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Loksabha Elections 2019: नरेंद्र मोदी पर टिकी झारखंड भाजपा की आस, अडाणी को जमीन देने से है संथाल परगना में भारी नाराजगी

Loksabha Elections 2019: गोड्डा में ईस्टर्न कोल फील्ड की ललमटिया कोयला खदान है। यहां कोयले का अकूत भंडार है। यहां का कोयला देश के विभिन्न हिस्सों में माल गाड़ियों पर लाद रेल और सड़क रास्ते से भेजा जाता है।

पीएम नरेंद्र मोदी। (फाइल फोटोः पीटीआई)

Loksabha Elections 2019: विभिन्न समस्याओं से घिरी संथाल परगना की तीन सीटों में से केवल गोड्डा सामान्य सीट है। बाकी राजमहल और दुमका आदिवासियों के लिए सुरक्षित है। इन दोनों पर झारखंड मुक्ति मोर्चा का कब्जा है। वहीं गोड्डा सीट भाजपा की झोली में है। यहां से निशिकांत दुबे तीसरी दफा चुनाव लड़ रहे हैं। इनके सामने पूर्व सांसद प्रदीप यादव झारखंड विकास पार्टी से हैं। झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन दुमका से आठ बार चुनाव जीत चुके हैं। नौवीं बार जीत का सेहरा बांधने गुरूजी चुनावी समर में कूदे हैं। राजमहल में झामुमो के विजय हांसदा निवर्तमान सांसद हैं। झामुमो ने उन्हें फिर से मैदान में उतारा है।

झारखंड के गोड्डा संसदीय इलाके में जितने विकास कार्य हुए हैं, उसके मुकाबले दुमका और राजमहल में नहीं हुए जबकि दुमका संथाल परगना का डिवीजनल मुख्यालय है। गोड्डा में रेलवे लाइन, कृषि कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, देवघर में एम्स, अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा का निर्माण बगैरह बड़ी योजनाओं पर अमलीजामा पहनाया गया। बावजूद इसके आदिवासी मतदाताओं में राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास की सरकार से बेहद नाराजगी है। छोटानागपुर और संथाल परगना टेनेंसी एक्ट्स में संशोधन की वजह से इन इलाकों में भाजपा को कीमत चुकानी पड़ सकती है। वैसे अप्रैल 2017 में हुए लिट्टीपाड़ा विधानसभा सीट के उपचुनाव में झामुमो के साइमन मरांडी ने भाजपा के हेमलाल मुर्मू को 13 हजार मतों से हराया था। पब्लिक दो साल पहले ही नाराजगी का संदेश दे चुकी है।

हालांकि, उस वक्त मुख्यमंत्री रघुवर दास समेत उनके कई मंत्री यहां जमे थे। इतना ही नहीं चुनाव के ठीक तीन दिन पहले खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नितिन गडकरी सभा कर गए थे। ये दो हजार करोड़ रुपए की लागत से बनने वाले साहेबगंज-मनिहारी गंगा नदी पुल की बुनियाद रखने आए थे। यह अलग बात है कि पुल दो साल गुजर जाने पर भी कागजों से नीचे नहीं उतर पाया है। साहेबगंज राजमहल लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। मगर यहां के लोग इसे मरता हुआ शहर बोलते हैं। यहां से रेलवे का लोको मालदा शिफ्ट होने के बाद शहर बैठ सा गया है। लोगों का पलायन तेजी से हुआ। नतीजतन यहां खड़ी पुराने मकानों में पेड़ उग गए हैं।

पीने के पानी और प्लस टू स्कूलों की बेहद कमी संथाल परगना में अखरती है। ऊपर से गोड्डा में अडानी के पॉवर प्रोजेक्ट के लिए जमीन अधिग्रहण का मुद्दा जोरों पर है। यह प्रोजेक्ट गोड्डा के मोतिया, माली, गायघाट और इसके आसपास के गांवों में प्रस्तावित है। राज्य सरकार ने मंजूरी दे दी है। इसका भारी विरोध भाजपा को झेलना पड़ रहा है। गांव के सुग्गा हांसदा कहते हैं, “अडानी का फरमान है कि जमीन नहीं दोगे, तो जमीन में गाड़ देंगे लेकिन संथाल परगना के लोग जान देने को तैयार हैं, जमीन नहीं देंगे।” यहां प्रशासनिक स्तर पर भी जोर जबरदस्ती की बात सामने आई है।

असल में झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता शिबू सोरेन ने आदिवासियों को अपनी जमीन की अहमियत का एहसास कराया है। इनका कहना है कि भाजपा एक दफा फिर महाजनी प्रथा लाना चाहती है जिसे हम हरगिज नहीं होने देंगे। उनका यह नारा इलाके में असरदार है। गोड्डा में विकास पर भारी है शिबू सोरेन की आवाज। यहां के मतदाता उन्हें दिशोम गुरू कह कर पुकारते हैं। इनके ढोल-नगाड़े की आवाज दूर-दूर के संथालों को जुटा लेती है।

गोड्डा संसदीय क्षेत्र में दो शिवलिंग है। बाबा बासुकीनाथ और देवघर में बाबा बैद्यनाथ। यहां सांसद निशिकांत दुबे की मंदिर मामले में दखल यहां के पंडा समाज को ठीक नहीं लगती। इनके खिलाफ आंदोलन पंडा समाज करता रहा है जिसे पूर्व मेयर राजनारायण खवाड़े उर्फ बबलू खवाड़े के बीच-बचाव से सुलझाया जाता रहा है। पंडा समाज का देवघर में 15 से 20 हजार वोट है जिसे बबलू खवाड़े भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में करने लगे हैं। उधर, राजद नेता संजय भारद्वाज झाविमो के प्रदीप यादव की जीत का दावा कर रहे हैं।

गोड्डा में ईस्टर्न कोल फील्ड की ललमटिया कोयला खदान है। यहां कोयले का अकूत भंडार है। यहां का कोयला देश के विभिन्न हिस्सों में माल गाड़ियों पर लाद रेल और सड़क रास्ते से भेजा जाता है। इस इलाके की कमाई का कोयला मुख्य स्रोत है लेकिन अवैध खनन करने वाले मालामाल हैं। यहां के ज्यादातर लोग एलर्जी और अस्थमा के शिकार हैं। प्रदूषण यहां की मुख्य समस्या है। इससे निजात दिलाने की किसी के पास कोई योजना नहीं है।

इस इलाके ने तीन-तीन मुख्यमंत्री झारखंड को दिए। बाबूलाल मरांडी, शिबू सोरेन और हेमंत सोरेन। फिर भी संथालियों की दशा नहीं सुधरी। इन सब समस्याओं से जूझते मतदाताओं को 19 मई को अंतिम चरण में होने वाले संसदीय चुनावों में कोई दिलचस्पी नहीं है। लोग काफी कुरेदने के बाद भी नहीं बोलते।

इसी बीच, 7 मई को केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह गोड्डा में भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में सभा कर गए। वहां उम्मीद से भी कम भीड़ ने नेताओं को मायूस किया। आठ मई को जमशेदपुर में भी अमित शाह की रैली में कुर्सियां खाली पड़ी रहीं। अब दारोमदार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आ टिका है। 14 मई को प्रधानमंत्री मोदी के देवघर में रैली की चर्चा है। शायद उनके आगमन से भाजपा के पक्ष में हवा बन जाए। मगर मतदाताओं की चुप्पी किसी के भी किस्मत की बाजी पलट सकती है।

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