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विंध्य में सवर्णों के बीच खाई से कांग्रेस को हुआ नुकसान, मध्य प्रदेश के मालवा-निमाड़ ने की भाजपा से बेवफाई

आदिवासी क्षेत्र की कई सीटें भी खिसक गईं, जिसे संघ ने कई साल की मेहनत से तपाया था। दूसरी ओर, विंध्य क्षेत्र में कांग्रेस के राजपूत उम्मीदवारों को ब्राह्मणों का वोट नहीं मिला। बसपा ने कांग्रेस के काफी वोट काटे। वहां की 30 सीटों में कांग्रेस को छह सीटें मिलीं। पिछली बार 12 सीटें थीं। कुछ में कांग्रेस 200-300 वोटों से हारी।

Author Published on: December 13, 2018 5:52 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

आदिवासी, किसान, कारोबारी- इन वर्गों की नाराजगी मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को बड़ी चोट पहुंचा गई। भाजपा को सबसे ज्यादा धक्का उस मालवा-निमाड़ में लगा, जहां इस साल किसान अपना असंतोष प्रदर्शित करने के लिए सड़कों पर आ गए थे। आदिवासी क्षेत्र की कई सीटें भी खिसक गईं, जिसे संघ ने कई साल की मेहनत से तपाया था। दूसरी ओर, विंध्य क्षेत्र में कांग्रेस के राजपूत उम्मीदवारों को ब्राह्मणों का वोट नहीं मिला। बसपा ने कांग्रेस के काफी वोट काटे। वहां की 30 सीटों में कांग्रेस को छह सीटें मिलीं। पिछली बार 12 सीटें थीं। कुछ में कांग्रेस 200-300 वोटों से हारी। कांग्रेस मजबूत नहीं थी, न ही कांग्रेस के नेताओं का जमीन से संपर्क शिवराज सिंह चौहान से ज्यादा मजबूत रहा। लेकिन किसान, दलित-सवर्णो के मुद्दों के अलावा भाजपा के चेहरों से मतदाता की अनासक्ति और समस्याओं का समाधान नहीं होने की नाराजगी का सीधा फायदा कांग्रेस को मिला।

मालवा-निमाड़ में भाजपा ने 27 सीटें गंवाई। इंदौर-उज्जैन संभाग की 66 निर्णायक सीटों पर ही किसान आंदोलन की शुरुआत हुई थी। सवर्ण आंदोलन का असर भी उज्जैन और शाजापुर जिलों में दिखा था। यहां पर कांग्रेस को 25 सीटों का फायदा मिला। मालवा में इंदौर संभाग (निमाड़ को छोड़कर) की 21 सीटों में 13 पर कांग्रेस ने बढ़त ली। उज्जैन संभाग की 29 में से 13 सीटें उसके खाते में गईं। कांग्रेस की कितनी बढ़त है, इसे इससे समझा जा सकता है कि इन 29 में से पिछले चुनाव में कांग्रेस के पास मात्र एक विधायक था। निमाड़ की 16 में से 10 सीटें कांग्रेस के पास गईं। दो सीटें उसके बागियों ने निकालीं।

निमाड़ ने पलटा खा लिया। यह आदिवासी व किसान बहुल क्षेत्र है। इस इलाके में जहां कांग्रेस के टिकट पर लड़ने वाले आदिवासी युवा संगठन जयस के नेता डॉ. हीरालाल अलावा मनावर से जीते। भाजपा के मंत्री दीपक जोशी, अर्चना चिटनिस, बालकृष्ण पाटीदार, अंतर सिंह आर्य मात खा गए। हालांकि, कांग्रेस के दिग्गज सुभाष सोजतिया, नरेंद्र नाहटा भी हारे। आश्चर्यजनक नतीजे मंदसौर के रहे, जहां चार में से तीन सीटों पर भाजपा की पकड़ बनी रही।

ग्वालियर-चंबल ने भी भाजपा को बड़ा झटका दिया है। यहां की 27 सीटों में से 21 जीतकर कांग्रेस ने ज्योतिरादित्य सिंधिया का मान रखा। दलित आंदोलन की आग में भिंड व मुरैना में पहली बार भाजपा शून्य पर टिकी। उसके मंत्री रुस्तम सिंह, लालसिंह आर्य, जयभान सिंह पवैया हार गए। सटे हुए बुंदेलखंड में कांग्रेस व भाजपा की ताकत बराबर रही। 26 सीटों में से 12 पर भाजपा रही। यहां समाजवादी पार्टी को भी एक सीट मिली।

भोपाल क्षेत्र के होशंगाबाद इलाके के तीन जिलों में से दो ने प्रदेश के ट्रेंड को बिल्कुल नकार दिया। छह में से एक भी सीट भाजपा को नहीं मिली। हालांकि, सटे आदिवासी बहुल जिले बैतूल के मतदाता कांग्रेस पर ऐसे रीझे कि पांच में से चार सीटें उसकी झोली में डाल दीं। यही हाल अशोकनगर की तीनों सीटों के मामले में हुआ। इसके उलट सीहोर जिले में चारों सीटें भाजपा के पास गईं।

भोपाल के आसपास के गुना, राजगढ़, अशोकनगर, रायसेन, सीहोर व विदिशा की 25 में से 12 सीटें कांग्रेस के पास गईं, जिसमें भाजपा के दशकों से गढ़ रहे विदिशा की सीट भी उसने छीन ली। रायसेन में मंत्री गौरीशंकर शेजवार के बेटे को जनता ने नकार दिया। उज्जैन में केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत के बेटे हार गए। एससी सीटों पर कांग्रेस आगे रही। कांग्रेस ने 2013 में एससी की 35 में से चार सीटें जीती थीं। इस बार 17 जीतीं। कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया घरों में मजबूत हुए। ज्योतिरादित्य सिंधिया के क्षेत्र ग्वालियर-चंबल संभाग और कमलनाथ के क्षेत्र महाकौशल में कांग्रेस ने पिछली बार से 23 सीटें ज्यादा लीं। ग्वालियर-चंबल में हुई हिंसा भाजपा के खिलाफ गई। छिंदवाड़ा मॉडल लोगों के जेहन में रहा।

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