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Lok Sabha Election Chunav 2019: इन पांच टीमों के बीच होना है मुकाबला, चार क्षेत्रीय छत्रप अकेले मोदी को दे रहे चुनौती

Lok Sabha Election Chunav 2019: आम चुनाव में इस साल कुल पांच टीमों के बीच महामुकाबला देखने को मिल सकता है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी टीम से नरेंद्र मोदी सरकार को सबसे ज्यादा खतरा है।

Lok Sabha Election 2019: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह। (Express Photo By Amit Mehra)

Lok Sabha Election Chunav 2019 का बिगूल बज चुका है। सभी राजनीतिक पार्टियों ने इससे पहले ही मोर्चा संभाल रखा है और सियासी नफा-नुकसान को भांपते हुए राजनीतिक मोर्चेबंदी में जुटे हैं। भाजपा जहां नए और छोटे सहयोगी दलों के साथ गठबंधन कर एनडीए का कुनबा बढ़ाने में जुटी है, वहीं कांग्रेस भी देशव्यापी गठबंधन बनाने में व्यस्त है। हालांकि, इन गठबंधनों का स्वरूप स्थानीय है। कुछ दल ऐसे भी हैं जो न तो भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए के साथ हैं और न ही कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए के साथ हैं। ऐसे दल गैर भाजपाई, गैर कांग्रेसी मोर्चा बनाने की भी वकालत कर चुके हैं, मगर बात नहीं बन सकी। लिहाजा, ये क्षेत्रीप छत्रप एकला चल रहे हैं। यानी इस नजर से देखें तो आम चुनाव में इस साल कुल पांच टीमों के बीच महामुकाबला देखने को मिल सकता है।

टीम मोदी में कुछ आए तो कुछ गए: नरेंद्र मोदी की टीम में जहां 2014 के कुछ पुराने साथी बिछड़े हैं, वहीं कुछ नए साथी भी जुड़े हैं। बिछड़ने वालों में आंध्र प्रदेश की सत्ताधारी तेलगू देशम पार्टी (टीडीपी) प्रमुख है जिसके 16 सांसद चुनकर पिछली बार आए थे। इनके अलावा बिहार की रालोसपा भी इस बार टीम मोदी में शामिल नहीं है। 2014 में उसके तीन सांसद चुने गए थे। असम से असम गण परिषद भी एनडीए छोड़ चुकी है। हालांकि, मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने दक्षिण की सबसे बड़ी पार्टी एआईएडीएमके को एनडीए में शामिल कराने में बड़ी सफलता पाई है। पिछले चुनावों में इस दल को 37 सीटें मिली थीं। इनके अलावा एनडीए में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी शामिल हुए हैं, जिनका बिहार में बड़ा जनाधार है।

बढ़ा कांग्रेस का कुनबा: कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी टीम से नरेंद्र मोदी सरकार को सबसे ज्यादा खतरा है। 2014 की चुनावी रणनीति से आगे निकलते हुए राहुल गांधी ने भी अपने कुनबे का विस्तार किया है। कर्नाटक में जहां पार्टी ने जेडीएस को साथ जोड़ा है, वहीं तमिलनाडु में मुख्य विपक्षी पार्टी डीएमके के एम के स्टालिन साथ गठबंधन बनाया है। इसके अलावा 2014 में मोदी टीम के सहयोगी रहे चंद्रबाबू नायडू के साथ राहुल गांधी ने आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी गठबंधन किया है। बिहार-झारखंड में पहले की तरह राजद और झामुमो से गठबंधन बरकरार है। इनके अलावा बिहार में मोदी टीम से खिसके उपेंद्र कुशवाहा, नीतीश की जेडीयू से खिसके शरद यादव और भाजपा के कुछ बागियो को भी मिलाने में कांग्रेस ने कामयाबी हासिल की है। महाराष्ट्र में पार्टी शरद पवार की एनसीपी से पहले की ही तरह गठबंधन जारी रखेगी।

यूपी में त्रिकोणीय मुकाबला: मायावती-अखिलेश और जयंत चौधरी की तिकड़ी बनने के बाद टीम मोदी के लिए बड़ी चुनौती उत्पन्न हो गई थी लेकिन कांग्रेस द्वारा प्रियंका गांधी की एंट्री कराने से यहां मुकाबला त्रिकोणीय हो चला है। साल 2014 में भाजपा जहां अपना दल के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ी थी, वहीं सपा, बसपा अकेले चुनाव लड़े थे। कांग्रेस ने रालोद के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था लेकिन इस बार विपक्षी खेमे में राजनीतिक स्थिति उलट-पुलट वाली है। सपा से भी अखिलेश के चाचा शिवपाल यादव बाहर निकल चुके हैं और कांग्रेस के साथ गठबंधन करने जा रहे हैं। मगर राज्य में एनडीए को अखिलेश और मायावती के गठबंधन से ही कड़ी चुनौती मिल सकती है। अमेठी और रायबरेली को छोड़कर एक-दो और सीटों पर कांग्रेस दमखम दिखा सकती है।

आसान नहीं दीदी का किला ढाहना: पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी का झुकाव तो कांग्रेस की तरफ है लेकिन अभी तक उससे गठबंधन नहीं हो सका है। हालांकि, इसकी संभावना नहीं के बराबर है। इस बात की संभावना ज्यादा है कि ममता बनर्जी अपने दम पर चुनाव लड़ेंगी। उधर, कांग्रेस और लेफ्ट का गठबंधन हो सकता है या कुछ सीटों पर दोस्ताना संघर्ष हो सकता है। ऐसी सूरत में राज्य में ममता बनर्जी कएक बड़ी ताकत होंगी। टीम ममता का मुकाबला कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन के साथ-साथ एनडीए से भी होगा। बता दें कि पिछले चुनावों में ममता बनर्जी की पार्टी को कुल 42 में 34 सीटें मिली थीं।

केसीआर, वाईएसआर और नवीन पटनायक का स्थानीय मोर्चा: तेलंगाना के सीएम केसीआर लंबे समय से गैर भाजपा, गैर कांग्रेसी मोर्चा बनाने की कवायद करते रहे हैं लेकिन वो सफल नहीं हो सके। लिहाजा, उन्होंने स्थानीय स्तर पर ही भाजपा और कांग्रेस से दो-दो हाथ करने का फैसला किया है। तेलंगाना में उनका मुकाबला इन दोनों दलों के अलावा जगनमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस से भी होगा। वहीं पड़ोसी राज्य आंध्र में चंद्रबाबू नायडू से होगा। जगनमोहन भी इन दोनों राज्यों मे अपने दम पर ताल ठोंक रहे हैं। उधऱ, ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक की पार्टी बीजू जनता दल भी अपने दम पर चुनाव लड़ रही है। उनका मुकाबला कांग्रेस और भाजपा दोनों से है। लोकसभा के साथ ही ओडिशा और आंध्र प्रदेश में विधान सभा चुनाव भी होने हैं।

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