदस्‍यता दुगुनी हो चुकी है। मेघालय में तो भाजपा ने कोनराड संगमा की नेशनल पीपल्‍स पार्टी से गठबंधन भी कर रखा है। इस पार्टी ने मणिपुर में भी भाजपा सरकार बनाने में मदद की है।

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