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2019 चुनाव: सुषमा स्‍वराज की सीट से शिवराज को उतार सकती है बीजेपी!

केंद्रीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पूर्व में अपनी सीट से चुनाव लड़ने के लिए मना कर चुकी है। ऐसे में बीजेपी उनकी जगह पर किसी बड़े चेहरे को वहां से उतार सकती है।

शिवराज के नेतृत्व में बीते साल बीजेपी विधानसभा चुनाव हार गई थी, जबकि सुषमा अपनी सीट से आम चुनाव लड़ने के लिए मना कर चुकी हैं। (एक्सप्रेस फोटोः अमित मेहरा/रोहित पारस जैन)

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान आगामी लोकसभा चुनाव में केंद्रीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की सीट से सियासी मैदान में उतारे जा सकते हैं। चूंकि सुषमा विदिशा सीट से लड़ने के लिए मना कर चुकी हैं। ऐसे में बीजेपी उनकी जगह पर शिवराज को वहां से लड़ा सकती है। पार्टी ने चुनाव को ध्यान में रखते हुए तैयारियां भी शुरू कर दी हैं। 2018 में हुए विधानसभा चुनाव के वक्त बनाई गई लोकसभा चुनाव अभियान समिति को भी सक्रिय कर दिया गया है।

शाह को लेना है अंतिम फैसलाः म.प्र.विधानसभा चुनाव नतीजों में बीजेपी 29 लोकसभा सीटों में से 12 पर पीछे थी, जिनमें विदिशा का नाम भी है। यही वजह है कि पार्टी को लगता है कि उसे वहां नए सिरे से जमीनी स्तर पर मेहनत करनी पड़ेगी। हालांकि, शिवराज यहां से लड़ेंगे या नहीं? इस बारे में अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है, पर जानकारों का कहना है कि इस पर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह आखिरी निर्णय लेंगे।

सौंपा गया उपाध्यक्ष का जिम्माः इससे पहले, शिवराज को विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से हार का सामना करना पड़ा था। हालांकि, उन्होंने नतीजों के बाद साफ कर दिया था कि वे राज्य छोड़कर (केंद्र में भी नहीं) कहीं नहीं जाएंगे। वह म.प्र में ही रहेंगे और वहीं अंतिम सांस लेंगे। आगे विधानसभा सत्र में वह खासा सक्रिय नजर आए, पर पार्टी की तरफ से उन्हें उपाध्यक्ष का जिम्मा सौंपा गया।

‘टाइगर’ पर बोला गया था हमलाः वहीं, कांग्रेस ने इसे लेकर पूर्व सीएम पर जुबानी हमला भी किया था। राज्य के जन संपर्क मंत्री पीसी शर्मा बोले थे, “मध्य प्रदेश के टाइगर को निष्कासित कर दिल्ली भेजा गया।” दरअसल, शिवराज ने इससे पहले एक सभा में पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा था कि वे चिंता न करें। टाइगर अभी जिंदा है।

कमजोर हो गए हैं शिवराज?: राजनीतिक जानकारों की मानें तो म.प्र बीजेपी में बीते 15 सालों से वही होता आया, जो शिवराज ने चाहा। मगर अब वह पहले के मुकाबले कमजोर नजर आ रहे हैं। कारण उपाध्यक्ष का जिम्मा मिलने से पहले नेता प्रतिपक्ष के चुनाव भी हैं। वह खुद या फिर किसी करीबी को उस पद पर चाहते थे, लेकिन वैसा न हो सका। गोपाल भार्गव को नेता प्रतिपक्ष बनाया गया।

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